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लिंगपाहुड गाथा 22

From जैनकोष

आगे इस लिंगपाहुड को सम्पूर्ण करते हैं और कहते हैं कि जो धर्म का यथार्थरूप से पालन करता है, वह उत्तम सुख पाता है -

इय लिंगपाहुडमिणं सव्वंबुद्धेहिं देसियं धम्मं ।
पालेइ कट्ठसहियं सो गाहदि उत्तमं ठाणं ।।२२।।

इति लिंगप्राभृतमिदं सर्वं बुद्धै: देशितं धर्म् ।
पालयति कष्टसहितं स: गाहते उत्तमं स्थानम् ।।२२।।

सर्वज्ञ भाषित धर्म य यह लिंगपाहुड जानकर ।
अप्रमत्त हो जो पालते वे परमपद को प्राप्त हों ।।२२।।

अर्थ - इसप्रकार इस लिंगपाहुड शास्त्र का-सर्वबुद्ध जो ज्ञानी गणधरादि उन्होंने उपदेश दिया है उसको जानकर जो मुनि धर्म को कष्टसहित बड़े यत्न से पालता है, रक्षा करता है वह उत्तमस्थान मोक्ष को पाता है ।

भावार्थ - यह मुनि का लिंग है वह बड़े पुण्य के उदय से प्राप्त होता है उसे प्राप्त करके भी फिर खोटे कारण मिलाकर उसको बिगाड़ता है तो जानो कि यह बड़ा ही अभागा है-चिंतामणि रत्न पाकर कौड़ी के बदले में नष्ट करता है इसीलिए आचार्य ने उपदेश दिया है कि ऐसा पद पाकर इसकी बड़े यत्न से रक्षा करना, कुसंगति करके बिगाड़ेगा तो जैसे पहिले संसार भ्रमण था वैसे ही फिर संसार में अनन्तकाल भ्रमण होगा और यत्नपूर्वक मुनित्व का पालन करेगा तो शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त करेगा, इसलिए जिसको मोक्ष चाहिए वह मुनिधर्म को प्राप्त करके यत्नसहित पालन करो, परीषह का, उपसर्ग का उपद्रव आवे तो भी चलायमान मत होओ, यह श्री सर्वज्ञदेव का उपदेश है ।।२२।।
इसप्रकार यह लिंगपाहुड़ ग्रंथ पूर्ण किया । इसका संक्षेप इसप्रकार है कि इस पंचमकाल में जिनलिंग धारण करके फिर दुर्भिक्ष के निमित्त से भ्रष्ट हुए, भेष बिगाड़ दिया वे अर्द्धफालक कहलाये, इनमें से फिर श्वेताम्बर हुए, इनमें से भी यापनीय हुए, इत्यादि होकर के शिथिलाचार को पुष्ट करने के शास्त्र रचकर स्वच्छंद हो गये, इनमें से कितने ही निपट-बिल्कुल निंद्य प्रवृत्ति करने लगे, इनका निषेध करने के लिए तथा सबको सत्य उपदेश देने के लिए यह ग्रंथ है, इसको समझकर श्रद्धान करना । इसप्रकार निंद्य आचरणवालों को साधु-मोक्षमार्गी न मानना, इनकी वंदना व पूजा न करना - यह उपदेश है । ( छप्पय ) लिंग मुनी को धारि पाप जो भाव बिगाड़ै । वह निंदाकूं पाय आपको अहित विथारै ।।
ताकूं पूजै थुवै वंदना करै जु कोई । वे भी तैसे होइ साथि दुरगतिकूं लेई ।।
इससे जे सांचे मुनि भये भाव शुद्धि में थिर रहे । तिनि उपदेश्या मारग लगे ते सांचे ज्ञानी कहे ।।१।।
( दोहा ) अंतर बाह्य जु शुद्ध जे जिनमुद्राकूं धारि । भये सिद्ध आनंदमय वंदूं जोग सँवारि ।।२।।
इति श्रीकुन्दकुन्दस्वामि विरचित श्री लिंगप्राभृत शास्त्र की जयपुरनिवासी पण्डित जयचन्द्रजी छाबड़ाकृत देशभाषामयवचनिका का हिन्दी भाषानुवाद समाप्त ।।७।।

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  • This page was last edited on 4 January 2009, at 10:52.
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