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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 127

From जैनकोष



इदानीं सल्लेखनां कुर्वाणस्याहारत्यागे क्रमं दर्शयन्नाह-


आहारं परिहाप्य, क्रमश: स्निग्धं-विवर्द्धयेत्पानम्
स्निग्धं च हापयित्वा, खरपानं पूरयेत्क्रमश: ॥127॥


टीका: 

स्निग्धं दुग्धादिरूपं पानम् । विवर्धयेत् परिपूर्णं दापयेत् । किं कृत्वा ? परिहाप्य परित्याज्य । कम् ? आहारं कवलाहाररूपम् । कथम् ? क्रमश: प्रागशनादिक्रमेण पश्चात् खरपानं कंजिकादि, शुद्धपानीयरूपं वा । किं कृत्वा ? हापयित्वा । किम् ? स्निग्धं च स्निग्धमपि पानकम् । कथम् ? क्रमश: । स्निग्धं हि परिहाप्य कञ्जिकादिरूपं खरपानं पूरयेत् विवर्धयेत् । पश्चात्तदपि परिहाप्य शुद्धपानीयरूपं खरपानं पूरयेदिति ॥




भोजन के त्याग का क्रम




आहारं परिहाप्य, क्रमश: स्निग्धं-विवर्द्धयेत्पानम्

स्निग्धं च हापयित्वा, खरपानं पूरयेत्क्रमश: ॥127॥


टीकार्थ:

सल्लेखना को ग्रहण करने वाला आहारादि को इस क्रम से छोड़े- पहले कवलाहाररूप दाल-भात, रोटी आदि आहार को छोड़े और दूध आदि स्निग्धरूप पेय पदार्थों को ग्रहण करे । पश्चात् उसे भी छोडक़र खरपान-चिकनाई से रहित पेय पदार्थों कांजी, छाछ आदि को ग्रहण करे । फिर उसे भी छोडक़र केवल गर्म जल ग्रहण करे ।



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