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ग्रन्थ

ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 1 - सूत्र 22

From जैनकोष



214. यदि भवप्रत्‍ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्, अथ क्षयोपशमहेतुक: केषामित्‍य आह -
214. यदि भवप्रत्‍यय अवधिज्ञान देव और नारकियोंके होता है तो क्षयोपशमहेतुक अवधिज्ञान किसके होता है, आगे इसी बातको बतलाते हैं –
[1]क्षयोपशमनिमित्त: षड्विकल्‍प: शेषाणाम्।।22।।
क्षयोपशमनिमित्तक अवधिज्ञान छह प्रकारका है, जो शेष अर्थात् तिर्यंचों और मनुष्‍यों के होता है।।22।।
215. अवधिज्ञानावरणस्‍य देशघातिस्‍पर्द्धकानामुदये सति सर्वघातिस्‍पर्द्धकानामुदयाभाव: क्षय: तेषामेवानुदयप्राप्‍तानां सदवस्‍था उपशम:। तौ निमित्तमस्‍येति क्षयोपशमनिमित्त:। स शेषाणां वेदितव्‍य:। के पुन: शेषा: ? मनुष्‍यास्तिर्यञ्चश्‍च। तेष्‍वपि यत्र सामर्थ्‍यमस्ति तत्रैव वेदितव्‍य:। न ह्यसंज्ञिनामपर्याप्‍तकानां च तत्‍सामर्थ्‍यमस्ति। संज्ञिनां पर्याप्‍तकानां च न सर्वेषाम्। केषां तर्हि ? यथोक्तसम्‍यग्‍दर्शनादिनिमित्तसंनिधाने सति शान्‍तक्षीणकर्मणां तस्‍योपलब्धिर्भवति। सर्वस्‍य क्षयोपशमनिमित्तत्‍वे क्षयोपशमग्रहणं नियमार्थं क्षयोपशम एव निमित्तं न भव इति। स एषोऽवधि षड्विकल्‍प:। कुत: ? अनुगाम्‍यननुगामिवर्धमानहीयमानावस्थितानवस्थितभेदात्। कश्चिदवधिर्भास्‍कर-प्रकाशवद् गच्‍छन्‍तमनुग‍च्‍छति। कश्चिन्‍नानुगच्छति तत्रैवातिपतति [2]उन्‍मुखप्रश्‍नादेशिपुरुषवचनवत्। अपरोऽवधि: अरणिनिर्मथनोत्‍पन्‍नशुष्‍कपर्णोपचीयमानेन्‍धननिचयसमिद्धपावकवत्‍सम्‍यग्‍दर्शनादिगुण-विशुद्धिपरिणामसंनिधानाद्यत्‍परिमाण उत्‍पन्‍नस्‍ततो वर्द्धते आ असंख्‍येयलोकेभ्‍य:। अपरोऽवधि: [3]परिच्छिन्‍नोपादानसंतत्‍यग्निशिखावत्‍सम्‍यग्‍दर्शनादिगुणहानिसंक्‍लेशपरिणामवृद्धियोगाद्यत्‍परिमाण उत्‍पन्‍नस्‍ततो हीयते आ अङ्गुलस्‍यासंख्‍येयभागात्। इतरोऽवधि: सम्‍यग्‍दर्शनादिगुणावस्‍थानाद्यत्‍परिमाण उत्‍पन्‍नस्‍तत्‍परिमाण एवा‍वतिष्‍ठते; न हीयते नापि वर्धते लिङ्गवत् आ भावक्षयादाकेवलज्ञानोत्‍पत्‍तेर्वा। अन्‍योऽवधि: सम्‍यग्‍दर्शनादिगुणवृद्धिहानियोगाद्यत्‍परिमाण उत्‍पन्‍नस्‍ततो वर्धते यावदनेन वर्धितव्‍यं हीयते च यावदनेन हातव्‍यं वायुवेगप्रेरितजलोर्मिवत। एवं षड्विकल्‍पोऽवधिर्भवति।
215. अवधिज्ञानावरण कर्मके देशघाती स्‍पर्धकोंका उदय रहते हुए सर्वघाति स्‍पर्धकोंका उदयाभावी क्षय और अनुदय प्राप्‍त इन्‍हींका सदवस्‍थारूप उपशम इन दोनोंके निमित्तसे जो होता है वह क्षयोपशमनिमित्तक अवधिज्ञान है। यह शेष जीवोंके जानना चाहिए। शंका – शेष कौन हैं ? समाधान – मनुष्‍य और तिर्यंच। उनमें भी जिनके सामर्थ्‍य है उन्‍हींके जानना चाहिए। असंज्ञी और अपर्याप्‍तकोंके यह सामर्थ्‍य नहीं है। संज्ञी और पर्याप्‍तकोंमें भी सबके यह सामर्थ्‍य नहीं होती। शंका – तो फिर किनके होती है ? समाधान – यथोक्त सम्‍यग्‍दर्शन आदि निमित्तोंके मिलने पर जिनके अवधिज्ञानावरण कर्म शान्‍त और क्षीण हो गया है उनके यह सामर्थ्‍य होती है। अवधिज्ञान मात्र क्षयोपशमके निमित्तसे होता है तो भी सूत्रमें क्षयोपशम पदका ग्रहण यह नियम करनेके लिए किया है कि उक्त जीवोंके मात्र क्षयोपशम निमित्त है भव नहीं। यह अवधिज्ञान अनुगामी, अननुगामी, वर्धमान, हीयमान, अवस्थित और अनवस्थितके भेदसे छह प्रकारका है। कोई अवधिज्ञान जैसे सूर्य का प्रकाश उसके साथ जाता है वैसे अपने स्‍वामी का अनुसरण करता है। कोई अ‍वधिज्ञान अनुसरण नहीं करता, किंतु जैसे विमुख हुए पुरुषके प्रश्‍नके उत्तरस्‍वरूप दूसरा पुरुष जो वचन कहता है वह वहीं छूट जाता है, विमुख पुरुष उसे ग्रहण नहीं करता है वैसे ही यह अवधिज्ञान भी वहीपर छूट जाता है। कोई अवधिज्ञान जंगलके निर्मन्‍थनसे उत्‍पन्‍न हुई और सूखे पत्तोंसे उपचीयमान ईंधनके समुदाय से वृद्धिको प्राप्‍त हुई अग्निके समान सम्‍यग्‍दर्शनादि गुणोंकी विशुद्धिरूप परिणामोंके सन्निधानवश जितने परिमाणमें उत्‍पन्‍न होता है उससे असंख्‍यात लोक जानने की योग्‍यता होने तक बढ़ता जाता है। कोई अवधिज्ञान परिमित उपादानसन्‍ततिवाली अग्निशिखाके समान सम्‍यग्‍दर्शनादि गुणोंकी हानिसे हुए संक्‍लेश परिणामोंके बढ़नेसे जितने परिमाणमें उत्‍पन्‍न होता है उससे मात्र अंगुलके असंख्‍यातवें भागप्रमाण जाननेकी योग्‍यता होने तक घटता चला जाता है। कोई अवधिज्ञान सम्‍यग्‍दर्शनादि गुणोंके समानरूपसे स्थिर रहनेके कारण जितने परिमाणमें उत्‍पन्‍न होता है उतना ही बना रहता है। पर्यायके नाश होने तक या केवलज्ञानके उत्‍पन्‍न होने तक शरीरमें स्थित मसा आदि चिह्नके समान न घटता और न बढ़ता है। कोई अवधिज्ञान वायुके वेगसे प्रेरित जलकी तरंगोंके समान सम्‍यग्‍दर्शनादि गुणोंकी कभी वृद्धि और कभी हानि होनेसे जिनते परिमाणमें उत्‍पन्‍न होता है उससे बढ़ता है जहाँतक उसे बढ़ना चाहिए और घटता है जहाँतक उसे घटना चाहिए। इस प्रकार अवधिज्ञान छह प्रकारका है।
विशेषार्थ – क्षयोपशनिमित्तक अवधिज्ञानके तीन भेद हैं – देशावधि, परमावधि‍ और सर्वावधि। देशावधि तिर्यंचों और मनुष्‍योंके होता है पर मुनष्‍योंके संयत अवस्‍थामें परमावधि और सर्वावधि‍का प्राप्‍त होना भी सम्‍भव है। मनुष्‍योंके चौथे और पाँचवें गुणस्‍थानमें देशावधि और आगे के गुणस्‍थानोंमें यथासम्‍भव तीनों होते हैं। भव्‍यप्रत्‍यय अवधिज्ञानका अन्‍तर्भाव देशावधि में होता है।


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अगला सूत्र
सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका

  1. ↑ ‘सेसाण खओवसमियाओ।‘—वि. भा. गा. 575।
  2. ↑ –तति। उन्‍मुग्धप्र—ता., ना., मु.।
  3. ↑ –वधि: परिमितपरि—मु.।
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