• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 2 - सूत्र 31

From जैनकोष



321. एवं गच्‍छतोऽभिनवमूर्त्‍यन्‍तरनिर्वृत्ति[1]प्रकारप्रतिपादनार्थमाह--
321. इस प्रकार अन्‍य गतिको गमन करनेवाले जीवके नूतन दूसरे पर्यायकी उत्‍पत्तिके भेदोंको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं –
संमूर्च्‍छनगर्भोपपादा जन्‍म।।31।।
सम्‍मूर्च्‍छन, गर्भ और उपपाद ये (तीन) जन्‍म हैं।।31।।
322. त्रिषु लोकेषूर्ध्‍वमधस्तिर्यक् च देहस्‍य समन्‍ततो मूर्च्‍छनं संमूर्च्‍छनमवयवप्रकल्‍पनम्। स्त्रिया उदरे [2]शुक्रशोणितयोर्गरणं मिश्रणं गर्भ:। [3]मात्रुपभुक्‍ताहारगरणाद्वा गर्भ:। उपेत्‍य[4] पद्यतेऽस्मिन्निति उपपाद:। देवनारकोत्‍पत्तिस्‍थानविशेषसंज्ञा। ऐते त्रय: संसारिणां जीवानां जन्‍मप्रकारा: शुभाशुभपरिणामनिमित्त-कर्मभेदविपाककृता:।
322. तीनों लोकोंमें ऊपर, नीचे और तिरछे देहका चारों ओरसे मूर्च्‍छन अर्थात् ग्रहण होना संमूर्च्‍छन है। इसका अभिप्राय है चारों ओरसे पुद्गलोंका ग्रहण कर अवयवोंकी रचना होना। स्‍त्रीके उदरमें शुक्र और शोणितके परस्‍पर गरण अर्थात् मिश्रणको गर्भ कहते हैं। अथवा माताके द्वारा उपभुक्‍त आहारके गरण होनेको गर्भ कहते हैं। प्राप्‍त होकर जिसमें जीव हलन-चलन करता है उसे उपपाद कहते हैं। उपपाद यह देव और नारकियोंके उत्‍पत्तिस्‍थान विशेषकी संज्ञा है। संसारी जीवोंके ये तीनों जन्‍मके भेद हैं, जो शुभ और अशुभ परिणामोंके निमित्तसे अनेक प्रकारके कर्म बँधते हैं, उनके फल हैं।


पूर्व सूत्र
अगला सूत्र
सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका

  1. ↑ -निर्वृत्तिजन्‍मप्रका-मु.।
  2. ↑ शुक्‍लशोणित- ता., ना.,दि. 1, मु.।
  3. ↑ मात्रोपभुक्‍त- मु.। मात्रोपयुक्‍त—दि. 1, दि. 2।
  4. ↑ उपेत्‍योत्‍पद्य- मु.।
Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि_-_अधिकार_2_-_सूत्र_31&oldid=135205"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 25 September 2024, at 15:11.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki