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ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 51

From जैनकोष



गृहिणां सम्बन्धी यत् विकलं चरणं तत् त्रेधा त्रिप्रकारम् । तिष्ठति भवति । किं विशिष्टं सत् ? अणुगुणशिक्षाव्रतात्मकं सत् अणुव्रतरूपं गुणव्रतरूपं शिक्षाव्रतरूपं सत् । त्रयमेव । तत्प्रत्येकम् । यथासङ्ख्यम् । पञ्चत्रिचतुर्भेदमाख्यातं प्रतिपादितम् । तथाहि- अणुव्रतं पञ्चभेदं गुणव्रतं त्रिभेदं शिक्षाव्रतं चतुर्भेदमिति ॥


गृहिणां त्रेधा तिष्ठत्यणु-गुण शिक्षाव्रतात्मकं चरणं
पञ्च-त्रि-चतुर्भेदं त्रयं यथासंख्यमाख्यातम् ॥51॥


टीका: 

गृहिणां सम्बन्धी यत् विकलं चरणं तत् त्रेधा त्रिप्रकारम् । तिष्ठति भवति । किं विशिष्टं सत् ? अणुगुणशिक्षाव्रतात्मकं सत् अणुव्रतरूपं गुणव्रतरूपं शिक्षाव्रतरूपं सत् । त्रयमेव । तत्प्रत्येकम् । यथासङ्ख्यम् । पञ्चत्रिचतुर्भेदमाख्यातं प्रतिपादितम् । तथाहि- अणुव्रतं पञ्चभेदं गुणव्रतं त्रिभेदं शिक्षाव्रतं चतुर्भेदमिति ॥




विकल चारित्र के भेद




गृहिणां त्रेधा तिष्ठत्यणु-गुण शिक्षाव्रतात्मकं चरणं

पञ्च-त्रि-चतुर्भेदं त्रयं यथासंख्यमाख्यातम् ॥51॥


टीकार्थ:

गृहस्थों का जो विकल-चारित्र है, वह अणु-व्रत, गुण-व्रत और शिक्षा-व्रत के भेद से तीन प्रकार का है । उन तीनों में प्रत्येक के क्रम से पाँच भेद, तीन भेद और चार भेद कहे गये हैं । अर्थात् पाँच अणु-व्रत, तीन गुण-व्रत और चार शिक्षा-व्रत-रूप भेद जानने चाहिए ।



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