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महेंद्र

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सिद्धांतकोष से

पद्मपुराण - 15.13-16 –महेंद्रगिरि का राजा तथा हनुमान् की माता अंजना का पिता था।


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पुराणकोष से

(1) सौधर्मेंद्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । महापुराण 25.148

(2) कुंडलगिरि का उत्तरदिशावर्ती एक कूट । यहाँँ पांडुक देव रहता है । हरिवंशपुराण - 5.694

(3) विजया पर्वत का उत्तरश्रेणी का अड़तालीसवाँ नगर । हरिवंशपुराण - 22.90

(4) राजा अचल का ज्येष्ठ पुत्र । हरिवंशपुराण - 48.49

(5) भरतक्षेत्र के चंदनपुर नगर का राजा । इसकी रानी अनुंधरी तथा पुत्री कनकमाला थी । महापुराण 71.405-406, हरिवंशपुराण - 60.80-81

(6) एक पर्वत । चक्रवती भरत का सेनापति इस पर्वत को लांघकर विंध्याचल की ओर गया था । महापुराण 29.88

(7) एक मुनि । ये अयोध्या के राजा अरिंजय के दीक्षागुरू थे । महापुराण 72.27-28

(8) एक विद्याधर । यह नगर बसाकर भरतक्षेत्र के दंती पर्वत पर रहने लगा था । इसके रहने से नगर का नाम महेंद्रगिरि हो गया था । इसकी हृदयवेगा रानी से इसके अरिंदम आदि सौ पुत्र तथा अंजना पुत्री हुई थी । इसने पुत्री का विवाह आदित्यपुर के राजा प्रह्लाद के पुत्र पवनंजय के साथ किया था । इसने सहायतार्थ रावण का पत्र आने पर और पवनंजय का विशेष आग्रह देखकर उसे रावण की सहायता के लिए भेजा था । पवनंजय की पत्नी को रानी केतुमती द्वारा दोष लगाकर घर से निकाल दिये जाने पर पत्नी के न मिलने से पवनंजय दु:खी होकर वन-वन भटका । पवनंजय को ढूंढ़ने यह भी घर से निकल गया था । वन में पवनंजय को देखकर यह बहुत प्रसन्न हुआ था और प्रिया को पाये बिना पवनंजय की भोजन न करने की प्रतिज्ञा सुनकर बहुत दु:खी भी हुआ था । अंत में अंजना और पवनंजय का मिलन हो जाने से यह और इसकी पत्नी दोनों हर्ष विभोर हो गये थे । पद्मपुराण - 15.11-16,पद्मपुराण - 15.89-90, 16.79-81, 17.21, 18.72, 102-109, 127

(9) राम का पक्षधर एक विद्याधर राजा । पद्मपुराण - 58.3


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