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बोधपाहुड गाथा 40

From जैनकोष

आगे भाव की प्रधानता से वर्णन करते हैं -

मयरायदोसरहिओ कसायमलवज्जिओ य सुविशुद्धो ।
चित्तपरिणामरहिदो केवलभावे मुणेयव्वो ।।४०।।

मदरागदोषरहित: कषायमलवर्जित: च सुविशुद्ध: ।
चित्तपरिणामरहित: केवलभावे ज्ञातव्य: ।।४०।।

राग-द्वेष विकार वर्जित विकल्पों से पार हैं ।
कषायमल से रहित केवलज्ञान से परिपूर्ण हैं ।।४०।।

अर्थ - केवलभाव अर्थात् केवलज्ञानरूप ही एक भाव होते हुए अरहंत होते हैं - ऐसा जानना । मद अर्थात् मानकषाय से हुआ गर्व, राग, द्वेष अर्थात् कषायों के तीव्र उदय से होनेवाले प्रीति और अप्रीतिरूप परिणाम इनसे रहित हैं, पच्चीस कषायरूप मल उसका द्रव्यकर्म तथा उनके उदय से हुआ भावमल उससे रहित है, इसीलिए अत्यन्त विशुद्ध है-निर्मल है, चित्तपरिणाम अर्थात् मन के परिणमनरूप विकल्प से रहित है, ज्ञानावरणकर्म के क्षयोपशमरूप मन का विकल्प नहीं है, इसप्रकार केवल एक ज्ञानरूप वीतरागस्वरूप `भाव अरहंत' जानना ।।४०।।

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  • कुन्दकुन्दाचार्य
  • अष्टपाहुड
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