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ग्रन्थ:मोक्षपाहुड़ गाथा 26

From जैनकोष

जो इच्छइ णिस्सरिदुं १संसारमहण्णवाउ रुंद्दाओ ।
कम्मिंधणाण डहणं सो झायइ अप्पयं सुद्धं ॥२६॥
य: इच्छति नि:सर्त्तुं संसारमहार्णवात्‌ रुद्रात्‌ ।
कर्मेन्धनानां दहनं स: ध्यायति आत्मानं शुद्धम्‌ ॥२६॥


आगे कहते हैं कि संसार में रहे तबतक व्रत, तप पालना श्रेष्ठ कहा, परन्तु जो संसार से निकलना चाहे वह आत्मा का ध्यान करे -
अर्थ - जो जीव रुद्र अर्थात्‌ बड़े विस्ताररूप संसाररूपी समुद्र उससे निकलना चाहता है वह जीव कर्मरूपी ईंधन को दहन करनेवाले शुद्ध आत्मा के ध्यान को करता है ।
भावार्थ - निर्वाण की प्राप्ति कर्म का नाश हो तब होती है और कर्म का नाश शुद्धात्मा के ध्यान से होता है, अत: जो संसार से निकलकर मोक्ष को चाहे वह शुद्ध आत्मा, जो कि कर्ममल से रहित अनन्त चतुष्टय सहित (निज निश्चय) परमात्मा है उसका ध्यान करता है । मोक्ष का उपाय इसके बिना अन्य नहीं है ॥२६॥


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See Also

  • मोक्षपाहुड़ अनुक्रमणिका
  • आचार्य कुंद्कुंद
  • प. जयचंदजी छाबड़ा
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Category:
  • मोक्षपाहुड़
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