छेद

From जैनकोष



सिद्धांतकोष से

  1. Section. ( जंबूद्वीपपण्णत्तिसंगहो/ प्र.106)
  2. छेद सामान्य का लक्षण
    सर्वार्थसिद्धि/7/25/366/3 कर्णनासिकादीनामवयवानामपनयनं छेद:। =कान और नाक आदि अवयवों का भेदना छेद है। ( राजवार्तिक/7/25/3/553/20 )
  3. धर्मसंबंधी छेद का लक्षण
    स्याद्वादमंजरी/32/342/21 पर उद्धृत हरिभद्रसूरिकृत पंचवस्तुक चतुर्थद्वारका श्लो.नं.–‘‘बज्झाणुट्ठाणेणं जेण ण बाहिज्जए तयं णियमा। संभवइ य परिसुद्धं सो पुण धम्मम्मि छेउत्ति।’’ =जिन बाह्यक्रियाओं से धर्म में बाधा न आती हो, और जिससे निर्मलता की वृद्धि हो उसे छेद कहते हैं। भगवती आराधना / विजयोदया टीका/6/32/21 असंयमजुगुप्सार्थमेव। असंयम के प्रति जुगुप्सा ही छेद है।
  4. संयम संबंधी छेद के भेद व लक्षण
    प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका/211-212 द्विविध: किल संयमस्य छेद: बहिरंगोऽंतरंगश्च। तत्र कायचेष्टामात्राधिकृतो बहिरंग: उपयोगाधिकृत: पुनरंतरंग:।
      प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका/217 अशुद्धोपयोगोऽंतरंगच्छेद: परप्राणव्यपरोपो बहिरंग:। =संयम का छेद दो प्रकार का है; बहिरंग और अंतरंग। उसमें मात्र कायचेष्टा संबंधी बहिरंग है और उपयोग संबंधी अंतरंग।211-212। अशुद्धोपयोग अंतरंगछेद हैं; परप्राणों का व्यपरोप बहिरंगच्छेद है।


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पुराणकोष से

(1) अहिंसाणुव्रत का एक अतिचार― कान आदि अवयवों का छेदना । हरिवंशपुराण 58. 164

(2) प्रायश्चित का एक भेद― दिन, मास आदि से मुनि की दीक्षा कम कर देना । इसका मुनियों की वरीयता पर प्रभाव पड़ता है । हरिवंशपुराण 64.36


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