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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 96 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



सब्भावो हि सहावो गुणेहिं सगपज्जएहिं चित्तेहिं । (96)

दव्वस्स सव्वकालं उप्पादव्वयधुवत्तेहिं ॥106॥

अर्थ: 

गुणों तथा अनेक प्रकार की अपनी पर्यायों से और उत्पाद-व्यय-धौव्य रूप से सर्वकाल में द्रव्य का अस्तित्व वास्तव में (द्रव्य का) स्वभाव है ।

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ क्रमेणास्तित्वं द्विविधिमभिदधाति -- स्वरूपास्तित्वं सादृश्यास्तित्वं चेति तत्रेदं स्वरूपा-स्तित्वाभिधानम्‌ -

अस्तित्वं हि किल द्रव्यस्य स्वभाव:, तत्पुनरन्यसाधननिरपेक्षत्वादनाद्यनन्ततयाहेतु-कयैकरूपया वृत्त्या नित्यप्रवृत्तत्वाद्विभावधर्मवैलक्षण्याच्च भावभाववद्भावान्नानात्वेऽपि प्रदेशभेदाभावाद्‌ द्रव्येण सहैकत्वमवलम्बमानं द्रव्यस्य स्वभाव एव कथं न भवेत्‌ । तत्तु द्रव्यान्तराणामिव द्रव्यगुणपर्यायाणां न प्रत्येकं परिसमाप्यते । यतो हि परस्पर- साधितसिद्धियुक्तत्वात्तेषामस्तित्वमेकमेव, कार्तस्वरवत्‌ ।

यथा हि द्रव्येण वा क्षेत्रेण वा कालेन वा भावेन वा कार्तस्वरात्‌ पृथगनुपलभ्यमानै: कर्तृकरणाधिकरणरूपेण पीततादिगुणानां कुण्डलादिपर्यायाणां च स्वरूपमुपादाय प्रवर्तमानप्रवृत्तियुक्तस्य कार्तस्वरास्त्विेन निष्पादिनिष्पत्तियुक्तै: पीततादिगुणै: कुण्डलादि-पर्यायैश्च यदस्तित्वं कार्तस्वरस्य स स्वभाव:, तथा हि द्रव्येण वा क्षेत्रेण वा कालेन वा भावेन वा द्रव्यात्पृथगनुपलभ्यमानै: कर्तृकरणाधिकरणरूपेण गुणानांपर्यायाणां च स्वरूपमुपादाय प्रवर्तमानप्रवृत्तियुक्तस्य द्रव्यास्तित्वेन निष्पादितनिष्पत्तियुक्तैर्गुणै: पर्यायैश्च यदस्तित्वं द्रव्यस्य स स्वभाव: ।

यथा वा द्रव्येण वा क्षेत्रेण वा कालेन वा भावेन वा पीततादिगुणेभ्य: कुण्डलादि-पर्यायेभ्यश्च पृथगनुपलभ्यमानस्य कर्तृकरणाधिकरूपेण कार्तस्वरस्वरूपमुपादाय प्रवर्त-मानप्रवृत्तियुक्तै: पीततादिगुणै: कुण्डलादिपर्यायैश्च निष्पादितनिष्पत्तियुक्तस्य कार्तस्वरस्य मूलसाधनतया तैर्निष्पादितं यदस्तित्वं स स्वभाव:, तथा द्रव्येण वा क्षेत्रेण वा कालेन वा भावेन वा गुणेभ्य: पर्यायेभ्यश्च पृथगनुपलभ्यमानस्य कर्तृकरणाधिकरणरूपेण द्रव्य-स्वरूपमुपादाय प्रवर्तमानप्रवृत्तियुक्तैर्गुणै: पर्यायैश्च निष्पादितनिष्पत्तियुक्तस्य द्रव्यस्य मूल-साधनतया तैर्निष्पादितं यदस्तित्वं स स्वभाव: ।

किंच - यथा हि द्रव्येण वा क्षेत्रेण वा कालेन वा भावेन वा कार्तस्वरात्पृथगनुपलभ्यमानै: कर्तृकरणाधिकरूपेण कुंडलाङ्गदपीतताद्युत्पादव्ययध्रौव्याणां स्वरूपमुपादाय प्रवर्तमान-प्रवृत्तियुक्तस्य कार्तस्वरास्तित्वेन निष्पादितनिष्पत्तियुक्तै: कुण्डलाङ्गदपीतताद्युत्पादव्ययध्रौव्यैर्य-दस्तित्वं कार्तरस्वरस्य स स्वभाव:, तथा हि द्रव्येण वा क्षेत्रेण वा कालेन वा भावेन वा द्रव्यात्पृथगनुपलभ्यमानै: कर्तृकरणाधिकरूपेणोत्पादव्ययध्रौव्याणां स्वरूपमुपादाय प्रवर्तमानप्रवृत्ति-युक्तस्य द्रव्यास्तित्वेन निष्पादितनिष्पत्तियुक्तैरुत्पादव्ययध्रौव्यैर्यदस्तित्वं द्रव्यस्य स स्वभाव: ।

यथा वा द्रव्येण वा क्षेत्रेण वा कालेन वा भावेन वा कुण्डलाङ्गदपीतताद्युत्पादव्ययध्रौव्येभ्य: पृथगनुपलभ्यमानस्य कर्तृकरणाधिकरणरूपेण कार्तस्वरस्वरूपमुपादाय प्रवर्तमानप्रवृत्तियुक्तै: कुण्डलाङ्गदपीतताद्युत्पादव्ययध्रौव्यैर्निष्पादितनिष्पत्तियुक्तस्य कार्तस्वरस्य मूलसाधनतया तैर्निष्पादितं यदस्तित्वं स स्वभाव:, तथा द्रव्येण वा क्षेत्रेण वा कालेन वा भावेन वोत्पादव्ययध्रौव्येभ्य: पृथगनुपलभ्यमानस्य कर्तृकरणाधिकरणरूपेण द्रव्यस्वरूपमुपादाय प्रवर्तमान-प्रवृत्तियुक्तैरुत्पादव्ययध्रौव्यैर्निष्पादितनिष्पत्तियुक्तस्य द्रव्यस्य मूलसाधनतया तैर्निष्पादितं यदस्तित्वं स स्वभाव: ॥९६॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

अस्तित्व वास्तव में द्रव्य का स्वभाव है; और वह (अस्तित्व) अन्य साधन से १निरपेक्ष होने के कारण अनादि-अनन्त होने से तथा २अहेतुक, एकरूप ३वृत्ति से सदा ही प्रवर्तता होने के कारण विभावधर्म से विलक्षण होने से, भाव और ४भाववानता के कारण अनेकत्व होने पर भी प्रदेशभेद न होने से द्रव्य के साथ एकत्व को धारण करता हुआ, द्रव्य का स्वभाव ही क्यों न हो? (अवश्य हो ।) वह अस्तित्व-जैसे भिन्न-भिन्न द्रव्यों में प्रत्येक में समाप्त हो जाता है उसी प्रकार द्रव्य-गुण-पर्याय में प्रत्येक में समाप्त नहीं हो जाता, क्योंकि उनकी सिद्धि परस्पर होती है, इसलिये (अर्थात् द्रव्य-गुण और पर्याय एक दूसरे से परस्पर सिद्ध होते हैं इसलिये,—यदि एक न हो तो दूसरे दो भी सिद्ध नहीं होते इसलिये) उनका अस्तित्व एक ही है; सुवर्ण की भाँति ।

जैसे द्रव्य, क्षेत्र, काल या भाव से सुवर्ण से जो पृथक् दिखाई नहीं देते; कर्ता-करण-अधिकरणरूप से ५पीतत्वादि गुणों के और कुण्डलादि पर्यायों के स्वरूप को धारण करके प्रवर्तमान सुवर्ण के अस्तित्व से जिनकी उत्पत्ति होती है,—ऐसे पीतत्वादिगुणों और कुण्डलादि पर्यायों से जो सुवर्ण का अस्तित्व है, वह सुवर्ण का स्वभाव है; उसी प्रकार द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से या भाव से जो द्रव्य से पृथक् दिखाई नहीं देते, कर्ता-करण-६अधिकरणरूप से गुणों के और पर्यायों के स्वरूप को धारण करके प्रवर्तमान द्रव्य के अस्तित्व से जिनकी उत्पत्ति होती है,—ऐसे गुणों और पर्यायों से जो द्रव्य का अस्तित्व है, वह स्वभाव है ।

(द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से या भाव से सुवर्ण से भिन्न न दिखाई देने वाले पीतत्वादिक और कुण्डलादिक का अस्तित्व वह सुवर्ण का ही अस्तित्व है, क्योंकि पीतत्वादिक के और कुण्डलादिक के स्वरूप को सुवर्ण ही धारण करता है, इसलिये सुवर्ण के अस्तित्व से ही पीतत्वादिक की और कुण्डलादिक की निष्पत्ति-सिद्ध होती है; सुवर्ण न हो तो पीतत्वादिक और कुण्डलादिक भी न हों, इसी प्रकार द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से या भाव से द्रव्य से भिन्न नहीं दिखाई देने वाले गुणों और पर्यायों का अस्तित्व वह द्रव्य का ही अस्तित्व है, क्योंकि गुणों और पर्यायों के स्वरूप को द्रव्य ही धारण करता है, इसलिये द्रव्य के अस्तित्व से ही गुणों की और पर्यायों की निष्पत्ति होती है, द्रव्य न हो तो गुण और पर्यायें भी न हों । ऐसा अस्तित्व वह द्रव्य का स्वभाव है ।)

अथवा, जैसे द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से या भाव से ७जो पीतत्वादि गुणों से और कुण्डलादि पर्यायों से पृथक् नहीं दिखाई देता; कर्ता-करण-अधिकरणरूप से सुवर्ण के स्वरूप को धारण करके प्रवर्तमान पीतत्वादि गुणों और कुण्डलादि पर्यायों से जिसकी निष्पत्ति होती है,—ऐसे सुवर्ण का, मूल-साधनपने से ८उनसे निष्‍पन्न होता हुआ, जो अस्तित्व है, वह स्वभाव है; उसी प्रकार द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से या भाव से गुणों से और पर्यायों से जो पृथक् नहीं दिखाई देता, कर्ता-करण-९अधिकरणरूप से द्रव्य के स्वरूप को धारण करके प्रवर्तमान गुणों और पर्यायों से जिसकी निष्पत्ति होती है,—ऐसे द्रव्य का, मूलसाधनपने से उनसे निष्पन्न होता हुआ जो अस्तित्व है, वह स्वभाव है ।

(पीतत्वादिक से और कुण्डलादिक से भिन्न न दिखाई देने वाले सुवर्ण का अस्तित्व वह पीतत्वादिक और कुण्डलादिक का ही अस्तित्व है, क्योंकि सुवर्ण के स्वरूप को पीतत्वादिक और कुण्डलादिक ही धारण करते हैं, इसलिये पीतत्वादिक और कुण्डलादिक के अस्तित्व से ही सुवर्ण की निष्पत्ति होती है, पीतत्वादिक और कुण्डलादिक न हों तो सुवर्ण भी न हो; इसी प्रकार गुणों से और पर्यायों से भिन्न न दिखाई देने वाले द्रव्य का अस्तित्व वह गुणों और पर्यायों का ही अस्तित्व है, क्योंकि द्रव्य के स्वरूप को गुण और पर्यायें ही धारण करती हैं इसलिये गुणों और पर्यायों के अस्तित्व से ही द्रव्य की निष्पत्ति होती है । यदि गुण और पर्यायें न हो तो द्रव्य भी न हो । ऐसा अस्तित्व वह द्रव्य का स्वभाव है ।)

(जिस प्रकार द्रव्य का और गुण-पर्याय का एक ही अस्तित्व है ऐसा सुवर्ण के दृष्टान्त पूर्वक समझाया, उसी प्रकार अब सुवर्ण के दृष्टान्त पूर्वक ऐसा बताया जा रहा है कि द्रव्य का और उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य का भी एक ही अस्तित्व है ।)

जैसे द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से या भाव से, सुवर्ण से १०जो पृथक् नहीं दिखाई देते, कर्ता-करण-११अधिकरणरूप से कुण्डलादि उत्पादों के, बाजूबंधादि व्ययों के और पीतत्वादि ध्रौव्‍यों के स्वरूप को धारण करके प्रवर्तमान सुवर्ण के अस्तित्व से जिनकी निष्पत्ति होती है,—ऐसे कुण्डलादि उत्पाद, बाजूबंधादि व्यय और पीतत्वादि ध्रौव्यों से जो सुवर्ण का अस्तित्व है, वह (सुवर्ण का) स्वभाव है; उसी प्रकार द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से या भाव से, जो द्रव्य से पृथक् दिखाई नहीं देते, कर्ता-करण-अधिकरणरूप से उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यों के स्वरूप को धारण करके प्रवर्तमान द्रव्य के अस्तित्व से जिनकी निष्पत्ति होती है, —ऐसे उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यों से जो द्रव्य का अस्तित्व है वह स्वभाव है ।

(द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से या भाव से द्रव्य से भिन्न दिखाई न देने वाले उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यों का अस्तित्व है वह द्रव्य का ही अस्तित्व है; क्योंकि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यों के स्वरूप को द्रव्य ही धारण करता है, इसलिए द्रव्य के अस्तित्व से ही उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यों की निष्पत्ति होती है । यदि द्रव्य न हो तो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य भी न हों । ऐसा अस्तित्व वह द्रव्य का स्वभाव है।)

अथवा जैसे द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से या भाव से कुण्डलादि-उत्पादों से बाजूबंधादि व्ययों से और पीतत्वादि ध्रौव्यों से जो पृथक् नहीं दिखाई देता; कर्ता-करण-अधिकरणरूप से सुवर्ण के स्वरूप को धारण करके प्रवर्तमान कुण्डलादि-उत्पादों, बाजूबंधादि व्ययों और पीतत्वादि ध्रौव्यों से जिसकी निष्पत्ति होती है,—ऐसे सुवर्ण का, मूलसाधनपने से उनसे निष्‍पन्न होता हुआ, जो अस्तित्व है, वह स्वभाव है । उसी प्रकार द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से या भाव से उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यों से जो पृथक् दिखाई नहीं देता, कर्ता-करण-अधिकरण रूप से द्रव्‍य के स्‍वरूप को धारण करके प्रवर्तमान उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यों से जिसकी निष्‍पत्ति होती है,—ऐसे द्रव्‍य का मूल साधनपने से उनसे निष्‍पन्‍न होता हुआ जो अस्तित्‍व है, वह स्‍वभाव है।

(उत्पादों से, व्ययों से और ध्रौव्यों से भिन्‍न न दिखाई देने वाले द्रव्‍य का अस्तित्‍व वह उत्‍पादों; व्ययों और ध्रौव्‍यों का ही अस्तित्‍व है; क्‍योंकि द्रव्‍य के स्‍वरूप को उत्‍पाद, व्‍यय और ध्रौव्‍य ही धारण करते हैं, इसलिये उत्पाद-व्यय और ध्रौव्यों के अस्तित्‍व से ही द्रव्‍य की निष्‍पत्ति होती है। यदि उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य न हों तो द्रव्‍य भी न हो। ऐसा अस्तित्‍व वह द्रव्‍य का स्‍वभाव है।)

इस प्रकार स्वरूपास्तित्व का निरूपण हुआ ॥९६॥

१अस्तित्व अन्य साधन की अपेक्षा से रहित -- स्वयंसिद्ध है इसलिये अनादि-अनन्त है ।

२अहेतुक = अकारण, जिसका कोई कारण नहीं है ऐसी ।

३वृत्ति = वर्तन; वर्तना वह; परिणति । (अकारणिक एकरूप परिणति से सदाकाल परिणमता होने से अस्तित्व विभाव-धर्म से भिन्न लक्षण वाला है ।)

४अस्तित्व तो (द्रव्य का) भाव है और द्रव्य भाववान् है ।

५पीतत्वादि गुण और कुण्डलादि पर्यायें ।

६द्रव्य ही गुण-पर्यायों का कर्ता (करनेवाला), उनका करण (साधन) और उनका अधिकरण (आधार) है; इसलिये द्रव्य ही गुण-पर्याय का स्वरूप धारण करता है ।

७जो = जो सुवर्ण ।

८उनसे = पीतत्वादि गुणों और कुण्डलादि पर्यायों से । (सुवर्णका अस्तित्व निष्पन्न होने में, उपजने में, या सिद्ध होने में मूल-साधन पीतत्वादि गुण और कुण्डलादि पर्यायें हैं) ।

९गुण-पर्यायें ही द्रव्य की कर्ता, करण और अधिकरण हैं; इसलिये गुण-पर्यायें ही द्रव्य का स्वरूप धारण करती हैं ।

१०जो = जो कुण्डलादि उत्पाद, बाजूबंधादि व्यय आर पीतादि ध्रौव्य ।

११सुवर्ण ही कुण्डलादि-उत्पाद, बाजूबंधादि-व्यय और पीतत्वादि ध्रौव्य का कर्ता, करण तथा अधिकरण है; इसलिये सुवर्ण ही उनका स्वरूप धारण करता है । (सुवर्ण ही कुण्डलादि-रूप से उत्पन्न होता है, बाजूबंधादि-रूप से नष्ट होता है और पीतत्वादि-रूप से अवस्थित रहता है ।)

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