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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 92 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



जो णिहदमोहदिट्ठी आगमकुसलो विरागचरियम्हि । (92)

अब्भुट्ठिदो महप्पा धम्मो त्ति विसेसिदो समणो ॥99॥

अर्थ: 

[यः आगमकुशल:] जो आगम में कुशल हैं, [निहतमोहदृष्टि:] जिसकी मोह-दृष्टि हत हो गई है और [विरागचरिते अभ्युत्थित:] जो वीतराग-चारित्र में आरुढ़ है, [महात्मा श्रमण:] उस महात्मा श्रमण को [धर्म: इति विशेषित:] (शास्त्र में) 'धर्म' कहा है ॥९२॥

तात्पर्य-वृत्ति: 

तर्हिकथं श्रमणो भवति, इति पृष्टे प्रत्युत्तरं प्रयच्छन् ज्ञानाधिकारमुपसंहरति --

जो णिहदमोहदिट्ठी तत्त्वार्थ-श्रद्धानलक्षणव्यवहारसम्यक्त्वोत्पन्नेन निजशुद्धात्मरुचिरूपेण निश्चयसम्यक्त्वेन परिणतत्वान्निहतमोह-

दृष्टिर्विध्वंसितदर्शनमोहो यः । पुनश्च किंरूपः । आगमकुसलो निर्दोषिपरमात्मप्रणीतपरमागमाभ्यासेननिरुपाधिस्वसंवेदनज्ञानकुशलत्वादागमकुशल आगमप्रवीणः । पुनश्च किंरूपः । विरागचरियम्हिअब्भुट्ठिदो व्रतसमितिगु प्त्यादिबहिरङ्गचारित्रानुष्ठानवशेन स्वशुद्धात्मनिश्चलपरिणतिरूपवीतरागचारित्र-परिणतत्वात् परमवीतरागचारित्रे सम्यगभ्युत्थितः उद्यतः । पुनरपि कथंभूतः । महप्पा मोक्षलक्षण-महार्थसाधकत्वेन महात्मा धम्मो त्ति विसेसिदो समणो जीवितमरणलाभालाभादिसमताभावनापरिणतात्मास श्रमण एवाभेदनयेन धर्म इति विशेषितो मोहक्षोभविहीनात्मपरिणामरूपो निश्चयधर्मो भणित इत्यर्थः ॥९९॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

अब, "[उवसंपयामि सम्मं] - साम्य का आश्रय ग्रहण करता हूँ, इत्यादि नमस्कार गाथा में जो प्रतिज्ञा की थी, उसके बाद "[चारित्तं खलु धम्मो] - चारित्र वास्तविक धर्म है" - इत्यादि गाथा द्वारा चारित्र का धर्मपना स्थापित किया था । इसके बाद "[परिणमदि जेण दव्वं] - द्रव्य जिसरूप से परिणमित होता है" - इत्यादि गाथा द्वारा आत्मा का धर्मपना कहा था - इत्यादि । वह सब शुद्धोपयोग के प्रसाद से सिद्ध करने योग्य है । अब निश्चय रत्नत्रय परिणत आत्मा ही धर्म है, यह सिद्ध है ।

अथवा दूसरी पातनिका - सम्यक्त्व के अभाव में श्रमण(मुनि) नहीं है, उस श्रमण से धर्म भी नहीं है । तो कैसे श्रमण हैं? ऐसा प्रश्न पूछने पर उत्तर देते हुये ज्ञानाधिकार का उपसंहार करते हैं -

[जो णिहदमोहदिट्ठी] - तत्वार्थ-श्रद्धान लक्षण व्यवहार-सम्यक्त्व से उत्पन्न निज शुद्धात्मा की रुचिरूप निश्चय-सम्यक्त्व रूप से परिणत होने के कारण जो मोहदृष्टि - दर्शनमोह से रहित है । और जो किस स्वरूप वाले हैं? [आगमकुसलो] - सर्व-दोष रहित परमात्मा द्वारा कहे गये परमागम के अभ्यास से उपाधि रहित स्व-संवेदन ज्ञान मे होने से आगम में कुशल - चतुर हैं । और जो किस स्वरूप वाले हैं? [विराग चरियम्हि अब्भुट्ठिदो] - व्रत, समित, गुप्ति आदि बाह्य चारित्र के अनुष्ठान के वश से स्व-शुद्धात्मा में निश्चल परिणति रूप वीतराग चारित्रमय परिणत होने के कारण परमवीतराग चारित्र में अच्छी तरह से स्थित हैं - तत्पर हैं । जो और कैसे हैं? [महप्पा] - मोक्ष लक्षण रूप महान अर्थ - पुरुषार्थ के साधक होने से महात्मा हैं, [धम्मो त्ति विसेसिदो समणो] - जीवन-मरण, लाभ-अलाभ आदि में समता भावरूप परिणत जो आत्मा हैं, वे श्रमण (मुनिराज) ही अभेदनय से धर्म हैं - ऐसा मोह और क्षोभ से रहित आत्मपरिणाम-रूप निश्चय धर्म कहा गया है - ऐसा अर्थ है ।

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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