• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

मिश्रानुकंपा

From जैनकोष

भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 1834/1643/3

अनुकंपा त्रिप्रकारा। धर्मानुकंपा, मिश्रानुकंपा, सर्वानुकंपा चेति।

= अनुकंपा या दया इसके तीन भेद हैं - धर्मानुकंपा, मिश्रानुकंपा और सर्वानुकंपा।


2. अनुकंपा के भेदों के लक्षण

भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 1834/1643/5

तत्र धर्मानुकंपा नाम परित्यक्तासंयमेषु मानावमानसुखदुःखलाभालाभतृणसुवर्णादिषु समानचित्तेषु दांतेद्रियांतःकरणेषु मातरमिव मुक्तिमाश्रितेषु परिहृतोग्रकषायविषयेषु दिव्येषु भोगेषु दोषांविचिंत्य विरागतामुपगतेषु, संसारमहासमुद्राद्भयेन निशास्वप्यल्पनिद्रेषु, अंगीकृतनिस्संगत्वेषु, क्षमादिदशविधधर्मपरिणतेषु यानुकंपा सा धर्मानुकंपा, यया प्रयुक्तो जनो विवेकी तद्योग्यान्नपानावसथैषणादिकं संयमसाधनं यतिभ्यः प्रयच्छति। स्वामविनिगुह्यशक्तिम् उपसर्गदोषानपसारयति, आज्ञाप्यतामितिसेवां करोति भ्रष्टमार्गाणां पंथानमुपदर्शयति। तैः प्रसंयोगमवाप्य अहो सपुण्या वयमिति हृष्यति, सभासु तेषाम् गुणान् कीर्तयति स्वांते गुरुमिव पश्यति तेषां गुणानामभीक्ष्णं स्मरति, महात्मभिः कदा नु मम समागम इति तैः संयोगं समीप्सति, तदीयान् गुणान् परैरभिवर्ण्य मानान्निशम्य तुष्यति। इत्थमनुकंपापरः साधुर्गुणानुमननानुकारी भवति। त्रिधा च संतो बंधमुपदिशंति स्वयं कृतैः, करणायाः, परैः कृतस्यानुमतेश्च ततो महागुणराशिगतहर्षात् महान् पुण्यास्रवः। मिश्रानुकंपोच्यते पृथुपापकर्ममूलेभ्यो हिंसादिभ्यो व्यावृताः संतोषवैराग्यपरमनिरता, दिग्विरतिं, देशविरतिं, अनर्थदंडविरतिं चोपगतास्तीव्रदोषात् भोगोपभोगान्निवृत्य शेषे च भोगे कृतप्रमाणाः पापात्परिभीतचित्ताः, विशिष्टदेशे काले च विवर्जितसर्व सावद्याः पर्वस्वारंभयोगं सकलं विसृज्य उपवासं ये कुर्वंति तेषु संयतासंयतेषु क्रियमाणानुकंपा मिश्रानुकंपोच्यते। जीवेषु दयां च कृत्वाकृत्स्नामबुध्यमानाः जिनसूत्राद्बाह्या येऽन्यपाखंडरताविनीताः कष्टानि तपांसि कुर्वंति क्रियमाणानुकंपा तया सर्वोऽपि कर्मपुण्यं प्रचिनोति देशप्रवृत्तिर्गृहिणामकृत्स्नत्वात्। मिथ्यात्वदोषोपहतोऽन्यधर्म इत्येषु मिश्रो भवति धर्मो मिश्रानुकंपामवगच्छेज्जंतुः। सदृष्टयो वापि कुदृष्टयो वा स्वभावतो मार्दवसंप्रयुक्ताः। यां कुर्वते सर्वशरीरवर्गे सर्वानुकंपेत्यभिधीयते सा। छिन्नान् विद्वान् बद्धान् प्रकृतविलुप्यमानांश्च मर्त्यान्, सहैनसो निरेनसो वा परिदृश्य मृगान्विहगान् सरीसृपान् पशूंश्र मांसादि निमित्तं प्रहन्यमानान् परलोके परस्परं वातान् हिंसतो भक्षयतश्च दृष्ट्वा सूक्ष्मांकान् कुंथुपिपीलिकाप्रभृतिप्राणभृतो मनुजकरभखरशरभकरितुरगादिभिः संमृद्यमानानभिवीक्ष्य असाध्यरोगोरगदर्शनात् परितप्यमानान् मृतोऽस्मि नष्टोऽस्म्यभिधावतेति रोगानुभूयमानान्, स्वपुत्रकलत्रादिभिरप्राप्तिकालिः (?) सहसा वियुज्य कुर्वतो रुजा विक्रोशतः स्वांगार्निघ्नतश्च, शोकेन उपार्जितद्रविणैर्वियुज्यमानान् प्रनष्टबंधूं धैर्यशिल्पविद्याव्यवसायहीनान् यान् प्रज्ञाप्रशक्त्यावराकान् निरीक्ष्य दुःखमात्मस्थमिवं विचिंत्य स्वास्थ्यमुपशमनमनुकंपा।

= .... मिश्रानुकंपा- महान् पातकों के मूल कारण रूप हिंसादिकों से विरक्त होकर अर्थात् अणुव्रती बनकर संतोष और वैराग्य में तत्पर रहकर जो दिग्विरति, देशविरति और अनर्थदंडत्याग इन अणुव्रतों को धारण करते हैं, जिनके सेवन से महादोष उत्पन्न होते हैं ऐसे भोगोपभोगों का त्यागकर बाकी के भोगोपभोग की वस्तुओं को जिन्हों ने प्रमाण किया है, जिनका मन पाप से भय युक्त हुआ है, पाप से डरकर विशिष्ट देश और काल की मर्यादा करि जिन्होंने सर्व पापों का त्याग किया है अर्थात् जो सामायिक करते हैं, पर्वों के दिन में संपूर्ण आरंभ का त्याग कर जो उपवास करते हैं; ऐसे संयतासंयत अर्थात् गृहस्थों पर जो दया की जाती है उसको मिश्रानुकंपा कहते हैं। जो जीवों पर दया करते हैं, परंतु दया का पूर्ण स्वरूप जो नहीं जानते हैं, जो जिनसूत्र से बाह्य हैं, जो अन्य पाखंडी गुरु की उपासना करते हैं, नम्र और कष्टदायक कायक्लेश करते हैं, इनके ऊपर कृपा करना यह भी मिश्रानुकंपा है, क्योंकि गृहस्थों की एकदेशरूपता से धर्म में प्रवृत्ति है, वे संपूर्ण चारित्र रूप धर्म का पालन नहीं कर सकते। अन्य जनों का धर्म मिथ्यात्व से युक्त है। इस वास्ते गृहस्थ धर्म और अन्य धर्म दोनों के ऊपर दया करने से मिश्रानुकंपा कहते हैं । .....।


देखें अनुकंपा ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=मिश्रानुकंपा&oldid=108536"
Categories:
  • म
  • चरणानुयोग
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 20 January 2023, at 16:45.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki