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ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 1 - सूत्र 9

From जैनकोष



163. एवं सम्‍यग्‍दर्शनस्‍यादावुद्दिष्‍टस्‍य लक्षणोत्‍पत्तिस्‍वामिविषयन्‍यासाधिगमोपाया निर्दिष्टा:। तत्‍संबन्‍धेन च जीवादीनां संज्ञापरिमाणादि निर्दिष्‍टम्। तदनन्‍तरं सम्‍यग्‍ज्ञानं विचारार्हमित्‍याह -
163. इस प्रकार सर्व प्रथम कहे गये सम्‍यग्‍दर्शनके लक्षण, उत्‍पत्ति, स्‍वामी, विषय न्‍यास और अधिगमका उपाय कहा। और उसके सम्‍बन्‍धसे जीवादिकोंकी संज्ञा और परिमाण आदि भी कहा। अब इसके बाद सम्‍यग्‍ज्ञान विचार योग्‍य है इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं –
मतिश्रुतावधिमन:पर्ययकेवलानि ज्ञानम्।।9।।
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये पाँच ज्ञान हैं।।9।।
164. ज्ञानशब्‍द: प्रत्‍येकं परिसमाप्‍यते। मतिज्ञानं श्रुतज्ञानं अवधिज्ञानं मन:पर्ययज्ञानं केवलज्ञानमिति। इन्द्रियैर्मनसा च यथास्‍वमर्थो[1] मन्‍यते अनया मनुते मननमात्रं वा मति:। तदावरण[2]कर्मक्षयोपशमे सति निरूप्‍यमाणं श्रूयते अनेन[3] तत् शृणोति श्रवणमात्रं वा श्रुतम्। अनयो: प्रत्‍यासन्‍ननिर्देश: कृत: कार्यकारणभावात्। तथा च वक्ष्‍यते ‘‘श्रुतं मतिपूर्वम्’’ इति। [4]अवाग्‍धानादवच्छिन्‍नविषयाद्वा अवधि:। परकीयमनोगतोऽर्थो मन इत्‍युच्‍यते। साहचर्यात्तस्‍य पर्ययणं परिगमनं मन:पर्यय:। मतिज्ञानप्रसङ्ग इति चेत्; न; अपेक्षामात्रत्‍वात्। क्षयोपशमशक्तिमात्रविजृम्भितं हि तत्‍केवलं स्‍वपरमनोभिर्व्‍यपदिश्‍यते। यथा अभ्रे चन्‍द्रमसं पश्‍येति। बाह्येनाभ्‍यन्‍तरेण च तपसा यदर्थमर्थिनो मार्ग केवन्‍ते सेवन्‍ते तत्‍केवलम्। असहायमिति वा। तदन्‍ते प्राप्‍यते इति अ‍न्‍ते क्रियते। तस्‍य प्रत्‍यासन्नत्‍वात्तत्‍समीपे मन:पर्ययग्रहणम्। कुत: प्रत्‍यासत्ति:। संयमैकाधिकरणत्‍वात्। तस्‍य अवधिर्विप्रकृष्‍ट:। कुत: विप्रकृष्‍टान्‍त[5]रत्‍वात्। प्रत्‍यक्षात्‍परोक्षं पूर्वमुक्तं सुगमत्‍वात्। श्रुतपरिचितानुभूता[6] हि मतिश्रुतपद्धति: सर्वेण प्राणिगणेन प्राय: प्राप्‍यते यत:। एवमेतत्‍पञ्चविधं ज्ञानम्। तद्भेदादयश्‍च पुरस्ताद्वक्ष्‍यन्‍ते।
164. सूत्रमें ज्ञान शब्‍द मति आदि प्रत्‍येक शब्‍दके साथ जोड़ लेना चाहिए। यथा – मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान। मतिका व्‍युत्‍पत्तिलभ्‍य अर्थ है – ‘इन्द्रियैर्मनसा च यथा स्‍वमर्थो मन्‍यते अनया मनुते मननमात्रं वा मति:’ = इन्द्रिय और मनके द्वारा यथायोग्‍य पदार्थ जिसके द्वारा मनन किये जाते हैं, जो मनन करता है या मननमात्र मति कहलाता है। श्रुतका व्‍युत्‍पत्तिलभ्‍य अर्थ है – ‘तदावरणकर्मक्षयोपशमे सति निरूप्‍यमाणं श्रूयते अनेन श्रृणोति श्रवणमात्रं वा श्रुतम्’ = श्रुतज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होने पर निरूप्‍यमाण पदार्थ जिसके द्वारा सुना जाता है, जो सुनता है या सुननामात्र श्रुत कहलाता है। मति और श्रुत इन दोनों ज्ञानोंका समीपमें निर्देश किया है क्‍योंकि इनमें कार्य-कारणभाव पाया जाता है। जैसा कि आगे कहेंगे ‘श्रुतं मतिपूर्वम्।‘ अवधिका व्‍युत्‍पत्तिलभ्‍य अर्थ = अधिकतर नीचेके विषयको जानने वाला होनेसे या परिमित विषयवाला होनेसे अवधि कहलाता है। मन:पर्ययका व्‍युत्‍पत्तिलभ्‍य अर्थ = दूसरेके मनोगत अर्थको मन कहते हैं। सम्‍बन्‍धसे उसका पर्ययण अर्थात् परिगमन करनेवाला ज्ञान मन:पर्यय कहलाता है। शंका – मन:पर्यय ज्ञानका इस प्रकार लक्षण करने पर उसे मतिज्ञानका प्रसंग प्राप्‍त होता है ? समाधान – नहीं, क्‍योंकि मन:पर्ययज्ञानमें मनकी अपेक्षामात्र है। यद्यपि वह केवल बढ़ी हुई क्षयोपशम शक्तिसे अपना काम करता है तो भी केवल स्‍व और परके मनकी अपेक्षा उसका व्‍यवहार किया जाता है। यथा- ‘आकाशमें चन्‍द्रमा देखो’ यहाँ आकाशकी अपेक्षामात्र होनेसे ऐसा व्‍यवहार किया गया है। केवलका व्‍युत्‍पत्तिलभ्‍य अर्थ =अर्थीजन जिसके लिए बाह्य और आभ्‍यन्‍तर तपके द्वारा मार्गका केवन अर्थात् सेवन करते हैं वह केवलज्ञान कहलाता है। अथवा केवल शब्‍द असहायवाची है, इसलिए असहाय ज्ञानको केवलज्ञान कहते हैं। केवलज्ञानकी प्राप्ति अन्‍तमें होती है इसलिए सूत्रमें उसका पाठ सबके अन्‍तर में रखा है। उसके समीपका होनेसे उसके समीपमें मन:पर्ययका ग्रहण किया है। शंका – मन:पर्यय केवलज्ञानके समीपका क्‍यों है ? समाधान – क्‍योंकि इन दोनोंका संयम ही एक आधार है, अतएव मन:पर्यय केवलज्ञानके समीपका है। अवधिज्ञान मन:पर्ययज्ञानसे दूर है, इसलिए उसका मन:पर्ययज्ञानके पहले पाठ रखा है। शंका – मन:पर्ययज्ञानसे अवधिज्ञानको दूरका क्‍यों कहा ? समाधान – क्‍योंकि अवधिज्ञान मन:पर्ययज्ञानसे अत्‍यन्‍त दूर है। प्रत्‍यक्षसे परोक्षका पहले कथन किया, क्‍योंकि वह सुगम है। चूँकि मति-श्रुतपद्धति श्रुत, परिचित और अनुभूत होनेसे प्राय: सब प्राणियोंके द्वारा प्राप्‍त करने योग्‍य है अत: वह सुगम है। इस प्रकार यह पाँच प्रकारका ज्ञान है। इसके भेद आदि आगे कहेंगे।
विशेषार्थ – क्रमानुसार इस सूत्रमें सम्‍यग्‍ज्ञानके पाँच भेद बतलाये गये हैं। यद्यपि सूत्रमें ‘ज्ञानम्’ ऐसा निर्देश कि है पर सम्‍यक्‍त्‍वका प्रकरण होनेसे ये पाँचों सम्‍यग्‍ज्ञानके भेद हैं, ऐसा यहाँ जानना चाहिए। यद्यपि आत्‍मा केवलज्ञान स्‍वभाव है। मूल ज्ञानमें कोई भेद नहीं है पर आवरणके भेदसे वह पाँच भागोंमें विभक्त हो जाता है। इस सूत्रकी व्‍याख्‍या करते हुए सर्वार्थसिद्धिमें मुख्‍यतया तीन विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है - 1. मति आदि शब्‍दोंका व्‍युत्‍पत्तिलभ्‍य अर्थ। 2. मति और श्रुतको समीपमें रखनेके कारणका निर्देश। 3. मतिके बाद श्रुत इत्‍यादि रूपसे पाँच ज्ञानोंके निर्देश करनेका कारण।


पूर्व सूत्र
अगला सूत्र
सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका

  1. ↑ स्‍वमर्थान्‍मन्‍यते मु.।
  2. ↑ –वरणक्षयो—मु.।
  3. ↑ अनेनेति तत्—मु.।
  4. ↑ ‘अवाग्‍धानादवधि: अथवा अधोगौरवधर्मत्‍वात्‍पुद्गल: अवाङ् नाम तं दधाति परिच्छिनत्‍तीति अवधि: अवधिरेव ज्ञानं अवधिज्ञानम्। अथवा अवधिर्मर्यादा अवधिना सह वर्तमानज्ञानमवधिज्ञानम्।‘ –धव. प्र. अ. प. 865 आरा।
  5. ↑ विप्रकृष्‍टतर—मु.।
  6. ↑ ‘सुदपरिचिदाणुभूदा—’—स. प्रा. मा. 4।
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