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मतिसागर

From जैनकोष



(1) राजा श्रीविजय का मंत्री । यह सूझबूझ का धनी था । निमित्तज्ञानी द्वारा पोदनपुर के राजा श्रीविजय को वज्रपात होना बनाये जाने पर इसी ने पोदनपुर के राजा श्रीविजय को वज्रपात के संकट से बचाया था । इसने राज्यसिंहासन से राजा श्रीविजय को हटाकर राज्य-सिंहासन पर उसका पुतला स्थापित करने के लिए अन्य मंत्रियों से कहा था । सभी मंत्रियों ने इसकी बुद्धि की प्रशंसा करते हुए पुतले की सिंहासन पर स्थापना की थी तथा वे पोदनाधीश की कल्पना से उसे नमस्कार करने लगे थे । राजा ने राज्य त्यागकर जिनमंदिर में जिन पूजन आरंभ की थी । वह दान देने लगा, कर्मों की शांति के लिए उसने उत्सव किये । परिणामस्वरूप सातवें दिन उस पुतले के ऊपर वज्रपात हुआ और राजा इस उपसर्ग से बच गया । महापुराण 62.172, 217-224, पांडवपुराण 4.129-135

(2) पूर्व विदेह क्षेत्र के अमृतस्राविणी ऋद्धि के धारी एक मुनिराज । इन्होंने प्रहसित् और विकसित दो विद्वानों को जीव-तत्त्व समझाया था । महापुराण 7.66-76

(3) एक श्रावक । यह राजा सत्यंधर का मंत्री था । इसकी स्त्री का नाम अनुपमा तथा पुत्र का नाम मधुमुख था । महापुराण 75. 256-259

(4) भरतक्षेत्र संबंधी विजयार्ध की दक्षिणश्रेणी में गगनवल्लभ नगर के राजा विद्याधर गरुडवेग का मंत्री । इसने राजा से उसकी पुत्री गंधर्वदत्ता के विवाह के संबंध में निमित्तज्ञानी मुनि से सुनकर कहा था कि इसे राजा सत्यंधर का पुत्र वीणा-वादन से स्वयंवर में जीतेगा और यह उसी की भार्या होगी । अंत में इसी मंत्री के परामर्शानुसार राजा गरुडवेग के निवेदन पर सेठ जिनदत्त ने अपने राजपुर नगर में स्वयंवर रचाया था । उसमें सुघोषा वीणा को बजाकर जीवंधरकुमार ने गंधर्वदत्ता को पराजित किया और उसे विवाहा था । महापुराण 75.301-336


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