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ग्रन्थ

ग्रन्थ:मोक्षपाहुड़ गाथा 25

From जैनकोष

वर वयतवेहि सग्गो मा दुक्खं होउ णिरइ इयरेहिं ।
छायातवट्ठियाणं पडिवालंताण गुरुभेयं ॥२५॥
वरं व्रततपोभि: स्वर्ग: मा दु:खं भवतु नरके इतरै: ।
छायातपस्थितानां प्रतिपालयतां गुरुभेद: ॥२५॥


आगे कहते हैं कि संसार में व्रत, तप से स्वर्ग होता है, वह व्रत तप भला है, परन्तु अव्रतादिक से नरकादिक गति होती है, वह अव्रतादिक श्रेष्ठ नहीं हैं -
अर्थ - व्रत और तप से स्वर्ग होता है वह श्रेष्ठ है, परन्तु अव्रत और अतप से प्राणी को नरकगति में दु:ख होता है वह मत होवे, श्रेष्ठ नहीं है । छाया और आतप में बैठनेवाले के प्रतिपालक कारणों में बड़ा भेद है ।
भावार्थ - जैसे छाया का कारण तो वृक्षादिक हैं इनकी छाया में जो बैठे वह सुख पावे और आताप का कारण सूर्य, अग्नि आदिक हैं, इनके निमित्त से आताप होता है जो उसमें बैठता है वह दु:ख को प्राप्त करता है इसप्रकार इनमें बड़ा भेद है, इसप्रकार ही जो व्रत, तप का आचरण करता है वह स्वर्ग के सुख को प्राप्त करता है और जो इनका आचरण नहीं करता है, विषय-कषायादिक का सेवन करता है, वह नरक के दु:ख को प्राप्त करता है, इसप्रकार इनमें बड़ा भेद है । इसलिए यहाँ कहने का यह आशय है कि जबतक निर्वाण न हो तबतक व्रत-तप आदि में प्रवर्तना श्रेष्ठ है इससे सांसारिक सुख की प्राप्ति है और निर्वाण के साधने में भी ये सहकारी हैं । विषय-कषायादिक की प्रवृत्ति का फल तो केवल नरकादिक के दु:ख हैं, उन दु:खों के कारणों का सेवन करना यह तो बड़ी भूल है, इसप्रकार जानना चाहिए ॥२५॥


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See Also

  • मोक्षपाहुड़ अनुक्रमणिका
  • आचार्य कुंद्कुंद
  • प. जयचंदजी छाबड़ा
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Category:
  • मोक्षपाहुड़
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