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नाभि

From जैनकोष



(1) वर्तमान कल्प के चौदह में कुलकर । इनके समय में कल्पवृक्ष सर्वथा नष्ट हो गये थे । भोगभूमि की व्यवस्था समाप्त हो गयी थी । उत्पन्न होते समय शिशु की नाभि में नाल दिखाई देने लगा था । उसे काटने का उपाय सुझाने और आज्ञा देने से ये इस नाम से विख्यात हुए । इनकी आयु एक करोड़ पूर्व और शारीरिक ऊँचाई पाच सौ पच्चीस धनुष थी । इनके समय में काल के प्रभाव से पुद्गल परमाणुओं में मेघ बनाने की सामर्थ्य उत्पन्न हो गया था । मेघ गंभीर गर्जना के साथ पानी बरसाने लगे थे । कल्पवृक्षों का अभाव हो गया था । इन्होंने प्रजा को संबोधित करते हुए कहा था कि पके हुए फल भाग्य है । मसालों के प्रयोग से अन्न आदि को स्वादिष्ट बनाया जा सकता है । ईख का रस पेय है । इन्होंने मिट्टी के बर्तन बनाना सिखाया था । पूर्वभव में ये विदेह क्षत्र में उच्च कुलीन महापुरुष थे । इन्होंने उस भव में पात्र दान, व्रताचरण आदि से सम्यग्दर्शन प्राप्त कर भोगभूमि की आयु का बंध किया था । क्षायिक सम्यग्दर्शन तथा श्रुतज्ञान का प्राप्ति होने से ये आयु के अंत में मरकर भरतक्षेत्र में उत्पन्न हुए थे । ये प्रजा के जीवन का उपाय जानने से मनु, आर्यपुरुषों को कुल का भाँति इकट्ठा रहने का उपदेश देने से कुलकर, तथा वंश-संस्थापक होने से कुलधर और युग के आदि में होने से युगादिपुरुष कहे गये हैं । ये कुलकर प्रसेनजित् के पुत्र थे । इनके देह की कांति तपाये हुए स्वर्ण के समान थी । इन्होंने मरुदेवी के साथ विवाह किया था । अयोध्या की रचना इस दंपति के निवास हेतु की गयी थी । वृषभदेव इनके पुत्र थे । महापुराण 3.152-153, 164-167, 190, 200-212 पद्मपुराण - 3.87,88,95, 219, हरिवंशपुराण - 7.169,हरिवंशपुराण - 7.175, पांडवपुराण 2.103-108

(2) एक पर्वत । जयकुमार ने म्लेच्छ राजाओं को जीतकर इस पर्वत पर भरतेश की ध्वजा फहरायी थी । श्रद्धावान, विजयावान्, पद्मवान् और गंधवां इन चार वर्तुलाकार विजयार्ध पर्वतों का अपरनाम नाभिगिरि है । ये पर्वत मूल में एक हजार योजन, मध्य में सात सौ पचास योजन और मस्तक पर पाँच सौ योजन चौड़े तथा एक हजार योजन ऊँचे है । महापुराण 45.58, हरिवंशपुराण - 5.161-163


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