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ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 2 - सूत्र 2

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254. अत्राह तस्‍यैकस्‍यात्‍मनो ये भावा औपशमिकादयस्‍ते किं भेदवन्‍त उताभेदा इति। अत्रोच्‍यते, भेदवन्‍त:। यद्येवं, भेदा उच्‍यन्‍तामित्‍यत आह -
254. उस एक आत्‍मा के जो औपशमिक आदि भाव हैं, उनके कोई भेद हैं या नहीं ? भेद हैं। यदि ऐसा है तो इनके भेदों का कथन करना चाहिए, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं –
द्विनवाष्‍टादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमम्।।2।।
उक्त पाँच भावों के क्रमसे दो, नौ, अठारह, इक्‍कीस और तीन भेद हैं।।2।।
255. द्व्यादीनां संख्‍याशब्‍दानां कृतद्वन्‍द्वानां भेदशब्‍देन सह स्‍वपदार्थेऽन्‍यपदार्थे वा वृत्तिर्वेदितव्‍या। द्वौ च नव च अष्‍टादश च एकविंशतिश्‍च त्रयश्‍च द्विनवाष्‍टादशैकविंशतित्रय:[1]। ते च ते भेदाश्‍च, त एव भेदा येषामिति वा वृत्ति‍र्द्विनवाष्‍टादशैकविंशतित्रिभेदा इति। यदा स्‍वपदार्थे वृत्तिस्‍तदा औपशमिकादीनां[2] भावानां द्विनवाष्‍टादशैकविंशतित्रयो भेदा इत्‍यभिसंबन्‍ध: क्रियते; अर्थवशाद्विभक्तिपरिणाम इति। यदान्‍यपदार्थे वृत्तिस्‍तदा निर्दिष्‍टविभक्‍त्‍यन्‍ता एवाभिसंबध्‍यन्‍ते, औपशमिकादयो भावा द्विनवाष्‍टादशैकविंशतित्रिभेदा इति। ‘यथाक्रम’ वचनं यथासंख्‍यप्रतिपत्‍त्‍यर्थम्। औपशमिको द्विभेद:। क्षायिको नवभेद:। मिश्रोऽष्‍टादशभेद:। औदयिक एकविंशतिभेद: । पारिणामिकस्त्रिभेद इति।
255. संख्‍यावाची दो आदि शब्‍दों का द्वन्‍द्व समास करके पश्‍चात् उनका भेद शब्‍द के साथ स्‍वपदार्थ में या अन्‍यपदार्थ में समास जानना चाहिए। स्‍वपदार्थ प्रधान समास यथा – द्वौ च नव च अष्‍टादश च एकविंशतिश्‍च त्रयश्‍च इति द्विनवाष्‍टादशैकविंशतित्रय:, ते एव भेदा: इति द्विनवाष्‍टादशैकविंशतित्रिभेदा:। अन्‍य पदार्थ प्रधान समास यथा – द्विनवाष्‍टादर्शकविंशतित्रयो भेदा येषां ते द्विनवाष्‍टादशैकविंशतित्रिभेदा:। जब स्‍वपदार्थ में समास करते हें तब औपशमिक आदि भावोंके दो, नौ, अठारह, इक्‍कीस और तीन भेद हैं ऐसा सम्‍बन्‍ध कर लेते हैं। यद्यपि पूर्व सूत्र में औपशमिक आदि पद की षष्‍ठी विभक्ति नहीं है तो भी अर्थवश विभक्ति बदल जाती है। और जब अन्‍य पदार्थों में समास करते हैं तब विभक्ति बदलने का कोई कारण नहीं रहता। सूत्र में इनकी विभक्तिका जिस प्रकार निर्देश किया है तदनुसार सम्‍बन्‍ध हो जाता है। सूत्र में ‘यथाक्रम’ वचन यथासंख्‍या के ज्ञान कराने के लिए दिया है। तथा – औपशमिक भाव के दो भेद हैं, क्षायिक के नौ भेद हैं, मिश्रके अठारह भेद हैं, औदयिकके इक्‍कीस भेद हैं और पारिणामिक के तीन भेद हैं।


पूर्व सूत्र
अगला सूत्र
सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका

  1. ↑ त्रय:। त एव भेदा:--मु.।
  2. ↑ --दीनां द्वि—मु.
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  • This page was last edited on 25 September 2024, at 15:11.
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