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योगसार - संवर-अधिकार गाथा 233

From जैनकोष

कर्म का कर्ता-भोक्ता जीव, कर्मो को बाँधता है -

कुर्वाण: कर्म चात्मायं भुञ्जान: कर्मणां फलम् ।
अष्टधा कर्म बध्नाति कारणं दु:खसन्तते: ।।२३३।।

अन्वय :- कर्म कुर्वाण:, कर्मणां च फलं भुञ्जान: अयं आत्मा दु:ख-सन्तते: कारणं अष्टधा कर्म बध्नाति ।

सरलार्थ :- यह अज्ञानी जीव शुभाशुभ परिणामस्वरूप कर्म करता हुआ और पुण्य-पापरूप कर्मो के अनुकूल-प्रतिकूल कर्म-फल को भोगता हुआ दु:ख परम्परा का कारण ज्ञानावरणादि आठ प्रकार का नवीन कर्म बांधता है ।