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ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 142

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अधुनारात्रिभुक्तिविरतिगुणंश्रावकस्यव्याचक्षाण: प्राह-


अन्नं पानं खाद्यं लेह्यं नाश्नाति यो विभावर्याम्
स च रात्रिभुक्तिविरत: सत्त्वेष्वनुकम्पमानमना: ॥142॥


टीका: 

सचश्रावको । रात्रिभुक्तिविरतोऽभिधीयते । योविभावर्यारात्रौ । नाश्रातिनभुंक्ते । किंतदित्याह - अन्नमित्यादि - अन्नंभक्तमुद्गादि, पानंद्राक्षादिपानकं, खाद्यंमोदकादि, लेह्यंरत्वादि । किंविशिष्ट: ? अनुकम्पमानमना: सकरुणहृदय: । केषु ? सत्वेषुप्राणिषु ॥




रात्रि भुक्ति त्याग प्रतिमा




अन्नं पानं खाद्यं लेह्यं नाश्नाति यो विभावर्याम्

स च रात्रिभुक्तिविरत: सत्त्वेष्वनुकम्पमानमना: ॥142॥


टीकार्थ:

वह श्रावक रात्रि भोजन त्याग प्रतिमाधारी कहलाता है, जो अन्न, भात, दाल आदि, पान-दाख आदि का रस, खाद्य—लड्डू आदि और लेह्य-रबड़ी आदि पदार्थों को जीवों पर अनुकम्पा दया करता हुआ रात्रि में नहीं खाता है ।



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