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ग्रन्थ

ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 1 - सूत्र 26

From जैनकोष



223. इदानीं केवलज्ञानलक्षणाभिधानं प्राप्‍तकालम्। तदुल्‍लङ्घ्‍य ज्ञानानां विषयनिबन्‍ध: परीक्ष्‍यते। कुत: ? तस्‍य ‘मोहक्षयाज्‍ज्ञानदर्शनावरणान्‍तरायक्षयाच्‍च केवलम्’ इत्‍यत्र वक्ष्‍यमाणत्‍वात्। यद्येवमाद्ययोरेव तावन्‍मतिश्रुतयोर्विषयनिबन्‍ध उच्‍यतामित्‍यत आह –
223. अब केवलज्ञानका लक्षण कहनेका अवसर है। किन्‍तु उसका कथन न कर पहले ज्ञानोंके विषयका विचार करते हैं, क्‍योंकि केवलज्ञानका लक्षण ‘मोहक्षयाज्‍ज्ञानदर्शनावरणान्‍तरायक्षयाच्‍च केवलम्’ यहाँ कहेंगे। यदि ऐसा है तो सर्वप्रथम आदिमें आये हुए मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके विषयका कथन करना चाहिए। इसी बातको ध्‍यानमें रखकर आगेका सूत्र कहते हैं -
मतिश्रुतयोर्निबन्‍धो द्रव्‍येष्‍वसर्वपर्यायेषु।।26।।
मतिज्ञान और श्रुतज्ञानकी प्रवृत्ति कुछ पर्यायोंसे युक्त सब द्रव्‍योंमें होती है।।26।।
224. निबन्‍धनं निबन्‍ध:। कस्‍य ? विषस्‍य। तद्विषयग्रहणं कर्तव्‍यम् ? न कर्त्तव्‍यम्। प्रकृतं विषयग्रहणम्। क्‍व प्रकृतम् ? ‘विशुद्धिक्षेत्रस्‍वामिविषयेभ्‍य:’ [1]इत्‍यत्र। अतस्‍तस्‍यार्थवशाद्विभक्तिपरिणामो भवतीति विषयस्‍य’ इत्‍यभिसंबध्‍यते। ‘द्रव्‍येषु’ इति बहुवचननिर्देश: सर्वेषां जीवधर्माधर्म[2]कालाकाश-पुद्गलानां संग्रहार्थ:। तद्विशेषणार्थ ‘असर्वपर्याय’ ग्रहणम्। तानि द्रव्‍याणि मतिश्रुतयोर्विषयभावमापद्य-मानानि कतिपयैरेव पर्यायैर्विषयभावमास्‍कन्‍दन्ति न सर्वपर्यायैरनन्‍तैरपीति। अत्राह – धर्मास्तिकायादीन्‍यतीन्द्रियाणि तेषु मतिज्ञानं न प्रवर्तते। अत: सर्वद्रव्‍येषु मतिज्ञानं वर्तत इत्‍ययुक्तम् ? नैष दोष:; अनिन्द्रियाख्‍यं करणमस्ति तदालम्‍बनो नोइन्द्रियावरणक्षयोपशमलब्धिपूर्वक उपयोगोऽ-वग्रहादिरूप: प्रागेवोपजायते। ततस्‍तत्‍पूर्वं श्रुतज्ञानं तद्विषयेषु स्‍वयोग्‍येषु व्‍याप्रियते।
224. निबन्‍ध शब्‍दका व्‍युत्‍पत्तिलभ्‍य अर्थ है- निबन्‍धनं निबन्‍ध: - जोड़ना, सम्‍बन्‍ध करना। शंका – किसका सम्‍बन्‍ध ? समाधान – विषयका। शंका – तो सूत्रमें विषय पदका ग्रहण करना चाहिए ? समाधान - नहीं करना चाहिए, क्‍योंकि विषय पदका ग्रहण प्रकरण प्राप्‍त है। शंका – कहाँ प्रकरणमें आया है ? समाधान – ‘विशुद्धिक्षेत्रस्‍वामिविषयेभ्‍य:’ इस सूत्रमें आया है। वहाँसे ‘विषय’ पदको ग्रहण कर अर्थके अनुसार उसकी विभक्ति बदल ली है, इसलिए यहाँ षष्‍ठी विभक्तिके अर्थमें उसका ग्रहण हो जाता है। सूत्रमें ‘द्रव्‍येषु’ बहुवचनान्‍त पदका निर्देश जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल इन सब द्रव्‍योंका संग्रह करनेके लिए किया है। और इन सब द्रव्‍योंके विशेषणरूपसे ‘असर्वपर्यायेषु’ पदका ग्रहण किया है। वे सब द्रव्‍य मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके विषयभावको प्राप्‍त होते हुए कुछ पर्यायोंके द्वारा ही विषयभावको प्राप्‍त होते हैं, सब पर्यायोंके द्वारा नहीं और अनन्‍त पर्यायोंके द्वारा भी नहीं। शंका – धर्मास्तिकाय आदि अ‍तीन्द्रिय हैं। उनमें मतिज्ञानकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती, अत: ‘सब द्रव्‍योंमें मतिज्ञानकी प्रवृत्ति होती है’ य‍ह कहना अयुक्त है ? समाधान – यह कोई दोष नहीं है, क्‍योंकि अनिन्द्रिय नामका एक करण है। उसके आलम्‍बनसे नोइन्द्रियावरण कर्मके क्षयोपशमरूप लब्धिपूर्वक अवग्रह आदिरूप उपयोग पहले ही उत्‍पन्‍न हो जाता है, अत: तत्‍पूर्वक होनेवाला श्रुतज्ञान अपने योग्‍य इन विषयोंमें व्‍यापार करता है।


पूर्व सूत्र
अगला सूत्र
सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका

  1. ↑ –येभ्‍य इत्‍यतस्‍त—दि. 1, दि. 2, आ. , मु.।
  2. ↑ धर्माकाश—मु.।
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