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योगसार - चूलिका-अधिकार गाथा 537

From जैनकोष

जन्म तथा जीवन की सफलता -

(शार्दूलविक्रीडित)
दृष्ट्वा बाह्यमनात्मनीनमखिलं मायोपमं नश्वरं

ये संसार-महोदधिं बहुविधक्रोधादिनक्राकुलम् । तीर्त्वा यान्ति शिवास्पदं शममयं ध्यात्वात्मतत्त्वं स्थिरं तेषां जन्म च जीवितं च सफलं स्वार्थैकनिष्ठात्मनाम् ।।५३८।।


अन्वय : - ये अनात्मनीनं मायोपमं (तथा) नश्वरं अखिलं बाह्यं (संसारम्) दृष्ट्वा स्थिरं आत्मतत्त्वं ध्यात्वा बहुविध-क्रोधादिनक्राकुलं संसार-महोदधिं तीर्त्वा शममयं शिवास्पदं यान्ति तेषां च स्वार्थैकनिष्ठात्मनां जन्म जीवितं च सफलम् (अस्ति) ।

सरलार्थ :- जो महामानव सारे बाह्य जगत को अनात्मीय, मायारूप एवं नश्वर देखकर- जानकर स्थिर (ध्रुव) निजशुद्धात्म तत्त्व का ध्यानकर अनेक प्रकार के क्रोधादि कषायरूप मगरों से भरे हुए संसार-समुद्र को तिरकर अनंत-अव्याबाध सुखमय मोक्षपद को प्राप्त करते हैं, उन आत्मीय स्वार्थ की साधना में एकनिष्ठा रखनेवालों का ही जन्म और जीवन सफल है ।

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  • योगसार - चूलिका-अधिकार : अमितगति आचार्य
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