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ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 119

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यथा वैयावृत्यं विदधता चतुर्विधं दानं दातव्यं तथा पूजादिविधानमपि कर्तव्यमित्याह --


देवाधिदेवचरणे परिचरणं सर्वदुःखनिर्हरणम्
कामदुहि कामदाहिनि परिचिनुयादादृतो नित्यम् ॥119॥


टीका: 

आदृत: आदरयुक्त: नित्यं परिचिनुयात् पुष्टं कुर्यात् । किम् ? परिचरणं पूजाम् । किंविशिष्टम् ? सर्वदु:खनिर्हरणं नि:शेषदु:खविनाशकम् । क्व ? देवाधिदेवचरणे देवानामिन्द्रादीनामधिको वन्द्यो देवो देवाधिदेवस्तस्य चरण: पाद: तस्मिन् । कथम्भूते ? कामदुहि वाञ्छितप्रदे । तथा कामदाहिनि कामविध्वंसके ॥




दानों में प्रसिद्ध नाम




देवाधिदेवचरणे परिचरणं सर्वदुःखनिर्हरणम्

कामदुहि कामदाहिनि परिचिनुयादादृतो नित्यम् ॥119॥


टीकार्थ:

इन्द्रादिक देवों के द्वारा वन्दनीय अरहन्त भगवान् देवाधिदेव कहलाते हैं । उनके चरणकमल वाञ्छित फल देने वाले हैं और कामदेव को विध्वंस करने वाले हैं । इसलिए गृहस्थों को चाहिए कि वे आदरपूर्वक प्रतिदिन अरहन्तदेव की पूजा करें, क्योंकि उनकी पूजा समस्त दु:खों का नाश करने वाली है ।



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