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ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 1 - सूत्र 4

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17. तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनमित्युक्तम्। अथ किं तत्त्वमित्यत इदमाह –
17. जीवादि पदार्थोंका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है यह पहले कह आये हैं। अब तत्त्व कौन-कौन हैं इस बातके बतलाने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
जीवाजीवास्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम्।।4।।
जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये तत्त्व हैं।।4।।
18. तत्र चेतनालक्षणो जीव:। सा च ज्ञानादिभेदादनेकधा भिद्यते। तद्विपर्ययलक्षणोऽजीव:। शुभाशुभकर्मागमद्वाररूपो आस्रव:। आत्मकर्मणोरन्योऽन्यप्रदेशानुप्रवेशात्मको बन्ध:। आस्रवनिरोधलक्षण: संवर:। एकदेशकर्मसंक्षयलक्षणा निर्जरा। कृत्स्नकर्म वियोगलक्षणो मोक्ष:। एषां प्रपञ्च उत्तरत्र वक्ष्यते। सर्वस्य फलस्यात्माधीनत्वादादौ जीवग्रहणम्। तदुपकारार्थत्वात्तदनन्तरमजीवाभिधानम्। तदुभयविषयत्वा-त्तदनन्तरमास्रवग्रहणम्। तत्पूर्वकत्वात्तदनन्तरं बन्धाभिधानम्। संवृतस्य बन्धाभावात्तत्प्रत्यनीक-प्रतिपत्त्यर्थं तदनन्तरं संवरवचनम्। संवरे सति निर्जरोपपत्तेस्तदन्तिके निर्जरावचनम्। अन्ते प्राप्यत्वान्मोक्षस्यान्ते वचनम्।
18. इनमें-से जीवका लक्षण चेतना है जो ज्ञानादिकके भेदसे अनेक प्रकारकी है। जीवसे विपरीत लक्षणवाला अजीव है। शुभ और अशुभ कर्मोंके आनेके द्वार रूप आस्रव है। आत्मा और कर्मके प्रदेशोंका परस्पर मिल जाना बन्ध है। आस्रवका रोकना संवर है। कर्मोंका एकदेश अलग होना निर्जरा है और सब कर्मोंका आत्मासे अलग हो जाना मोक्ष है। इनका विस्तारसे वर्णन आगे करेंगे। सब फल जीवको मिलता है, अत: सूत्रके प्रारम्भमें जीवका ग्रहण किया है। अजीव जीवका उपकारी है यह दिखलाने के लिए जीवके बाद अजीवका कथन किया है। आस्रव जीव और अजीव दोनोंको विषय करता है अत: इन दोनोंके बाद आस्रवका ग्रहण किया है। बन्ध आस्रव पूर्वक होता है, इसलिए आस्रवके बाद बन्धका कथन किया है। संवृत जीवके बन्ध नहीं होता, अत: संवर बन्धका उलटा हुआ इस बातका ज्ञान करानेके लिए बन्धके बाद संवरका कथन किया है। संवरके होनेपर निर्जरा होती है, इसलिए संवरके पास निर्जरा कही है। मोक्ष अन्तमें प्राप्त होता है, इसलिए उसका अन्तमें कथन किया है।
19. इह पुण्यपापग्रहणं कर्त्तव्यम्। ‘नव पदार्था:’ इत्यन्यैरप्युक्तत्वात्। न कर्त्तव्यम्, आस्रवे बन्धे चान्तर्भावात्। यद्येवमास्रवादिग्रहणमनर्थकं, जीवाजीवयोरन्तर्भावात्। नानर्थकम्। इह मोक्ष: प्रकृत:। सोऽवश्यं निर्देष्टव्य:। स च संसारपूर्वक:। संसारस्य प्रधानहेतुरास्रवो बन्धश्च। मोक्षस्य प्रधानहेतु: संवरो निर्जरा च। अत: प्रधानहेतुहेतुमत्फलनिदर्शनार्थत्वात्पृथगुपदेश: कृत:। दृश्यते हि सामान्येऽन्तर्भूतस्यापि विशेषस्य पृथगुपादानं प्रयोजनार्थम्। ‘क्षत्रिया आयाता: सूरवर्माऽपि’ इति।
19. शंका – सूत्रमें पुण्य और पापका ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि पदार्थ नौ हैं ऐसा दूसरे आचार्योंने भी कथन किया है। समाधान – पुण्य और पापका ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनका आस्रव और बन्धमें अन्तर्भाव हो जाता है। शंका – यदि ऐसा है तो सूत्रमें अलगसे आस्रव आदिका ग्रहण करना निरर्थक है, क्योंकि उनका जीव और अजीवमें अन्तर्भाव हो जाता है। समाधान – आस्रव आदिका ग्रहण करना निरर्थक नहीं है, क्योंकि यहाँ मोक्षका प्रकरण है इसलिए उसका कथन करना आवश्यक है। वह संसारपूर्वक होता है और संसारके प्रधान कारण आस्रव और बन्ध हैं तथा मोक्षके प्रधान कारण संवर और निर्जरा हैं, अत: प्रधान हेतु, हेतुवाले और उनके फलके दिखलानेके लिए अलग-अलग उपदेश किया है। देखा भी जाता है कि किसी विशेषका सामान्यमें अन्तर्भाव हो जाता है तो भी प्रयोजनके अनुसार उसका अलगसे ग्रहण किया जाता है। जैसे क्षत्रिय आये हैं और सूरवर्मा भी। यहाँ यद्यपि सूरवर्माका क्षत्रियोंमें अन्तर्भाव हो जाता है तो भी प्रयोजनके अनुसार उसका अलगसे ग्रहण किया है। इसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए।
20. तत्त्वशब्दो भाववाचीत्युक्त:। स कथं जीवादिभिर्द्रव्यवचनै: सामानाधिकरण्यं प्रतिपद्यते ? अव्यतिरेकात्तद्भावाध्यारोपाच्च सामानाधिकरण्यं भवति। यथा ‘उपयोग एवात्मा’ इति। यद्येवं तत्तल्लिङ्गसंख्यानुवृत्ति: प्राप्नोति ? ‘विशेषणविशेष्यसंबन्धे सत्यपि शब्दशक्तिव्यपेक्षया उपात्तलिङ्गसंख्या-व्यतिक्रमो न भवति।’ अयं क्रम आदिसूत्रेऽपि योज्य:।
20. शंका – तत्त्व शब्द भाववाची है यह पहले कह आये हैं, इसलिए उसका द्रव्यवाची जीवादि शब्दोंके साथ समानाधिकरण कैसे हो सकता है ? समाधान – एक तो भाव द्रव्यसे अलग नहीं पाया जाता, दूसरे भावमें द्रव्यका अध्यारोप कर लिया जाता है, इसलिए समानाधिकरण बन जाता है। जैसे, ‘उपयोग ही आत्मा है’ इस वचनमें गुणवाची उपयोग शब्दके साथ द्रव्यवाची आत्मा शब्दका समानाधिकरण है उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए । शंका – यदि ऐसा है तो विशेष्यका जो लिंग और संख्या है वही विशेषणको भी प्राप्त होते हें ? समाधान – व्याकरणका ऐसा नियम है कि ‘विशेषण-विशेष्य सम्बन्धके रहते हुए भी शब्द शक्तिकी अपेक्षा जिसने जो लिंग और संख्या प्राप्त कर ली है उसका उल्लंघन नहीं होता।’ अत: यहाँ विशेष्य और विशेषणसे लिंग और संख्याके अलग-अलग रहने पर भी कोई दोष नहीं है। यह क्रम प्रथम सूत्रमें भी लगा लेना चाहिए।
विशेषार्थ – इस सूत्रमें सात तत्त्वोंका निर्देश किया गया है। इसकी व्याख्या करते हुए मुख्यतया पाँच बातोंपर प्रकाश डाला गया है, जो इस प्रकार है – 1. जीवादि सात तत्त्वोंका स्वरूप-निर्देश । 2. सूत्रमें जीव अजीव इस क्रमसे सात तत्त्वोंके निर्देश करनेकी सार्थकता। 3. पुण्य और पापको पृथक् तत्त्व नहीं सूचित करनेका कारण। 4. भाववाची शब्दोंका द्रव्यवाची शब्दोंके साथ कैसे समानाधिकरण बनता है इसकी सिद्धि। 5. विशेषण और विशेष्यमें समान लिंग और समान संख्या क्यों आवश्यक नहीं इसका निर्देश।

तीसरी बातको स्पष्ट करते हुए जो लिखा है उसका आशय यह है कि जीवकी शुभाशुभ प्रवृत्तिके आधारसे बँधनेवाले कर्मोंमें अनुभागके अनुसार पुण्य-पापका विभाग होता है, इसलिए आस्रव और बन्धमें इनका अन्तर्भाव किया गया है। पाँचवीं बातको स्पष्ट करते हुए जो यह लिखा है कि विशषण-विशेष्य सम्बन्धके रहते हुए भी शब्द शक्तिकी अपेक्षा जिसने जो लिंग और संख्या प्राप्त कर ली है उसका उल्लंघन नहीं होता, सो इसका यह आशय है कि एक तो जिस शब्दका जो लिंग है वह नहीं बदलता। उदाहरणार्थ ‘ज्ञानं आत्मा’ इस प्रयोगसे ज्ञान शब्द नपुंसक लिंग और आत्मा शब्द पुंलिंग रहते हुए भी इनमें बदल नहीं होता। इन दोनों शब्दोंका विशेषण-विशेष्य रूपसे जब भी प्रयोग किया जायेगा तब वह इसी प्रकार ही किया जायेगा। दूसरे, प्रयोगके समय जिस शब्द ने जो संख्या प्राप्त कर ली है उसमें भी बदल नहीं होता। जैसे ‘साधो: कार्यं तप:श्रुते’ इस प्रयोगमें विशेषण-विशेष्य सम्बन्धके रहते हुए भी ‘कार्यम्’ एकवचन है और ‘तप-श्रुते’ में द्विवचन है। इसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए। शेष कथन सुगम है।


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