• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

बंधन

From जैनकोष



सिद्धांतकोष से

  1. बंधन नामकर्म का लक्षण
    सर्वार्थसिद्धि/8/11/389/12 शरीरनामकर्मोदयवशादुपात्तानां पुद्गलानामन्योन्यप्रदेशसंश्लेषणं यतो भवति तद्बंधननाम । (तस्याभावे शरीरप्रदेशानां दारुनिचयवत् असंपर्कः स्यात् राजवार्तिक ) । = शरीर नामकर्म के उदय से प्राप्त हुए पुद्गलों का अन्योन्य प्रदेश संश्लेष जिसके निमित्त से होता है, वह बंधन नामकर्म है । इसके अभाव में शरीर लकड़ियों के ढेर जैसा हो जाता है । ( राजवार्तिक ) ( राजवार्तिक/8/11/6/576/24 ) ( धवला 13/5,5,101/364/1 ) ( गोम्मटसार कर्मकांड / जीवतत्त्व प्रदीपिका/33/29/1 ) ।
    धवला 6/1,9-1,28/52/11 सरीरट्ठमागयाणं पोग्गलक्खंधाणं जीवसंबद्धाणं जेहि पोग्गलेहि जीवसंबद्धेहिपत्तोदएहि, परोप्परंकीरइ तेसिं पोग्गलक्खंधाणं सरीरबंधणसण्णा, कारणे कज्जुवयारादो, कत्तारणिद्देसादो वा । जइ सरीरबंधणणामक्कमं जीवस्स ण होज्ज, तो वालुवाकाय पुरिससरीरं व सरीरं होज्ज परमाणूणमण्णोण्णे बंधाभावा । = शरीर के लिए आये हुए जीवसंबद्ध पुद्गल स्कंधों का जिन जीवसंबद्ध और उदय प्राप्तपुद्गलों के साथ परस्पर बंध किया जाता है उन पुद्गल स्कंधों की शरीरबंधन संज्ञाकारण में कार्य के उपचार से, अथवा कर्तृनिर्देश से है । यदि शरीरबंधन नामकर्म जीव के न हो, तो बालु का द्वारा बनाये पुरुष-शरीर के समान जीव का शरीर होगा, क्योंकि परमाणुओं का परस्पर में बंध नहीं है ।
  2. बंधन नामकर्म के भेद
    षट्खंडागम 6/1,9-1/सू. 32/70 जंतं सरीरबंधणणामकम्मं तं पंचविहं, ओरालियसरीरबंधणणामं वेउव्वियसरीरबंधणणामं आहारसरीरबंधणणामं तेजासरीरबंधणणामं कम्मइयसरीरबंधणणामं चेदि ।32। = जो शरीरबंधन नामकर्म है वह पाँच प्रकार का है - औदारिकशरीर बंधननामकर्म, वैक्रियिकशरीर बंधननामकर्म, आहारकशरीर बंधननामकर्म, तैजसशरीर बंधननामकर्म और कार्मणशरीर बंधन नामकर्म । ( षट्खंडागम 13/5,5/सू. 105/367 ); ( पंचसंग्रह / प्राकृत/11 ); ( पंचसंग्रह / प्राकृत/2/4/पृ.47/पं.6 ); ( महाबंध/1/6/29 ); ( गोम्मटसार कर्मकांड / जीवतत्त्व प्रदीपिका/33/29/1 ) ।
  • बंधन नामकर्म की बंध, उदय, सत्त्व प्ररूपणाएँ तथा तत्संबंधी नियम शंकादि - देखें वह वह नाम ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

एक विद्यास्त्र । चंडवेग ने यह अस्त्र वसुदेव को दिया था । हरिवंशपुराण - 25.48


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=बंधन&oldid=127051"
Categories:
  • ब
  • पुराण-कोष
  • करणानुयोग
  • प्रथमानुयोग
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 27 November 2023, at 15:15.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki