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योगसार - अजीव-अधिकार गाथा 92

From जैनकोष

द्रव्यकर्म और भावकर्म में परस्पर निमित्तनैमित्तिकपना -

कर्मतो जायते भावो भावत: कर्म सर्वदा ।
इत्थं कर्तृत्वमन्योन्यं द्रष्टव्यं भाव-कर्मणो: ।।९२।।

अन्वय :- कर्मत: भाव: जायते भावत: सर्वदा कर्म (जायते)। इत्थं भाव-कर्मणो: अन्योन्यं कर्तृत्वं द्रष्टव्यम् ।

सरलार्थ :- मोहनीय नामक द्रव्यकर्म के उदय के निमित्त से मोह-राग-द्वेष आदि जीव के विकारी परिणाम सदा उत्पन्न होते हैं और मोह-राग-द्वेष आदि जीव के विकारी परिणामों के निमित्त से सदा ज्ञानावरणादि आठ अथवा एक सौ अडतालीस प्रकृतिरूप द्रव्यकर्म उत्पन्न होते हैं । इसतरह द्रव्यकर्म और भावकर्म में परस्पर निमित्त-नैमित्तिकपना जानना चाहिए ।

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  • योगसार : अमितगति आचार्य
  • योगसार - अजीव-अधिकार : अमितगति आचार्य
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