• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 108

From जैनकोष



एतेषां परिहारं कृत्वा किं तद्दिनेऽनुष्ठातव्यमित्याह --


धर्मामृतं सतृष्णः श्रवणाभ्यां पिबतु पाययेद्वान्यान्
ज्ञानध्यानपरो वा भवतूपवसन्नतन्द्रालूः ॥108॥


टीका: 

उपवसन्नुपवासं कुर्वन् । धर्मामृतं पिबतु धर्मम् एवामृतं सकलपाणिनामाप्यायकत्वात् तत् पिबतु । काभ्याम् ? श्रवणाभ्याम् । कथम्भूत: ? सतृष्ण: साभिलाष: पिबन् न पुनरुपरोधादिवशात् । पाययेद् वान्यान् स्वमेवावगतधर्मस्वरूपस्तु अन्यतो धर्मामृतं पिबन् अन्यानविदिततत्स्वरूपान् पाययेत् तत् । ज्ञानध्यानपरो भवतु, ज्ञानपरो द्वादशानुप्रेक्षाद्युपयोगनिष्ठ: ।

अधु्रवाशरणे चैव भव एकत्वमेव च

अन्यत्वमशुचित्वं च तथैवास्रवसंवरौ ॥१॥

निर्जरा च तथा लोकबोधदुर्लभधर्मता

द्वादशैता अनुप्रेक्षा भाषिता जिनपुङ्गवै: ॥२॥

ध्यानपर: आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयलक्षणधर्मध्याननिष्ठो वा भवतु । किंविशिष्ट: ? अतन्द्रालु: निद्रालस्यरहित: ॥




उपवास के दिन कर्तव्य




धर्मामृतं सतृष्णः श्रवणाभ्यां पिबतु पाययेद्वान्यान्

ज्ञानध्यानपरो वा भवतूपवसन्नतन्द्रालूः ॥108॥


टीकार्थ:

उपवास करने वाला धर्मरूपी अमृत को कानों से पीवे । धर्म को अमृत कहा है, क्योंकि यह समस्त प्राणियों के सन्तोष का कारण है । यदि उपवास करने वाला व्यक्ति वस्तुस्वरूप का ज्ञाता नहीं है, तो उत्सुकतापूर्वक अन्य विशिष्टजनों से धर्म के उपदेश को अपने कानों से सुने । यदि स्वयं तत्त्ववेत्ता है तो दूसरों को धर्मोपदेश सुनावे तथा आलस्य-प्रमाद को छोडक़र ध्यान-स्वाध्याय में लीन होते हुए अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ और धर्म इन बारह भावनाओं के चिन्तन में उपयोग को लगावे अथवा आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय, संस्थानविचय लक्षणरूप धर्मध्यान में तत्पर रहे ।



पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

रत्नकरंड श्रावकाचार अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:रत्नकरंड_श्रावकाचार_-_श्लोक_108&oldid=102367"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 November 2022, at 21:30.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki