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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:इष्टोपदेश - श्लोक 13

From जैनकोष



दुरर्ज्‍येनासुरक्षेण नश्‍वरेण धनादिता।

स्वस्थं मन्यः जनः कोऽपि ज्वरवानिव सर्पिषा।।१३।।

मोहियों की एक जिज्ञासा—इससे पहिले श्लोक में यह कहा गया था कि इस घटी यंत्र की तरह परिवर्तनशील संसार में ये विपत्तियाँ घटी की तरह रीति भरी रहती है, अथवा यों कहो कि एक घटी तो रीत नही पाती है, दूसरी घटी रीतने लगती है। यों एक विपदा का तो अंत हो नही पाता कि दूसरी विपदा सामने आ जाती है, ऐसा सबको अनुभव भी होगा। जब जन समागम में है और परपदार्थों का कुछ आश्रय भी लिया जा रहा है तो ऐसी स्थिति में यह बहुत कुछ अनुभव किया जा रहा होगा कि एक विपदा तो खत्म नही हुई कि लो अब यह दूसरी विपदा आ गई। किसी भी किस्म की विपदा हो। सब अपने आप में अर्थ लगा सकते हैं। इस प्रसंग को सुनकर यह शंका हो सकती है कि जो निर्धन होंगे उनके ही विपदा आया करती है। एक विपदा पूरी नही हुई कि दूसरी विपदा आ गयी। इसमें तो निर्धनता ही एक कारण है। इष्ट समागम जुटा न सके तो वहाँ विपदा पर विपदा आती है, पर श्रीमंतों को क्या-क्या विपदा होगी? ऐसी कोई आशंका करे तो मानो उसके उत्तर में यह श्लोक कहा जा रहा है।

जीता जागता भ्रम—ये धन आदि के वैभव कठिनाई से उपार्जन किए जाने योग्य है और प्राणों की तरह इनकी रक्षा करे तो इनकी रक्षा होती है, तिस पर भी ये सब नश्वर है, किसी दिन अवश्य ही नष्ट होंगे, बेकार होंगे। ऐसे धन वैभव से यदि कोई पुरुष अपने को स्वस्थ मानता है तो वह ऐसा बावला है जैसे कि कोई ज्वर वाला पुरुष घी पीकर अपने को स्वस्थ माने। ज्वर का और घी का परस्पर विरोध है। ज्वर वाला धी पीकर ज्वर में फंसता ही जायगा, तो कोई ज्वर वाला रोगी घी पीकर अपने को स्वस्थ माने तो वह उसका बावलापन है, उसका तो थोड़े ही समय में प्राणांत हो जायगा। ऐसे ही धन वैभव के संग के कारण अपने को कोई स्वस्थ माने तो यह अत्यन्त विपरीत बात है।

जीव की अस्वस्थता—भैया! पहिले तो स्वस्थ शब्द का ही अर्थ लगावो। स्वस्थ का अर्थ है स्व में स्थित होना। जो धन वैभव से अपने को सुरक्षित मानता है उसकी दृष्टि निज पर है या परपर है, स्वपर है या अस्वपर है उसकी दृष्टि बाह्य में है। अस्व कहो, पर कहो, बाह्य कहो, एक ही अर्थ है। जो स्व न हो सो अस्व है। सो वह जीव अस्वस्थ है या स्वस्थ है जिसकी दृष्टि वैभव में फंसी है वह स्व में स्थित है या पर में स्थित है? वह तो अस्वस्थ है। हो तो कोई अस्वस्थ और माने अपने का स्वस्थ तो यह उन्मत चेष्टा है। ज्वरवान पुरुष न अभी स्वस्थ है और न घृत खाने से पीने से स्वस्थ होगा, उल्टा दुःखी ही होगा, इसी प्रकार यह अज्ञानी जीव एक तो स्वयं ही स्वस्थ नही है, उसे आनन्द का साधन निज तत्त्व मिल नही पाया है जिससे वह निज में स्थित हो सके। मिथ्यादृष्टि जीव को इस निज परम तत्त्व का परिचय नही है सो यह स्वयं ही अज्ञानी होने से अस्वस्थ है और फिर धन वैभव का योग पाये, उसकी और दृष्टि लगे तो उस दृष्टि के कारण भी यह और अस्वस्थ बढ़ गया। जो अस्वस्‍थ है वह शान्त नही रह सकता। बाह्य पदार्थों की ओर उपयोग लगे और वहां अनाकुलता बन जाय, यह कैसे हो सकता है? उसे आकुलता हे तब तो बाह्य की और उसने बुद्धि भ्रमाई है। और बुद्धि भ्रमाई है तो इस स्थिति का रूपक आकुलता रूप ही होगा, अनाकुलता नही हो सकती है।

            धन प्रसंग की कठिनाइयाँ—जिस धन वैभव के कारण यह मोही जीव अपने को स्वस्थ मानता है वह वैभव कैसा है? प्रथम तो वह बड़ी कठिनाई से उत्पन्न होता है, इस धन के चाहने वाले सभी है ना, ग्राहक है वे भी चाहते हे कि मेरे पास धन आ जाय और दूकानदार चाहते हैं कि ग्राहकों से निकलकर मेरे पास धन अधिक आ जाय, तो अब दुकानदार और ग्राहक दोनों में जब होड़ मच जाती है, सभी अपने को अधिक चाहते हैं तो ऐसी स्थिति में फिर पैसे को उपार्जन कर लेना कितना कठिन हो जाता है अथवा अन्य प्रकार की आजीविका से सभी धन कमाते हैं उनको कितना श्रम लगाना पड़ता है, कितना उपयोग और समय देना पड़ता है तब धन का संचय होता है। यह धन बड़ी कठिनता से उपार्जित किया जाता है।

धन सुरक्षा की कठिनाई—धन का उपार्जन भी हो जाए तो उसका संरक्षण करना बड़ा कठिन हो जाता है। आज के समय में तो यह कष्ट और भी बढ़ा हुआ है। धन का उपार्जन हो गया तो अब उस धन को कैसे संरक्षित रखें? हर जगह शंकायें लगी है, स्‍पष्‍ट तिजोरी में रखें तो शंका, बैंक में रखे तो शंका, कहाँ रखे, रख भी लें तो उसका उपयोग करना भी एक किसी कानून में एलाऊ नही हो रहा है। तब कैसे उसकी रक्षा की जाय? तो रक्षा करना भी कठिन हो रहा है।

धन की अन्तगति—धन कमा भी ले, और उसकी रक्षा कर भी ले तो आखिर धन छूट ही तो जायगा। जिनके लिए धन छूट जायगा वे लोग तुम्हारी मदद कर देंगे क्या? मिथ्यात्व में ही तो यह एक उपाय बन गया है कि मरे हुए आदमी की श्राद्ध की जाती है। किसी पाड़े को चारपाई चढ़ा दो तो वह उसके बाप दादा को मिल जायगी, पांडे को गाय भैंस दे दो तो गाय भैस का दूध उसके पास पहुंच जायगा। कैसी मान्यताएँ बसा दी गई है। इससे जिन्दा रहने वालों का मिथ्यात्व भी बढ़ता जा रहा है। हम मरेंगे तो हमारे लड़के श्राद्धकरेंगे, तो हमें रोटियां आसानी से मिल जायेंगी। खूब कमा कमाकर रखें। आफत पर आफत हो रही हैं। अरे वह धन जिनके लिये छोड़ा जा रहा है वे न तो इस जीवन में कुछ काम आयेंगे और न मरने पर ही कुछ काम आयेंगे। मरने पर श्राद्ध देंगे इससे तो यही अच्‍छा हे कि राज़ी खुशी से जिन्‍दा रहते हुये में पानी भी पिला दें। ऐसे मिथ्‍यात्‍व में क्‍या–क्‍या बातें बढ़ती जाती हैं? ये धम्र के नाम पर जो लोक में पूज्‍य बने हैं, धर्मात्मा बने हैं, ठेकेदार बने हैं उनके भी इसमें स्वार्थ है। ऐसी प्रसिद्धि करने में पुत्री को भी स्वार्थ है और भ्रम में पड़ा हुआ यह बड़ा बूढ़ा आदमी भी स्वार्थ से ही इस परम्परा को बनाए है।

मिथ्यात्वग्रास—यह समस्त धन विनाशीक है, छूट जायगा। कुछ न रहेगा साथ, पर संचय करने में जितना उपयोगफंसाया, जितना समय लगाया, कितना अमूल्य समय था यह मनुष्य जीवन का। इन जीवन के क्षणों में से स्वाध्याय के लिए, धर्मचर्चा के लिए, ज्ञानार्जन के लिए समय कुछ भी नही निकाल सकते और जो व्यर्थ की बातें है, उनके लिए रात दिन जुटे रहते हैं। यह सब क्या है? मिथ्यात्व ग्रह से ही तो डसे हुए है। ऐसा यह कठिन धन वैभव है जिसके कारण यह अपने को स्वस्थ श्रेष्ठ और उत्तम मानता है। वास्तविक बात यह कि धन वैभव न सुख का उत्पन्न करने वाला है और न दुःख का उत्पन्न करने वाला है। ये सब सुख दुःख कल्पनावों से उत्पन्न होते हैं। जिस प्रकार की कल्पनाएँ यह जीव करता है उस ही प्रकार की परिणति इस जीव की हो जाती है। वास्तव में सुखी तो वास्तविक त्यागी संत जन ही है, ऐसा त्याग उनके ही प्रकट होता है जो अपने स्वरूप को त्यागमय पहिचान रहे हैं। यह मेरा, मेरे सत्त्व के कारण मेरे ही रूप, यह मैं स्वरूप, सबसे न्यारा हूं, केवल चिन्मात्र हूं, प्रकाशमय हूं। इसका जीवन उस चित्प्रकाश की वृत्ति से होता है। इस जीवन को ने पहिचान सके तो ऐसी विडम्बना बनती है कि अन्य पदार्थ के संयोग से भोजन पान से अपना जीवन माना जा रहा है।

आत्मजीवन की स्वतंत्रता—इस आत्मा का जीवन आत्मा के गुणों की वर्तना से है। है यह आकाशवत् अमूर्त निर्लेप पदार्थ, उसकी वृत्तियाँ जो उत्पन्न होती है उनसे ही यह जीता रहता है। इसका जीवन अपने आपके परिणमन से है। ज्ञानी पुरुष कही चिंतातुर नही हो सकता। अज्ञानी जन बड़े-बड़े ऐश्वर्य सम्पदा में भी पड़े हुए हो तो भी चिंतातुर रहते हैं। ज्ञानी जानता है कि यह मे तो पूरा केवल चिन्मात्र हूँ। इसका न ही कही कुछ बिगाड़ हो सकता है और न किसी दूसरे के द्वारा इसमें सुधार हो सकता है। यह तो जो है सो है, अपने आपके परिणमन से ही इसका सुधार बिगाड़ है। ज्ञानी की दृष्टि धन वैभव आदि में सुख दुःख मानने की नही होती है। वे जानते हैं कि केवल उनकी तृष्णा ही दुःख को उत्पन्न करने वाली रहै। यह चिन्मात्र मूर्ति आत्म स्वरसतः सुख को उत्पन्न करने वाला है।

स्वयं का स्वयं में कार्य और फल—भैया! जो पर पदार्थ है वे अपना ही कुछ करेंगे या मेरा कुछ कर देंगे। वस्तुस्वरूप पर दृष्टि दो, जितने भी अचेतन पदार्थ है वे निरन्तर रूप, रस, गंध, स्पर्श गुण में परिणमते रहते हैं,यही उनका काम है और यही उनका भोग है। इससे बाहर उनकी कुछ कला नही है, फिर उनसे इस आत्मा में कैसे सुख और कैसे दुःख आ सकेगा? ये वैभव सुख दुःख के जनक नही है, कल्पना ही सुख दुःख की जनक है न्याय ग्रन्थों में उदाहरण देते हुए एक जगह लिखा है कि कोई पुरुष कारागार में पड़ा हुआ है जहाँ इतना गहरा अंधकार है कि सूई का भी प्रवेश नही हो सकता याने सूई के द्वारा भी भेदा नही जा सकता, ऐसे गहन अंधकार में पड़ा हुआ कामी पुरुष जिसे अपने हाथ की अँगुली भी नही नजर आती, किन्तु उसे अपनी स्‍त्री का रूप मुखाकार बिल्कुल स्पष्ट सामने झलकाता है। कहाँ है कौन? पर उसके चित्त में ऐसी ही वासना बनी हुई है कि कल्पनावश वह कुछ चिन्तन करता है अथवा विचार माफिक सुख को भोगता है अथवा कुछ कल्पना करके सुख दुःख पाता है।

सुख दुःख का कल्पना पर अवलम्बन—कोई पुरुष बड़े आराम से कमरे में बैठा हुआ है, सुहावने कोमल गद्दे तकिये पर पड़ा हुआ है, पंखा भी चल रहा है और वातानुकूलित साधन भी मिल गये हैं,इतने पर भी वह चिन्तामग्न है। पोजीशन, धन, कितनी ही प्रकार की बातें उसके उपयोग में पड़ी है। तृष्णा का तो कही अंत ही नही है। तृष्णा मे पीड़ित हुआ वह मन की छलाँगें मार रहा है और उनका प्रतिकूल परिणमन देखकर व्यग्र हो रहा है। तो किसे सुख कहते और किसे दुःख कहते? ये सब कल्पना पर अवलम्बित है। यह धन तो दुःख का पात्र है जिसके उपार्जन में दुःख है? जिसकी रक्षा में दुःख है, जिसके खर्च करने में दुःख है, सो यह धन तो इस जीव को कष्ट पहुँचाने के ही काम में आ रहा है। बाह्य पदार्थ संग में है तो उनसे कुछ न कुछ ऐसी ही कल्पना जगेगी जो असाता उत्पन्न करेगी। कभी इच्छानुसार धन का संचय भी हो जाय तो तृष्णा और बढ़ जाती है।

मायामय रोग, वेदना व इलाज—अहो, भैया, यहाँ सभी इस संसार के जीव इस रोग के रोगी है। जब-जब कुछ न था तब ऐसा सोचते थे कि इतना हो जाये फिर तो जीवन चैन से निकलेगा, फिर कुछ नही करना है, जब उतना हो गया जितना सोचते थे तो वे सब बातें विस्मृत हो गयी। अब आगे की पूरिया पूरने में लग जाते हैं इतना और कैसे हो? इतने से तो गुजारा ही नही चलता है जब इतना न था, इसका चौथाई भी न था तब कैसे गाड़ी चलती थी, पर चैन कहाँ है? लगे रहेंगे, अंत में छोड़ जायेंगे। इस समय जो मिला है वह धर्म सेवन में लगाया जाता तो अच्छा था। स्वप्न में मिले हुए राज्य की क्या कीमत? स्वप्न में मिले हुए समागम पोजीशन बढ़ रही हो तो उसकी क्या कीमत है? ऐसे ही इस अविवेक में इस मोह नींद में जो कुछ इन चर्म चक्षुवों से दिख रहा है वह सब केवल स्वप्नवत् है, कल्पनाजन्य है इसी प्रकार यहाँ आँखों से जगती हुई हालत में भी जो कुछ निरखा जा रहा है वह सब मायास्वरूप है।

बिना सिर पैर की विडम्बना—तृष्णा का आक्रमण बहुत बुरा आक्रमण है। ये मोही जन जिनमें आशा लगाये हुए है, इस संसार में जो अज्ञानियों का समूह पड़ा हुआ है, देहातों मे, नगरों मे, शहरों में विषय लिप्सा पड़ेहुए अज्ञानी जनों का जो समूह पडा हुआ हे उनमें नाम चाहा जा रहा है। किन में नाम चाहा जा रहा है पहिले तो वहाँ ही पोल निरखो और फिर जो चाहा जा रहा है उसकी भी असारता देखो। नाम का क्या अर्थ? स्वर १६ है, व्यजन ३३ है, अक्षरों को कही का कही रख दिया गया और उनको पढ़ लिया गया, सुन लिया गया तो इसमें तुम्हारा स्वरूप कहाँ आया? शब्द है, जिसका जो भी नाम है उस नाम के शब्दों को थोड़ा उलट करके कही का कही रख दिया, फिर तो उस पर इस तृष्णावी पुरुष का कुछ भी आकर्षण नही है। जो कल्पना में, व्यवहार में मान लिया गया है कि यह मैं हूं उन अक्षरों से कितनी प्रीति है? कुछ नाम भी कर जायेंगे और कुछ अक्षर भी कही लिख जायेंगे तो उनसे इस मर जाने वाले का क्या सम्बंध है। और जीवित अवस्था में भी उस नाम से क्या सम्बंध है ? संसार अनादि निधन है। इस मनुष्य भव की प्राप्ति से पहिले भी हम कुछ थे अब उसका पता नही है। हम क्या थे, कहाँ थे, कैसे थे उसका अब कुछ आभास नही है। यो ही कुछ समय बाद इस भव से चले जाने पर यहाँ का भी कुछ आभास न रहेगा। फिर किसलिए यह चौबीस घंटे का समय व्यर्थ की कल्पनावों में ही गँवाया जा रहा है।

स्वस्थता और अस्वस्थता—ये अज्ञानी जीव धन वैभव से अपने को स्वस्थ मानते हैं वे ऐसे बावले हैं कि जैसे कोई ज्वर वाला घी पीकर अपने को स्वस्थ अनुभव करे, वह तो विडम्बना की निशानी है। इस जीव की विपदा का कोई रूपक भी है क्या, कि इसका नाम विपदा है। अरे कल्पना में यह जीव अत्यन्त व्याकुल है। कुछ लोग ऐसे भी देखे जाते हैं कि जिनका मात्र एक पुत्र है और आगे किसी पुत्र की उम्मीद नही है, स्‍त्री गुजर गयी है उसका वह इकलौता बच्चा मर जाय तो भी कुछ बिरले लोग ऐसे देखने और सुनने मे आए है कि उनको तब भी कुछ चिन्ता नही होती। वे सब जानते हैं कि यह सब मायारूप है, इसमें मेरा तो कुछ भी न था। अज्ञानी जीव कल्पना करके किसी भी बात में विपदा समझ बैठते हैं और वे दुःखी होते हैं किन्तु ज्ञानी संत विवेकबल से स्वस्थ बने रहते हैं।

 


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