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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 74

From जैनकोष



इदानीमनर्थदण्डविरतिलक्षणं द्वितीयं वृणव्रतं व्याख्यातुमाह --


अभ्यन्तरं दिगवधेरपार्थिकेभ्यः सपापयोगेभ्यः
विरमणमनर्थदण्डव्रतं विदुर्व्रतधराग्रण्यः ॥74॥


टीका: 

अनर्थदण्डव्रतं विदुर्जानन्ति । के ते ? व्रतधराग्रण्य: व्रतधराणां यतीनां मध्येऽग्रण्य: प्रधानभूतास्तीर्थङ्करदेवादय: । विरमणं व्यावृत्ति: । केभ्य: ? सपापयोगेभ्य: पापेन सह योग: सम्बन्ध: पापयोगस्तेन सह वर्तमानेभ्य: पापोपदेशाद्यनर्थदण्डेभ्य: । किंविशिष्टेभ्य: ? अपार्थकेभ्य: निष्प्रयोजनेभ्य: । कथं तेभ्यो विरमणम् ? अभ्यन्तरं दिगवधे: दिगवधेरभ्यन्तरं यथा भवेत्येवं तेभ्यो विरमणम् । अतएव दिग्विरतिव्रतादस्य भेद: । तद्व्रते हि मर्यादातो बहि: पापोपदेशादिविरमणम् अनर्थदण्डविरतिव्रते तु ततोऽभ्यन्तरे तद्विरमणम् ॥




अनर्थदण्ड व्रत




अभ्यन्तरं दिगवधेरपार्थिकेभ्यः सपापयोगेभ्यः

विरमणमनर्थदण्डव्रतं विदुर्व्रतधराग्रण्यः ॥74॥


टीकार्थ:

व्रतधर का अर्थ पंचमहाव्रतों को धारण करने वाले यति, मुनि, उनमें जो प्रधानभूत तीर्थङ्कर-देवादि वे व्रतधराग्रणी कहलाते हैं । इस तरह व्रतधारियों में अग्रणी तीर्थङ्कर-देव ने अनर्थदण्ड-व्रत का लक्षण इस प्रकार बतलाया है कि दिग्व्रत की मर्यादा के भीतर निष्प्रयोजन, पापरूप मन-वचन-काय की निवृत्ति होती है और अनर्थदण्डव्रत में दिग्व्रत की सीमा के भीतर होने वाले पापपूर्ण व्यर्थ के कार्यों से निवृत्ति होती है । यही इन दोनों में अन्तर है ।



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