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ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 46

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द्रव्यानुयोगदीपो द्रव्यानुयोगसिद्धान्तसूत्रं तत्त्वार्थसूत्रादिस्वरूपो द्रव्यागम: स एव दीप: स । आतनुते विस्तारयति अशेषविशेषत: प्ररूपयति । के ? जीवाजीवसुतत्त्वे उपयोगलक्षणो जीव: तद्विपरीततोऽऽजीव: तावेव शोभने अबाधिते तत्त्वे वस्तुस्वरूपे आतनुते । तथा पुण्यापुण्ये सद्वेद्यशुभायुर्नामगोत्राणि हि पुण्यं ततोऽन्यत्कर्मापुण्यमुच्यते, ते च मूलोत्तरप्रकृतिभेदेनाविशेषविशेषतो द्रव्यानुयोगदीप आतनुते । तथा बन्धमोक्षौ च मिथ्यात्वाविरतिप्रमादकषाययोगलक्षणहेतुवशादुपार्जितेन कर्मणा सहात्मन: संश£ेषो बन्ध: बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षलक्षणो मोक्षस्तावप्यशेषत: द्रव्यानुयोगदीप आतनुते। कथम्? श्रुतविद्यालोकं श्रुतविद्या भावश्रुतं सैवालोक: प्रकाशो यत्र कर्मणि तद्यथाभवत्येवं जीवादीनि स प्रकाशयतीति ॥५॥


जीवाजीवसुतत्त्वे पुण्यापुण्ये च बन्धमोक्षौ च
द्रव्यानुयोगदीपः श्रुतविद्यालोकमातनुते ॥5॥


टीका: 

इति प्रभाचन्द्रविरचितायां समन्तभद्रस्वामिविरचितोपसाकध्ययनटीकायां द्वितीय: परिच्छेद: ॥२॥




आगे द्रव्यानुयोग का स्वरूप कहते हैं-




जीवाजीवसुतत्त्वे पुण्यापुण्ये च बन्धमोक्षौ च

द्रव्यानुयोगदीपः श्रुतविद्यालोकमातनुते ॥5॥


टीकार्थ:

'द्रव्यानुयोग दीपो' द्रव्यानुयोग सिद्धान्त सूत्र तत्त्वार्थसूत्रादिरूप द्रव्यागमरूप दीपक है । उपयोग लक्षण वाला जीव द्रव्य कहलाता है, इससे विपरीत उपयोग लक्षण से रहित अजीवद्रव्य है । सातावेदनीय, शुभायु, शुभ नाम और शुभ गोत्र ये पुण्य कर्म कहलाते हैं, इससे विपरीत असातावेदनीय, अशुभ आयु, अशुभ नाम और अशुभ गोत्र ये पाप कर्म कहलाते हैं । इन सबके मूल प्रकृति और उत्तर प्रकृति के भेद से अनेक भेद हैं । मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योगरूप हेतुओं से आत्मा और कर्म का जो परस्पर संश्लेष होता है, उसे बन्ध कहते हैं । बन्ध के हेतुओं के अभावरूप संवर और निर्जरा के द्वारा समस्त कर्मों का आत्मा से पृथक् हो जाना मोक्ष कहलाता है । श्लोक में आये हुए 'च' शब्द से आस्रव, संवर, निर्जरा का भी ग्रहण होता है । इस प्रकार द्रव्यानुयोगरूपी दीपक नौ पदार्थों को श्रुतविद्या-भावश्रुतज्ञानरूपी प्रकाश प्रकाशित करता है अर्थात् जानता है ।



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