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ग्रन्थ:हरिवंश पुराण - सर्ग 14

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अथानंतर जंबूद्वीप में एक वत्स नाम का देश है जो दूसरे देशों के विद्यमान रहते हुए दोहनकर्ता जब गाय को दुहते हैं तब सचमुच ही वत्स-बछड़ें की आकृति को धारण करता है । भावार्थ― जिस प्रकार वत्स गाय के दूध निकालने में सहायक है उसी प्रकार यह देश भी गौ-पृथिवी से धन-संपत्ति निकालने में सहायक था ॥1॥ यमुना नदी के स्निग्ध एवं नीले जल में जिसके महलों का समूह सदा प्रतिबिंबित रहता था ऐसी कौशांबी नगरी उस वत्स देश की गहरी नाभि के समान अतिशय सुशोभित थी ॥2॥ वप्र, प्राकार और परिखारूपी आभूषण तथा अंबर-आकाश (पक्ष में वस्त्र) को धारण करने वाली वह नगरी नितंब और स्तनों के भार से पीड़ित होकर खड़ी हुई स्त्री के समान जान पड़ती थी ॥3॥ वह नगरी प्रौढ़ अभिसारिका के समान जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार प्रौढ़ अभिसारिका रत्न-चित्रांबरधरा-रत्नों से चित्र-विचित्र वस्त्र को धारण करती है उसी प्रकार वह नगरी भी रत्न-चित्रांबरधरा-रत्नों से चित्र-विचित्र आकाश को धारण करती थी, और अभिसारिका जिस प्रकार रात्रि के समय अपने स्नेही जनों का प्रसन्न मुख से स्पर्श करती है उसी प्रकार वह नगरी भी वर्षा ऋतुरूपी रात्रि के समय स्निग्ध-नूतन जल से भरे मेघों का महलरूपी मुखों से स्पर्श करती थी ॥4॥ अथवा वह नगरी कृष्णपक्ष की रात्रियों में पतिव्रता स्त्री के समान सुशोभित होती थी क्योंकि जिस प्रकार पतिव्रता स्त्री दोषाकरकराप्राप्ता― दोषों की खान स्वरूप दुष्ट मनुष्यों के हाथ से अस्पृष्ट रहती है उसी प्रकार वह नगरी भी बहुल दोषासु― कृष्णपक्ष को रात्रि में दोषाकरकराप्राप्ता― चंद्रमा की किरणों से अस्पृष्ट थी और पतिव्रता स्त्री जिस प्रकार अनेक दोषों से भरी व्यभिचारिणी स्त्रियों में रत्नमय आभूषणों की किरणों के समूह से उत्कृष्ट शोभा को प्राप्त होती है, उसी प्रकार वह नगरी भी बहुल दोषासु― कृष्णपक्ष की रात्रियों में रत्नमय आभूषणों की किरणों से उत्कृष्ट शोभा को प्राप्त थी ॥5॥ उस कौशांबी नगरी का स्वामी राजा सुमुख था । वह सुमुख ठीक सूर्य के समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार सूर्य प्रतापप्रभवः― प्रकृष्ट संताप का कारण है उसी प्रकार वह राजा भी प्रतापप्रभवः― उत्कृष्ट प्रभाव का कारण था । जिस प्रकार सूर्यकराक्रांतदिक्चक्र:― अपनी किरणों से दिङ्मंडल को व्याप्त कर लेता है उसी प्रकार वह राजा भी कराक्रांतदिक्चक्र:― अपने तेज से दिङमंडल को व्याप्त कर रहा था, और जिस प्रकार सूर्य सुखी-सु-उत्तम ख-आकाश से सहित होता है उसी प्रकार वह राजा भी सुखी-सुख से सहित था॥6॥ राजा सुमुख के धनुष ने अपने गुणों से इंद्रधनुष को तिरस्कृत कर दिया था क्योंकि राजा सुमुख का धनुष वर्णसंकरविक्षेपि― ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन वर्गों के संकर दोष को दूर करने वाला था और इंद्रधनुष अक्षिप्तवर्णसंकरदोषकं― लाल, पीले, नीले, हरे आदि वर्गों के संकर― संमिश्रणरूपी दोष को दूर नहीं कर सका था ॥7॥ तारुण्य-लक्ष्मी से सहित होने के कारण राजा सुमुख का शरीर अत्यंत सुंदर था अतः जिसका शरीर ही नहीं दिखाई देता ऐसा कामदेव सौंदर्य में उसके समान कैसे हो सकता था ॥8॥ वह राजा धर्मशास्त्र के अर्थ करने में कुशल था, कला और गुणों से विशिष्ट था, दुष्टों का निग्रह और सज्जनों का अनुग्रह करने में समर्थ था और प्रजा का सच्चा रक्षक था ॥9॥ वह राजा अंतःपुररूपी कमलवन की पंक्ति का भ्रमर था और धर्म, अर्थ, काम में परस्पर बाधा नहीं पहुंचाता हुआ आगत ऋतुओं का सम्मान करता था अर्थात् ऋतुओं के अनुकूल भोग भोगता था ॥10॥

अथानंतर किसी समय वसंत ऋतु का आगमन हुआ । वह वसंत ऋतु ठीक सुमुख राजा के ही समान जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार सुमुख राजा उद्यमी-उद्यम से संपन्न था उसी प्रकार वसंत ऋतु भी उद्यमी-अपना वैभव बतलाने में उद्यम संपन्न थी, जिस प्रकार राजा सुमुख फूलों और पल्लवों के राग से युक्त वनमाला नामक स्त्री के मन को हरण करने वाला था उसी प्रकार वसंत ऋतु भी फूलों और पल्लवों की लाल-लाल शोभा से युक्त वन पंक्तियों से मनोहर थी ॥11॥ मनुष्यों के मन को हरण करने वाले आमों के वृक्ष उस समय नये-नये पल्लवों की लालिमा से युक्त हो गये थे जिससे ऐसे जान पड़ते थे मानो राजा सुमुख के लिए वनमाला― वनपंक्ति (पक्ष में वनमाला नामक स्त्री) के अनुराग की सूचना ही दे रहे हों ॥12॥ अग्निज्वालाओं की शोभा को धारण करने वाले टेसू के वृक्ष ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो विरह के अनंतर मिले हुए स्त्री-पुरुषों के द्वारा छोड़ी हुई विरहाग्नि ही हो ॥13 ॥ रुनझुन करने वाले नूपुरों से सुंदर स्त्री के कोमल पदाघात से ताड़ित होने के कारण जिसमें पल्लवरूपी रोमांच निकल आये थे ऐसा अशोक वृक्षरूपी नवीन युवा उस समय अत्यधिक सुशोभित हो रहा था॥14 ॥ अखंड मद्य के कुल्लों के पान करने से जिसका दोहला पूर्ण हो गया था ऐसे वकुल वृक्ष ने अपने फूलों से स्त्री जनों की अभिलाषा को पूर्ण कर दिया था ॥15 ॥ जो कुरवक वृक्ष सुखी युवाओं के लिए भ्रमरों के शब्द से सुख उत्पन्न कर रहा था वही कुरवक दुखी (विरही) युवाओं के लिए सार्थक नाम का धारक कु― खोटे रवक― शब्द कराने वाला था ॥16॥ उस समय तिलक की शोभा को धारण करने वाले जो तिलक के फूल चारों ओर फूल रहे थे उन्होंने गुलाब की सुगंधि से सुवासित वनलक्ष्मीरूपी स्त्री को अत्यधिक पुष्पवत-फूलों से युक्त (पक्ष में रजोधर्म से युक्त) कर दिया था ॥17॥ जिस प्रकार इधर-उधर घूमते हुए हस्ति-समूह को जीतने की इच्छा से सिंह की केशर (अयाल) सुशोभित होती है उसी प्रकार पुन्नाग वृक्षों के समूह को जीतने की इच्छा से सिंहकेशर―वृक्ष विशेष की केशर सुशोभित हो रही थी ॥18॥ जो चिरकाल के विरह से सूख रही थी ऐसी मालतीरूपी वल्लभा को चैत्रमास ने अपने आलिंगन से शीघ्र ही पुष्ट तथा पुष्पवती-फूलों से युक्त (पक्ष में रजोधर्म से युक्त) बना दिया था । भावार्थ-जिस प्रकार कोई पुरुष चिरकाल के वियोग से कृश अपनी वल्लभा को आलिंगन से पुष्ट कर पुष्पवती (रजोधर्म से युक्त) बना देता है उसी प्रकार चैत्रमास ने चिरकाल से वियुक्त सूखी हुई मालती लतारूपी वल्लभा को अपने आलिंगन से पुष्ट तथा फूलों से व्याप्त कर दिया |19॥ उस समय राग पूर्ण कंठ और अतिशय लाल ओठों को धारण करने वाले स्त्री-पुरुष, झूला झूलने की क्रीड़ा में आसक्त हो हिंदोल राग में कोमल गान गा रहे थे ॥20॥ उस समय के अनुरूप वस्त्राभूषणों को धारण करने वाले कितने ही पुरुष अपनी स्त्रियों के साथ बाग-बगीचों में बड़े प्रेम से मद्यपान करते थे॥21॥ हरिण दूबा के अंकुर का पहले स्वयं आस्वादन कर हरिणी के लिए देता था और हरिणी भी उसका आस्वादन कर हरिण के लिए वापस देती थी सो ठीक ही है क्योंकि प्रेमीजनों के द्वारा सूंघी हुई वस्तु भी प्रिय होती है ॥22॥

सल्लकी वृक्ष के पल्लवों का हरा-भरा ग्रास खाने में जिसकी लालसा लग रही थी ऐसी हस्तिनी को हस्ती ने अपने मुख के स्पर्श से समुत्पन्न सुख से अंधी कर दिया था― अपने स्पर्शजन्य सुख से उसके नेत्र निमीलित कर दिये थे ॥23॥ उस समय वसंत का विस्तार होने पर मधुपान संबंधी नशा से उन्मत्त हुए भ्रमर और भ्रमरियों के जोड़े उच्च शब्द करते हुए तीव्र लालसा के साथ परस्पर एक दूसरे को सूंघ रहे थे ॥24॥ उस समय हर्ष से पुष्ट हुए कोकिल जहाँ-तहाँ मधुर शब्द कर रहे थे जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो कोकिलाओं के समान कलकंठी स्त्रियों का गीत सुनकर उसे जीतने की इच्छा से ही शब्द कर रहे हों ॥25॥ आचार्य कहते हैं कि जहाँ मनोहर कोलाहल से आकुल भ्रमर तथा कोकिल भी वसंत के गीत गाते हैं वहाँ दूसरों की तो कथा ही क्या है ? ॥26॥

इस प्रकार मनुष्यों के मन को हरण करने वाले चैत्रमास के आने पर राजा सुमुख ने काम विलास से परिपूर्ण अपने मन को वन-विहार के लिए उद्यत किया ॥27॥ तदनंतर किसी दिन, जिसने नाना प्रकार के आभूषण धारण किये थे, अपने अखंड मंडल वाले देदीप्यमान छत्र से जिसने सूर्य के मंडल को आच्छादित कर दिया था, जो सजाये हुए हाथी पर आरूढ़ हो नगर से बाहर निकल रहा था, जिस प्रकार नदियों के प्रवाह आकर समुद्र में मिलते हैं उसी प्रकार अनेक राजा आकर जिसके साथ मिल रहे थे तथा बंदीजनों के समूह जिसकी स्तुति कर रहे थे ऐसा राजा सुमुख राजमार्ग को प्राप्त हुआ ॥28-29॥ साक्षात् वसंत के समान हृदय में निरंतर वास करने वाले राजा सुमुख को देखने के लिए इच्छुक नगर की स्त्रियां शीघ्र ही क्षोभ को प्राप्त हो गयीं ॥30॥ हे राजन् ! वृद्धि को प्राप्त होओ, जयवंत रहो, और समृद्धिमान् होओ जो इस प्रकार शब्द कर रही थीं, हाथ जोड़े हुई थी तथा बड़ी आकुलता का अनुभव कर रही थीं, ऐसी नगर को स्त्रियों ने नेत्ररूपी अंजलियों के द्वारा राजा सुमुख के सौंदर्य का पान किया ॥31॥ राजा सुमुख ने उन स्त्रियों के मध्य में स्थित एक अत्यंत सुंदर स्त्री को देखा । वह स्त्री ऐसी जान पड़ती थी मानो साक्षात् रति ही आ पहुँची हो ॥32॥ अतिशय राग को प्राप्त हुआ राजा, उसके मुखचंद्र, नेत्र कमल, बिंब के समान लाल-लाल ओठ, शंखतुल्य कंठ, स्तनचक्र, पतली कमर, गंभीर नाभि मंडल, सुंदर जघन, गर्त विशेष से सुशोभित नितंब, जांघों, घुटनों, पिंडरियों, हाथ एवं पैरों पर पद-पद में पड़ती हुई अपनी मनोयुक्त चंचल दृष्टि को संकुचित करने के लिए समर्थ नहीं हो सका ॥33-35॥ वह विचार करने लगा कि यह भोली-भाली हरिणी के समान नेत्रों वाली हर्ष से भरी किसको स्त्री रूपपाश से मेरे मन को बांधकर खींच रही है ॥36॥ यदि मैं इस हृदय हारिणी स्त्री का उपभोग नहीं करता हूँ तो मेरा यह ऐश्वर्य, रूप एवं नवयौवन व्यर्थ है ॥37॥ जिसका सर्वदा उल्लंघन करना कठिन है ऐसा यह लोक तो एक ओर है और जिसका सहन करना अतिशय कठिन है ऐसी परस्त्री-विषयक अभिलाषा एक ओर है ॥38॥ इस प्रकार विचार करते हुए राजा सुमुख ने उसके हरण करने में मन लगाया सो ठीक ही है क्योंकि रागी मनुष्य अपवाद को तो सह सकता है परंतु मन को व्यथा को नहीं सह सकता ॥39॥ आचार्य कहते हैं कि देखो राजा सुमुख यश से प्रकाशमान था तथा लोक-व्यवहार का ज्ञाता था फिर भी अत्यंत मोह को प्राप्त हो गया सो ठीक ही है क्योंकि सूर्य के पतन का जब समय आता है तब अंधकार की प्रबलता हो ही जाती है ॥40॥ उधर सुंदर शरीर धारक राजा सुमुख को देखने से उस स्त्री के भी अंग-अंग ढीले हो गये और वह झूला पर बैठी स्त्री के समान मन को रोकने के लिए समर्थ नहीं हो सकी ॥41॥ उसका मन राजा सुमुख में अत्यंत लुभा गया था इसलिए वह नाना प्रकार के रस के स्पर्श और प्रादुर्भाव रूप फल से सहित भाव को प्रकट करने लगी ॥42॥ जो दूर तक कटाक्ष छोड़ रहा था तथा जिसका अंतः भाग संकोच को प्राप्त था ऐसा उस स्त्री का नेत्र, बदले में सुमुख की ओर देखकर उसके चंचल मन को हर रहा था ॥43॥ वह अधर, स्तन, नाभि का मध्यभाग, नितंब और चरणों को दिखाने से तथा मुड़कर संचारित तिरछी चितवन से उसके काम को उद्दीपित कर रही थी ॥44॥ उस समय विह्वलता को प्राप्त हुए दोनों के स्निग्ध तथा परस्पर मिले हुए नेत्रों ने ही मधुर वार्तालाप कर लिया था इसलिए बेचारी जिह्वा को बोलने का अवसर ही नहीं मिल सका था ॥45॥ जिनका प्रेम बंधन छूट नहीं सकता था ऐसे दोनों स्त्री-पुरुष, दुर्लभ आलिंगन, तथा संभोगरूप फल की प्राप्ति कराने वाले मनोरथ पर आरूढ़ हुए । भावार्थ― आलिंगन तथा संभोग की इच्छा करने लगे ॥46॥

अतिशय अनुरक्त उस स्त्री का चित्त लेकर और अपना चित्त उसे देकर राजा सुमुख नगरी से बाहर निकला । उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो आगामी मिलाप के लिए बयाना देकर कृत-कृत्य ही हो गया हो ॥47॥ नगरी से निकलकर राजा ने यमुनोत्तंस नामक उद्यान में प्रवेश किया । वह उद्यान, वसंत ऋतु का आभूषण स्वरूप था, जनता को आनंदित करने वाला था और नंदन वन के समान जान पड़ता था ॥48॥ वह उद्यान, नाग लताओं से आलिंगित फूले-फले सुपारी के वृक्षों और नारियल, अनार तथा केलों के वनों से अतिशय रमणीय था ॥49॥ अपनी स्त्रियों से घिरे हुए राजा सुमुख ने उस सुंदर वन में विहार किया एवं अनुकूल मित्रों और राज पुत्रों के साथ क्रीड़ा की ॥50॥ वह वहाँ कुछ काल तक क्रीड़ा करता रहा परंतु वनमाला के वियोग से उसे वह मनुष्यों से व्याप्त वन की पंक्ति शून्य जैसी जान पड़ती थी ॥51॥ वनमाला के अनुराग हरे हुए राजा ने लौटकर शीघ्र ही कौशांबीपुरी में प्रवेश किया सो ठीक ही है क्योंकि जिनका चित्त दूसरे में लग रहा है वे कितनी देर तक स्वस्थ रह सकते हैं ? ॥52॥ सुमति नामक मंत्री ने एकांत में आदरपूर्वक राजा से पूछा कि हे स्वामिन् ! आज आप विषाद युक्त क्यों हैं ? कृपा कर कहिए ॥53॥ हे प्रभो ! आपका यह एकछत्र राज्य है, प्रजा आप में अनुरक्त है तथा अन्य राजा अनुराग और प्रताप से वशीभूत हो आपके दास हो रहे हैं ॥54॥ अभिलषित वस्तुओं को देकर आपने समस्त याचकों को संतुष्ट कर रखा है तथा प्रेम को अधिकता से प्रसन्न होकर आपने समस्त स्त्रियों को सम्मानित किया है ॥ 55 ॥ धर्म, अर्थ तथा काम विषयक कोई भी वस्तु आपको दुर्लभ नहीं है, इस प्रकार हे नाथ! सब प्रकार को कुशलता होने पर भी आपका मन दु:खी क्यों हो रहा है ? 56 ॥ सभी लोग प्राण तुल्य मित्र के लिए मन का दुःख बाँटकर सुखी हो जाते हैं यह जगत् की रीति है ॥57 ॥ इसलिए हे प्रभो ! बतलाइए मैं आज ही आपकी अभिलाषा को पूर्ण करूंगा क्योंकि स्वामी के सुखी रहने पर ही समस्त प्रजा सुखी रहती है ॥ 58॥

मंत्री के इस प्रकार कहने पर राजा ने शीघ्र हो कहा कि आज उद्यान को जाते समय मैंने एक पर-स्त्री को देखा था उसी ने विद्या की भाँति मुझे शीघ्र ही वश कर लिया है ॥59॥ वह ऐसी थी, ऐसी उसकी वेष-भूषा थी और अपनी स्पष्ट चेष्टाओं से अपना अभिप्राय प्रकट कर रही थी प्रायः आपने भी वह देखी होगी ॥60॥ यह सुनकर मंत्री ने कहा कि हे स्वामिन् ! देखी है, अवश्य देखी है, वह वीरक वैश्य की वनमाला नाम की स्त्री है ॥61॥ राजा ने कहा कि यदि आज उसके साथ मेरा समागम नहीं होता है तो मैं मानता हूँ कि न मेरा जीवन बचेगा और न उस कुटिल भौंहों वाली वनमाला का ॥ 62॥ जान पड़ता है कि वह मेरे बिना एक दिन भी नहीं ठहर सकती और न उसके बिना मैं भी एक दिन ठहर सकता हूँ इसलिए शीघ्र ही इसका उपाय करो ॥63॥ यद्यपि इस कार्य से इस जन्म में अपयश प्राप्त होता है और परजन्म में अनर्थ की प्राप्ति होती है तथापि जंमांध के समान मूर्ख मनुष्य कार्य को नहीं देखता ॥64॥ इसलिए अकार्य में प्रवृत्त होने पर भी मैं तुम्हारे द्वारा रोकने योग्य नहीं हूँ । यदि जीवन रहा तो पाप को शांत करने के बहुत से उपाय हो जावेंगे ॥65 ॥ यद्यपि राजा का वह वचन अन्यायरूप था तथा मंत्री ने उसे मान लिया सो ठोक ही है क्योंकि मंत्री अत्यंत निकटवर्ती आपत्तियों को ही दूर करते हैं ॥66॥ मंत्री ने अत्यंत अनुकूल एवं विनम्र होकर कहा कि हे प्रभो ! मैं प्रयत्न करता हूँ आप वनमाला को आज ही अपने कंठ में लगी देखिए ॥67॥ आप पहले की भांति शीघ्र ही स्नान कीजिए, भोजन कीजिए, दिव्य विलेपन, सुकोमल वस्त्र, पान तथा माला आदि धारण कीजिए ॥68॥ यद्यपि राजा को वनमाला के बिना भोजन करना इष्ट नहीं था तथापि बुद्धिरूपी नेत्र को धारण करने वाले मंत्री ने जब नमस्कार कर प्रार्थना की तब उसने उसके कहे अनुसार सब कार्य करने की इच्छा की ॥69 ॥

तदनंतर सुमुख का अभिप्राय जानकर दया से ही मानो सूर्य अपनी किरणों को संकुचित कर पश्चिम दिशा की ओर चला गया ॥70॥ जिस समय अतिशय प्रतापी मित्र मंडल― सूर्यमंडल (मित्रों का समूह) प्रताप-रहित हो अस्त होने लगा उस समय समस्त उद्यमी मनुष्य भी उद्यम रहित हो गये । भावार्थ― जिस प्रकार समर्थ मित्रों के समूह को नष्ट प्रताप एवं नाश के सम्मुख देखकर उसके अनुगामी अन्य लोग पुरुषार्थहीन हो जाते हैं उसी प्रकार प्रतापी सूर्य को भी नष्ट प्रताप एवं अस्त होने के सम्मुख देख दूसरे उद्यमी मनुष्य भी उद्यम रहित हो गये-दिनभर काम करने के बाद संध्या के समय विश्राम के लिए उद्यत हुए ॥71 ॥ उस समय सूर्य धीरे-धीरे किसी तरह अदृश्यता को प्राप्त हुआ सो ऐसा जान पड़ता था मानो चक्रवाक पक्षियों ने उसे अपनी दृष्टि रूपी रस्सियों से खींचकर रोक ही रखा था ॥72॥ तदनंतर जिस प्रकार राजा सुमुख का अंतःकरण वनमाला के अनुराग से व्याप्त था उसी प्रकार समस्त संसार संध्याकाल की लाली से व्याप्त हो गया ॥73 ॥ तत्पश्चात् जिनका तेज खंडित हो गया था ऐसे कमलों का समूह भी संकोच को प्राप्त हो गया सो ठीक ही है क्योंकि मित्र (पक्ष में पक्ष) के उदयकाल में अभ्युदय को प्राप्त होने वाले ऐसे कौन हैं जो मित्र की विपत्ति के समय विकसित (पक्ष में हर्षित) रह सकें ? ॥74 ॥ धीरे-धीरे अंधकार ने भी जब संध्या-कालिक लालिमा की खोज की तब संसार लाल वस्त्र को छोड़कर नील-वस्त्र से आच्छादित हो गया । भावार्थ― संध्या की लाली को दूर कर उसके स्थानपर अंधकार ने अपना अधिकार जमा लिया जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो संसार ने लाल वस्त्र छोड़कर नीला वस्त्र ही धारण कर लिया हो ॥75 ॥ जिस प्रकार प्रदोष-दोषपूर्ण विषम काल में मोहरूपी अंधकार से आच्छादित हुए विद्वान् मनुष्य भी ब्राह्मणादि वर्गों का विवेक नहीं प्राप्त करते हैं― वर्ण भेद को भूल जाते हैं उसी प्रकार उस प्रदोष― रात्रि के प्रारंभ रूप विषम काल में अंधकार से उपद्रुत विद्वान् मनुष्य भी लाल-पीले आदि वर्णों के भेद को नहीं प्राप्त कर सके थे― उस समय सब पदार्थ एक वर्ण― काले-काले ही दिखाई देते थे ॥76 ॥ उस समय मंत्री ने सलाह कर राजा सुमुख की आज्ञा से वनमाला के पास आत्रेयी नाम की दूती भेजी ॥77॥ वनमाला ने आसन आदि देकर उस दूती का सम्मान किया जिससे वह बहुत प्रसन्न हुई । तदनंतर उस चतुर दूती ने एकांत में वनमाला से इस प्रकार कहा कि प्रिय बेटी वनमाला ! तू आज उदाससी दिख रही है । उदासी का कारण मुझसे कह, क्या पति ने तुझे नाराज कर दिया है ? ॥78-79॥ वीरक के तो तू ही एक पत्नी है अतः उसके क्रोध का कारण क्या हो सकता है ? उदासी में कुछ दूसरा ही कारण होना चाहिए जो कि तेरे अनुभव में आ रहा है, उसे बता ॥80॥ बेटी ! तूने सब रहस्यों में कई बार मेरी परीक्षा की है, मेरे रहते हुए तुझे कौन-सा इष्ट कार्य दुर्लभ रह सकता है ? ꠰꠰81॥ दूती के यह कहते ही उसके मुख से गरम-गरम साँसे निकलने लगीं जिनसे उसका अधर पल्लव मुरझा गया । तदनंतर दूती के कई बार प्रार्थना करने पर उसने बड़े दुःख से यह वचन कहे कि हे माँ ! तुझे छोड़कर इस विषय में मेरा कोई भी विश्वास पात्र नहीं है । चूंकि छह कानों में पहुंचा हुआ मंत्र फूट जाता है― उसका रहस्य खुल जाता है इसलिए मंत्र की यत्न-पूर्वक रक्षा करनी चाहिए ॥82-83 ॥ बात यह है कि आज मैंने प्रशस्तरूप एवं सुंदर मुख के धारक राजा सुमुख को देखा था और देखते ही कामदेव के साथ वह मेरे मन में प्रविष्ट हो गया ॥ 84 ॥ इस समय मेरे हृदय को प्रवृत्ति दुर्जन की प्रवृत्ति के समान अपने आपको संताप उत्पन्न कर रही है । क्योंकि जिस प्रकार दुर्जन दुर्लभ वस्तु की अभिलाषा करता है और सुलभ वस्तु से द्वेष करता है उसी प्रकार मेरा हृदय, जो मेरे लिए सर्वथा दुर्लभ है ऐसे राजा सुमुख की अभिलाषा कर रहा है और सुलभ वीरक से द्वेष कर रहा है ॥85॥ मेरा हृदय चंदन के लेप से लिप्त होने पर भी सूख रहा है, सो ठीक ही है क्योंकि बाह्य उपचार अंतरंग कार्य में क्या कर सकता है ? ॥86॥ मेरे अंग और उपांगों पर रखा हुआ गीला कपड़ा भी सूख जाता है सो ठीक ही है क्योंकि अत्यंत उष्ण पदार्थ पर रखा हुआ थोड़ा-सा शीत स्पर्श क्या कर सकता है ? ॥87॥ जिस ताप से कर्कश शरीर के लिए बनाया हुआ पल्लवों का बिस्तर भी अत्यंत मुरझा जाता है उसके लिए थोड़ासा शीत-स्पर्श क्या कर सकता है ? ॥88॥ मैं उसके शरीर के स्पर्श के बिना शांति नहीं देखती इसलिए हे पवित्रे ! दया करो और मेरे लिए शीघ्र ही उसका समागम प्राप्त कराओ ॥89।꠰ तुम यह विश्वास करो कि मेरे देखने से उसकी मनोवृत्ति भी मेरी चाह से मिश्रित है― उसके मन में मेरी चाह है क्योंकि उसकी समस्त चेष्टाओं से यह स्पष्ट प्रतीत होता था ॥90॥ तुम बड़ी चतुर और समय की गति को जानने वाली हो इसलिए हम दोनों संतप्त स्त्री-पुरुषों को एकांत में मिला दो क्योंकि संतप्त वस्तु दूसरी संतप्त वस्तु के साथ सुख से मिलाई जा सकती है ॥91॥

इस प्रकार वनमाला के अभिप्राय को सूचित करने वाले उन वचनों को सुनकर दूती बहुत प्रसन्न हुई और निम्नांकित वचन कहने लगी ॥92॥ उसने कहा कि हे बेटी ! तेरे रूप से जिसका चित्त हरा गया है ऐसे वत्स देश के स्वामी राजा सुमुख ने ही मुझे भेजा है अतः चल में शीघ्र ही तुझे उसके साथ मिलाये देती हूँ॥93 ॥ इस प्रकार अपने मनोरथ के अनुकूल बात होने पर काम से पीड़ित वनमाला, पति की अनुपस्थिति में दूती के साथ शीघ्र ही राजभवन में प्रविष्ट हो गयी ॥94॥ राजा सुमुख, मन को चुराने वाली सुमुखी को देखकर बहुत सुखी हुआ और हर्ष से आइए, आइए इस प्रकार के प्रिय वचन कहकर उसे सुखी करने लगा ॥95॥ जिसके स्तनों का स्पर्श किया गया था ऐसी कृशांगी वनमाला को तरुण सुमुख ने अपने स्वेद युक्त हाथ से उसका स्वेद युक्त हाथ पकड़कर अपनी शय्या पर बैठा लिया ॥96 ॥ उसी समय रात्रि रूपी स्त्री के मुख को प्रसन्न करता हुआ (पक्ष में रात्रि के प्रारंभ को प्रकाशमान करता हुआ) चंद्रमा उदित हुआ सो ऐसा जान पड़ता था मानो वह प्रौढ़ यौवन से युक्त राजा सुमुख और वनमाला के समागम का अनुकरण करने के लिए ही उदित हुआ था ॥97॥ जिस प्रकार राजा सुमुख के करस्पर्श (हाथ के स्पर्श) से सुंदरी वनमाला प्रसन्न हो रही थी उसी प्रकार चंद्रमा के करस्पर्श (किरणों के स्पर्श) से कुमुदिनी शीघ्र ही प्रसन्न हो उठी― खिल उठी ॥ 98॥ राजा सुमुख और वनमाला ने उत्तर-प्रत्युत्तर से सहित तथा स्त्री-पुरुषों के गुणों से संगत बहुत से भाव किये-नाना प्रकार की शृंगारचेष्टाएं कीं ॥99॥ विश्वास की अधिकता से नूतन समागम के समय होने वाला जिसका भय दूर छूट गया था ऐसी वन माला को राजा सुमुख ने गोद में उठा लिया और अपने शरीर से लगाकर उसका गाढ़ आलिंगन किया ॥100॥ तदनंतर काम से उत्तप्त दोनों स्त्री-पुरुषों ने, बीच-बीच में आलिंगन छोड़ देने से जिनमें आलिंगन जन्य थकावट दूर हो जाती थी ऐसे भुजाओं के गाढ़ आलिंगन से, चुंबन से, चूषण से, दसन से, कंठग्रहण से, केशग्रहण से, नितंबास्फालन से और अंग-प्रत्यंग के स्पर्श से परस्पर नाना प्रकार की क्रीड़ा की ॥101-102॥ वनमाला में जैसा उत्साह था, जैसा भाव था, और जैसा चातुर्य था उन सबके अनुसार वह संभोगोत्सव के समय राजा सुमुख के सुख के लिए हुई थी, उसने अपनी समस्त चेष्टाओं से राजा सुमुख को सुखी किया था ॥103 ॥ तदनंतर थकावट से जिनके सर्व शरीर में पसीना आ गया था और जो परस्पर एक दूसरे का संमर्दन कर रहे थे ऐसे वे दोनों, हस्ती हस्तिनियों के समान आलिंगन कर शय्या पर सो गये ॥104॥ तदनंतर अत्यधिक चातुर्य से जिनकी आत्मा हरी गयी थी, और चित्त प्रेमरूपी बंधन से बद्ध थे ऐसे गाढ़ निद्रा में निमग्न सुमुख और वनमाला का क्या हाल है ? यह जानने के लिए ही मानो सूर्य ने प्रभात संध्या को भेजा । भावार्थ आकाश में प्रातःकाल की लालिमा छा गई ॥105 ॥ उस समय चंद्रमा के साथ-साथ सुंदर प्रभात संध्या से अनुरंजित (रक्तवर्ण को हुई) द्यावा (आकाशरूपी स्त्री) राजा सुमुख द्वारा उत्तम मनोवृत्ति से अनुरंजित (प्रसन्न की हुई) सुवदना नव-वधू वनमाला के समान सुशोभित हो रही थी ॥ 106॥ जिस प्रकार जिनेंद्र भगवान् समवसरण में सिंहासनारूढ़ हो इस समस्त लोक को प्रबुद्ध करते हैं उसी प्रकार आगत सूर्य ने उदयाचल पर स्थित होकर कमलों के समान सुशोभित वनमाला के साथ सोते हुए राजा सुमुख को प्रबुद्ध किया-जगाया ॥107॥

इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराण के संग्रह से सहित जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराण में सुमुख और वनमाला का वर्णन करने वाला चौदहवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥14॥


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