• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

योग्यता

From जैनकोष



  1. पर्यायों को प्राप्त करने की शक्ति−देखें निक्षेप - 5.1 ।
  2. क्षयोपशम से प्रगटी शक्ति ।
    प्रमाण परीक्षा/पृ. 67 योग्यताविशेषः पुनः प्रत्यक्षस्येव स्वविषयज्ञानावरणवीर्यांतरायक्षयोपशमविशेष एव । = योग्यतारूप जो विशेष वह प्रत्यक्ष की भाँति अपने -अपने विषयभूत ज्ञानावरणीय तथा वीर्यांतराय का क्षयोपशम विशेष ही है ।
    श्लोकवार्तिक/3/1/13/109/263 क्षयोपशमसंज्ञेयं योग्यतात्र समानता । = क्षयोपशम नाम यह योग्यता यहाँ.... ।
    परीक्षामुख/2/10 स्वावरणक्षयोपशमलक्षणयोग्यतया हि प्रतिनियतमर्थं व्यवस्थापयति । = जानने रूप अपनी शक्ति को ढँकने वाले कर्म की क्षयोपशमरूप अपनी योग्यता से ही ज्ञान घट-पटादि पदार्थों की जुदी-जुदी रीति से व्यवस्था कर देता है । ( स्याद्वादमंजरी/16/209/10 )।
    प्रमेयकमलमार्तंड/2-10 प्रतिनियतार्थव्यवस्थापको हि तत्तदावरणक्षयोपशमोऽर्थग्रहणशक्तिरूपः । तदुक्तम्-तल्लक्षणयोग्यता च शक्तिरेव । सैव ज्ञानस्य प्रतिनियतार्थव्यवस्थायामंगं नार्थोत्पत्त्यादि । = प्रतिनियत अर्थ की व्यवस्था करने वाली उस-उस आवरणकर्म के क्षयोपशम रूप अर्थ ग्रहण की शक्ति योग्यता कहलाती है । कहा भी है कि -क्षयोपशम लक्षणवाली योग्यता ही वह शक्ति है जो कि ज्ञान के प्रतिनियत अर्थ की व्यवस्था करने में प्रधान कारण है ।
    न्यायदीपिका/2/5/27/9 का नाम योग्यता ?
    उच्यतेः स्वावरणक्षयोपशमः । प्रश्न−योग्यता किसे कहते हैं   ? उत्तर−अपने आवरण (ज्ञान को ढँकने वाले कर्म) के क्षयोपशम को योग्यता कहते हैं ।
  3. स्वाभाविक शक्ति
    श्लोकवार्तिक/1/1/1/126/590-591/23  योग्यता हि कारणस्य कार्योत्पादनशक्तिः, कार्यस्य च कारणजन्यत्वशक्तिस्तस्याः  प्रति-नियमः, शालिबीजांकुरयोश्च भिन्नकालत्वाविशेषेऽपि शालिबीजस्यैव शाल्यंकुरजनने शक्तिर्न यवबीजस्य, तस्य यवांकुरजनने न शालिबीजस्येति कथ्यते । तत्र कुतस्तच्छक्तेस्तादृशः प्रतिनियमः । स्वभावत इति चेन्न, अप्रत्यक्षत्वात् । = कार्यकारण भाव के प्रकरण में योग्यता का अर्थ कारण की कार्य को पैदा करने की शक्ति और कार्य की कारण से जन्यपने की शक्ति ही है । उस योग्यता का प्रत्येक विवक्षित कार्य कारणों में नियम करना यही कहा जाता है कि धान के बीज और धान के अंकुरों में भिन्न-भिन्न समय वृत्तिपने की समानता के होने पर भी साठी चावल के बीज की ही धान के अंकुरों को पैदा करने में शक्ति है । किंतु जौ के बीज की धान के अंकुर पैदा करने में शक्ति नहीं है । तथा उस जौ के बीज की जौ के अंकुर पैदा करने में शक्ति है । हाँ, धान का बीज जौ का अंकुर नहीं उत्पन्न कर सकता है । यही योग्यता कही जाती है । प्रश्न−ऊपर के प्रकरण में कही गयी उस योग्यता रूप शक्ति का वैसा प्रत्येक में नियम आप कैसे कर सकेंगे ? उत्तर−यह शक्तियों का प्रतिनियम उन-उन पदार्थों के स्वभाव से हो जाता है । क्योंकि असर्वज्ञों को शक्तियों का प्रत्यक्ष नहीं होता है ।
  • द्रव्य के परिणमन में उसकी योग्यता ही कारण है−देखें कारण - II.1.8 ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=योग्यता&oldid=128040"
Categories:
  • य
  • द्रव्यानुयोग
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 27 November 2023, at 15:20.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki