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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 88 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



जो मोहरागदोसे णिहणदि उवलब्भ जोण्हमुवदेसं । (88)

सो सव्वदुक्खमोक्खं पावदि अचिरेण कालेण ॥95॥

अर्थ: 

[यः] जो [जैनं उपदेशं] जिनेन्द्र के उपदेश को [उपलभ्य] प्राप्त करके [मोहरागद्वेषान्] मोह-राग-द्वेष को [निहंति] हनता है, [सः] वह [अचिरेण कालेन] अल्प काल में [सर्वदुःखमोक्षं प्राप्नोति] सर्व दुःखों से मुक्त हो जाता है ॥८८॥

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथ दुर्लभजैनोपदेशं लब्ध्वापि य एव मोहराग-द्वेषान्निहन्ति स एवाशेषदुःखक्षयं प्राप्नोतीत्यावेदयति --

जो मोहरागदोसे णिहणदि य एव मोहराग-द्वेषान्निहन्ति । किं कृत्वा । उपलब्भ उपलभ्य प्राप्य । कम् । जोण्हमुवदेसं जैनोपदेशम् । सो सव्वदुक्खमोक्खं पावदि स सर्वदुःखमोक्षं प्राप्नोति । केन । अचिरेण कालेण स्तोक कालेनेति । तद्यथा –

एकेन्द्रियविकलेन्द्रिय-पञ्चेन्द्रियादिदुर्लभपरंपरया जैनोपदेशं प्राप्य मोहरागद्वेषविलक्षणं निजशुद्धात्मनिश्चलानुभूतिलक्षणं निश्चयसम्यक्त्वज्ञानद्वयाविनाभूतं वीतरागचारित्रसंज्ञं निशितखङ्गं य एव मोहरागद्वेषशत्रूणामुपरि दृढतरं पातयति स एव पारमार्थिकानाकुलत्वलक्षणसुखविलक्षणानां दुःखानां क्षयं करोतीत्यर्थः ॥९५॥

एवंद्रव्यगुणपर्यायविषये मूढत्वनिराकरणार्थं गाथाषट्केन तृतीयज्ञानकण्डिका गता ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[जो मोहरागदोसे णिहणदि] - जो मोह-राग-द्वेष को नष्ट करता है । क्या करके उन्हें नष्ट करता है ? [उवलब्भ] - प्राप्तकर उन्हें नष्ट करता है । क्या प्राप्त कर उन्हें नष्ट करता है ? [जोण्हमुवदेसं] - जिनेन्द्र भगवान का उपदेश प्राप्त कर उन्हें नष्ट करता है । [सो सव्वदुक्खमोक्खं पवदि]- वह सर्व दु:खों से मोक्ष (छुटकारा) प्राप्त करता है । कैसे-कब प्राप्त करता है? [अचिरेण कालेण] अल्प समय में--थोड़े ही समय में मोक्ष प्राप्त करता है ।

वह इस प्रकार - एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय, पंचेन्द्रियादि (जीवों की) दुर्लभ परम्परा से जिनेन्द्र भगवान का उपदेश प्राप्त कर मोह-राग-द्वेष से विलक्षण अविनाभावी निश्चय-सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान युक्त अपने शुद्धात्मा की निश्चल अनुभूति लक्षण वीतराग चारित्र नामक तीक्ष्ण (पैनी) तलवार को जो मोह-राग-द्वेष रूपी शत्रुओं के ऊपर दृढ़ता से गिराता है, वही वास्तविक अनाकुलता लक्षण सुख से विपरीत दुःखों का क्षय करता है -- यह अर्थ है ।

इस प्रकार द्रव्य-गुण-पर्याय के विषय में मूढ़ता निराकरण के लिये छह गाथाओं द्वारा तीसरी ज्ञान-कण्डिका पूर्ण हुई ।

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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