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भावपाहुड गाथा 112

From जैनकोष

आगे कहते हैं कि भाव बिगड़ने के कारण चार संज्ञा हैं, उनसे संसार भ्रमण होता है, यह दिखाते हैं -

आहारभयपरिग्गहमेहुणसण्णाहि मोहिओ सि तुं ।
भमिओ संसारवणे अणाइकालं अणप्पवसो ।।११२।।

आहारभयपरिग्रहमैथुनसंज्ञाभि: मोहित: असि त्वम् ।
भ्रमित: संसारवने अनादिकालं अनात्मवश: ।।११२।।

आहार भय मैथुन परीग्रह चार संज्ञा धारकर ।
भ्रा भववन में अनादिकाल से हो अन्य वश ।।११२।।

अर्थ - हे मुने ! तूने आहार, भय, मैथुन, परिग्रह इन चार संज्ञाओं से मोहित होकर अनादिकाल से पराधीन होकर संसाररूप वन में भ्रमण किया ।

भावार्थ - `संज्ञा' नाम वांछा के जागते रहने (अर्थात् बने रहने) का है सो आहार की वांछा होना, भय होना, मैथुन की वांछा होना और परिग्रह की वांछा प्राणी के निरन्तर बनी रहती है, यह जन्मान्तर में चली जाती है, जन्म लेते ही तत्काल प्रगट होती है । इसी के निमित्त से कर्मो का बंध कर संसारवन में भ्रमण करता है, इसलिए मुनियों का यह उपदेश है कि अब इन संज्ञाओं का अभाव करो ।।११२।।

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  • कुन्दकुन्दाचार्य
  • अष्टपाहुड
  • भावपाहुड
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