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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 57

From जैनकोष



अधुना चौर्यविरत्यणुव्रतस्य स्वरूपं प्ररूपयन्नाह --


निहितं वा पतितं वा सुविस्मृतं वा परस्वमविसृष्टं
न हरति यन्न च दत्ते तदकृशचौर्य्यादुपारमणम् ॥57॥


टीका: 

अकृशचौर्यात् स्थूलचौर्यात् । उपारमणं तत् । यत् न हरति न गृह्णाति । किं तत् ? परत्वं परद्रव्यम् । कथम्भूतम् ? निहितं वा धृतम् । तथा पतितं वा । तथा सुविस्मृतं वा अतिशयेन विस्मृतम् । वा शब्द: सर्वत्र परस्परसमुच्चये । इत्थम्भूतं परस्वम् अविसृष्टम् अदत्तं यत्स्वयं न हरति न दत्तेऽन्यस्मै तदकृशचौर्यादुपारमणं प्रतिपत्तव्यम् ॥




अचौर्याणुव्रत




निहितं वा पतितं वा सुविस्मृतं वा परस्वमविसृष्टं

न हरति यन्न च दत्ते तदकृशचौर्य्यादुपारमणम् ॥57॥


टीकार्थ:

अकृशचौर्य का अर्थ स्थूल चोरी है । दूसरे का द्रव्य रखा हुआ हो, पड़ा हो, भूला हुआ हो, वा शब्द सर्वत्र परस्पर सम्मुचय के लिए है ऐसे धन को बिना दिये न स्वयं लेता है और न उठाकर अन्य को दे देता है। इस स्थूल चोरी से उपारमणं- निवृत्त होना यह अचौर्याणुव्रत है ।



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