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युद्ध

From जैनकोष

 द्वंद । प्राचीन काल में युद्ध के तीन कारण होते थे—1. स्त्रियों की प्राप्ति । 2. राज्य का विस्तार और 3. आत्माभिमान की रक्षा । भरतेश ने दिग्विजय तथा बाहुबली से युद्ध चक्रवर्तित्व के लिए किया था । सुलोचना के द्वारा जयकुमार का वरण किये जाने के पश्चात् अर्ककीर्ति ने बलपूर्वक सुलोचना को पाने के लिए ही युद्ध की घोषणा की थी । युद्ध दिन में होते थे । रात्रि में युद्ध करना अधर्म माना गया था । सैनिकों के प्रयाणकाल में युद्ध भेरी बजाई जाती थी । युद्धस्थल के समीप सेवादल रहता था । यह दल दोनों के आहत सैनिकों की सेवा करता था । पिपासुओं को शीतल-जल, भूखों को मधुर भोजन, श्रमार्त सैनिकों को पंखों की हवा का प्रबंध करता था । सेवकों में निज-पर का भेद नहीं था । युद्ध के तीन फल प्राप्त होते हैं—1. सेवकों के कर्त्तव्य की पूर्ति 2. किसी एक को यश की प्राप्ति और 3. शूरवीरों को वीरगति । महापुराण 26.59, 35.107-110, 36.45-46, 44. 10-11, 93-95, 272, 68.587, पद्मपुराण - 75.1-4


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