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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:इष्टोपदेश - श्लोक 21

From जैनकोष



निरत्ययः।

अत्यन्तसौख्यवानात्मा लोकालोकविलोकनः।।२१।।

आश्रय से आत्म तत्त्व—पूर्व प्रकरण से इस बात का समर्थन हुआ है कि चिन्मात्र चिन्तामणि के लाभ में ही आत्मा का उद्धार है और आत्मा का उपकार इसी स्वभाव के अवलम्बन से है। इस बात को जानकर जिज्ञासु यह जानने की इच्छा कर रहा है कि जिस आत्मतत्त्व के जानने से संसार के समस्त संकट दूर हो जाते हैं और शाश्‍वत शुद्ध आत्मीय आनन्द मिलता है, तथा साधारण गुण ज्ञान का पूर्ण विकास हो जाता है, वह आत्मा कैसा है ? इस ही प्रश्न के उत्तर में यह श्लोक आया है। यह आत्मा स्वसंवेदन प्रत्यक्ष का विषय है, देहप्रमाण है, अविनाशी है, अनन्त सुखमय है व विश्‍वज्ञ है।

आत्मा की स्वसंवेदनगम्यता—यह आत्मा अपने आपको जानने वाले ज्ञान के द्वारा ही जानने में आता है प्रत्येक आत्मा अपने में ’मैं हूँ’ ऐसा अनुभव करता है। चाहे कोई किसी रूप में माने, पर प्रत्येक जीव में मैं हूँ, ऐसा विश्वास अवश्य है। मैं अमुक जाति का हूँ पंडित हूँ, मूर्ख हूँ, गृहस्थ हूँ, साधु हूँ, किसी न किसी रूप से मैं हूँ ऐसा प्रत्येक जीव अंतरंग में मंतव्य रख रहा है। जिसके लिए मैं हूँ इस प्रकार का ज्ञान किया जा रहा है जिसको वेदा जा रहा है वह मैं आत्मा हूँ। यह आत्मा स्वसम्वेदन प्रत्यक्ष के द्वारा वेद्य है।

आत्मा का देहप्रमाण विस्तार—वर्तमान मे यह आत्मा कर्मोदय से प्राप्त छोटे-बड़े अपने शरीर क प्रमाण है। जैसे प्रकाश को, दीपक को घड़े के भीतर रख दें तो इस घड़े में ही प्रकाश हो जाता है, कमरे मे रख दें तो कमरे में फैल जाता है, ऐसे ही यह ज्ञानपुञ्ज आत्मतत्त्व जिस शरीर में रहता है उतने शरीर प्रमाण हो जाता है। चींटी का शरीर हो तो चींटी के शरीर के बराबर आत्मा हो गया, हाथी के शरीर में पहुंचे तो हाथी के शरीर के बराबर फैल गया। यह आत्मा कर्मोदय से प्राप्त शरीर में बद्ध है तो यह शरीर प्रमाण ही तो रहेगा। शरीर से बाहर मैं आत्मा हूँ—ऐसा अनुभव भी नहीं हो रहा है, और शरीर में केवल सिर मैं हूं, हाथ पैर मैं नहीं हूं, ऐसा भी अनुभव नहीं हो रहा हे। तन्मात्र है जितना शरीर मिला है उतने प्रमाण में यह आत्मा विस्तृत है। जब शरीर से मुक्त हो जाता है, सिद्धपद प्राप्त होता है उस समय यह आत्मा जिस शरीर को त्यागकर सिद्ध हुआ है वह शरीर जितने प्रमाण में विस्तार वाला था उतने प्रमाण में विस्तृत रह जाता है, फिर वहाँ घटने और बढ़ने का काम नहीं है। जिस संसार अवस्था में यह जीव जितने बड़े शरीर को प्राप्त करे उतने प्रमाण यह जीव हो जाता है। छोटा शरीर मिला तो छोटा हो जाता है और बड़ा शरीर मिला तो बड़ा हो जाता है, परन्तु सिद्धअवस्था में न छोटा होने का कारण रहा, न बड़ा होने का कोई कारण रहा, शरीर से मुक्ति हुई, कर्म रहे नहीं, अब बतावो यह आत्मा छोटा बने कि बड़ा हो जाय ? न छोटा बनने का कारण रहा, न बड़ा बनने का कारण रहा, तब चरम शरीर प्रमाण यह आत्मा रहता है। आत्मा तनुमात्र है।

आत्मतत्त्वकी नित्ययता—इस आत्मा का कभी विनाश नहीं होता हे। द्रव्यदृष्टिसे यह आत्मा नित्य है, शाश्वत है अर्थात् आत्मा नामक वस्तु कभी नष्ट नहीं होती है, उसका परिणमन नया-नया बनेगा। कभी दुःखरूप है, कभी सुखरूप है, कभी कषायरूप है, कभी निष्कषायरूप हो जायगा। आत्मपरिणमन चलता रहता है। किन्तु आत्मा नामक वस्तु वही का वही है, अविनाशी है।

आत्मतत्त्वका सुखमय स्वरूप—यह आत्मा अनन्त सुख वाला है। आत्मा का स्वरूप सुखसे रचा हुआ है, आनन्द ही आनन्द इसके स्वभाव में हे, पर जिसे अपने आनन्दस्वरूपका परिचय नहीं है वह पुरूष परद्रव्यों में, विषयों में आशा लगाकर दुःखी होता है और सुख मानता है। यह आत्मा स्वरसतः आनन्दस्वरूप है। कोई-कोई पुरूष तो आनन्दमात्र ही आत्मा को मानते हैं। जैसे कि वे कहते हैं आनंदो ब्रह्मणो रूपं। ब्रह्मका स्वरूप मात्र आनन्द है, पर जैन सिद्धान्त कहता है कि आत्मा केवल आनन्दस्वरूप ही नहीं है, किन्तु ज्ञानानन्दस्वरूप है। ज्ञान न हो तो आनन्द कहाँ विराजे? और आनन्दरूप परिणति न हो तो परिपूर्ण विकास वाला ज्ञान कहाँ विराजे?

आत्मतत्त्वकी सर्वज्ञरूपता—यह आत्मा ज्ञानानन्दस्वरूप है। आनन्दस्वरूप है यह तो कहा ही गया है पर ज्ञानस्वरूप भी है। यदि आत्मा ज्ञानरूप न हो तो कुछ व्यवस्था ही न बनेगी। इस समस्त जगत को जाननेवाला कौन है ? इस जगत की व्यवस्था कौन बनाए ? कल्पना करो कि कोई ज्ञानवान पदार्थ न होता जगत में और ये सब पदार्थ होते तो इनका परिचय कौन करता ? यह आत्मा ज्ञानस्वरूप है—इसका ज्ञानस्वभाव इसके अनन्त बल को रख रहा है कि ज्ञान से यह लोक और अलोक तीन काल के समस्त पदार्थों को स्पष्ट जान सके। ऐसा यह आत्मा लोक और अलोक का जाननहार है।

एकान्तमन्तव्यनिरास—आत्मा के स्वरूप को बताने वाले इस श्लोकमें ५ विशेषण दिए है। आत्मा स्वसम्वेदनगम्य है, शरीरप्रमाण है, अविनाशी है, अनन्त सुख वाला है और लोकका साक्षात् करने वाला है इन विशेषणों से ५ मंतव्योंका खण्डन हो जायगा, जो एकान्त मंतव्य है।

आत्मसत्त्वका समर्थन—कोई यह कहते हैं कि आत्मा तो कुछ प्रमाण का विषय भी नहीं है जो विषय प्रमाण में आये, युक्ति में उतरे, उसके गुणों का भी वर्णन करियेगा। आत्मपदार्थ कुछ पदार्थ ही नहीं, भ्रम है। लोगों ने बहका रक्खा है। धर्म के नाम पर जो ऋषि हुए, त्यागी हुए, साधु हुए, एक धर्म का ऐसा ढकोसला बता दिया है कि लोग धर्म में उलझे रहे और उनकी इस उलझन का लाभ साधु ऋषि संत लूटा करे, उनको मुफ्त में भक्ति मिले, आदर मिले। आत्मा नाम की कोई चीज नहीं है कोई लोग ऐसा कहते हैं। उनके इस मंतव्य का निरास इस विशेषण से हो गया है कि यह आत्मा स्वसम्वेदनगम्य है, स्पष्ट विदित है एक अहं प्रत्ययके द्वारा भला जो आत्मा को मना भी कर रहे है—मैं आत्मा नहीं हूँ, इस मना करने में भी कुछ ज्ञान और कुछ अनुभव है कि नहीं? है, चाहे आत्मा को मना करने के रूपसे ही अनुभव हो। पर कुछ अनुभव हुआ ना, कुछ ज्ञान हुआ। आत्मा नहीं हूं, मैं कुछ भीन हूं, केवल भ्रम मात्र हूं ऐसी भी समझ किसी में हुई ना। यह समझ जिसमें हुई हो वही आत्मा है जो आत्मा को मना करे कि आत्मा कुछ नहीं है वही आत्मा है। जो आत्मा को माने कि मैं आत्मा ऐसा हूं वही आत्मा है।

स्वसंवेदन प्रमाणका विषय—यह आत्मा स्वसम्वेदनके द्वारा स्पष्ट प्रसिद्ध है। यह आत्मा अमूर्तिक है इसमें रूप, रस, गंध, स्पर्श नहीं है इस कारण कोई इस बातपर अड़ जाय कि तुम हमको आँखों दिखा दो कि यह आत्मा है तो मान लूँगा। तो योंआँखों कैसे दिखाया जा सकता है? उसमें कुछ रूप हो, लाल पीला आदि रंग हो तो कुछ आँखों से भी दिखाने का यत्न किया जाय, पर वहां रूप नहीं है, चखकर भी नहीं बताया जा सकता है। क्योंकि आत्मा में स्पर्श भी नहीं हे। यह आत्मा अमूर्तिक है, न यह इन्द्रियोंका विषय है और न मनका विषय है। इसी से लोग यह कह देते हैं कि आत्मा किसी प्रमाण का विषय भी नहीं है, परन्तु यह मंतव्य ठीक नहीं है।

सर्वजीवों में अहं प्रत्ययवेदन—भैया ! मैं हूं, ऐसा प्रत्येक जीव में अनुभव चल रहा है, और कोई पुरूष बाह्यविकल्पों का परिहार करके अन्तर्मुखाकार बनकर अपने आपमें जो-जो अनुभव करेगा, जो सत्य स्वभाव का प्रकाश होगा उस सत्य प्रकाशके अनुभवको साक्षात् स्पष्ट जानता है कि लो यह मैं हूं। आत्मा का परिज्ञान करना सबसे महान् उत्कृष्ट पुरूषार्थ है। इस धन वैभव का क्या है? रहे तो रहे, न रहे तो न रहे। न रहना हो तो आप क्या करेंगे, और रहना हो तो भी आप क्या कर रहे है? आप तो सर्वत्र केवलज्ञान ही कर रहे हैं,कल्पना ही कर पाते हैं। कोई-कोई पुरुष बाह्य विकल्पों का परिहार करके परमविश्राम पाये तो वहाँ अपने आप ही यह शुद्ध ज्ञानस्वरूप आत्मप्रकाश उपयोग में प्रकट हो जाता है। जब इस आत्मा की सत्ता स्वतः सिद्ध समझमें आती है, इस आत्मा को असिद्ध कहना ठीक नहीं है।

तनुमात्रप्रतिपादनसे सर्व व्यापकत्वका निरसन—दूसरा विशेषण इसमें दिया गया है—आत्मा शरीर मात्र है। इसके विपरीत कुछ लोग तो यह कहते हैं कि यह आत्मा आकाश की तरह व्यापक है, आकाश के बराबर फैला हुआ है। जिस प्रकार सर्वत्र आकाश विद्यमान है उसी प्रकार आत्मा भी सर्वत्र मौजूद रहता है, कहींआत्मा का अभाव नहीं है। जैसे आकाश तो एक है और घड़े में जो पोल है उसमें समाये हुए आकाश को लोग कहते हे कि घड़े का आकाश है यह कमरे का आकाश है। जैसे उन घड़ोंने भीत और घड़ियालों के आवरण के कारण आकाश के भेद कर दिए जाते हैं कि यह अमुक आत्मा है, यह अमुक आत्मा है ऐसा एक मंतव्य है, परन्तु वह मंतव्य ठीक नहीं है। जो चीज एक होती है और जितनी बड़ी होती है उस एक में किसी भी जगह कुछ परिणमन हो तो पूरे में हुआ करता है। यहाँ तो भिन्न-भिन्न देहियोंमें विभिन्न परिणाम देखा जा रहा है।

पदार्थ के एकत्वका प्रतिबोध—यह चौकी रखी है, यह एक चीज नहीं तभी तो चौकी के एक खूँट मे आग लग जाये तो धीरे-धीरे पूरी जलती हे। एक पदार्थ वह होता है कि एक परिणमन जितने में पूरे में नियम से उसी समय होना ही पडे़। जैसे एक परमाणु। परमाणु में जो भी परिणमन होता है वह सम्पूर्ण में होता है। कितना है परमाणु सम्पूर्ण ? एक प्रदेशमात्र, उसे निरंश कहते हैं। तो एक परिणमन जितने में नियम से हो उतने को एक कहा करते हैं। यह आत्मा सर्वत्र व्यापक केवल एक ही होता तो हम जो विचार करते हैं,मानते हैं उतना जो ज्ञानका परिणमन हुआ, वह परिणमन पूरे आत्मा में होना चाहिए। फिर यह भेद क्यों हो जायगा कि आप जो जानते हैं सो आप ही जानते हैं,मैं नहीं जान सकता। जब एक ही आत्मा है तो जो भी परिणमन किसी जगह हो वह परिणमन पूरे आत्मा में होना चाहिए, पर ऐसा होता नहीं है हममें सुख परिणमन हो तो वह हममें ही होता है आपमें नहीं जा सकता है। जो आपमें होता है, हम सबमें नहीं जा सकता है। इससे सिद्ध है कि आत्मा एक सर्वव्यापक नहीं है। रही आकाश की बात। दृष्टान्तमें जो कहा गया था तो घड़े मे, हंडे में, आकाश कुछ घड़े का, हंडे का अलग-अलग नहीं है। आकाश तो वही एक है। कही घड़े का उठाकर धर देने से वहाँ का आकाश न रहे, घड़े के साथ चल आए, ऐसा नहीं होता है। आकाश मे जो भी एक परिणमन होता है वह पूरे आकाश में होता है। वह एक वस्तु है।

आत्माके अत्यन्त अल्पीयस्त्वका निरसन—कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि आत्मा बटके बीज के दाने की तरह छोटा है। जैसे बड़के फलका दाना होता है तो वह सरसों बराबर भी नहीं है, तिल के दाने बराबर भी नहीं है। इतना छोटा बीज और किसीका होता ही नहीं है। तो बटके बीजका जितना एक दाना होता है आत्मा तो उतना ही छोटा है इस सारे शरीर में। पर यह छोटा आत्मा रात दिन इस शरीर में इतना जल्दी चक्कर लगाता रहता है कि हम आपको ऐसा मालूम होता है कि मैं इतना बड़ा हूं। जैसे किसी गोल चका में तीन जगह, दो जगह आग लगा दी जाय कपड़ा बाँधकर और उस चकेको बहुत तेजी से गोल-गोल फिराया जाय तो आप यह नहीं परख पाते हैं कि इसमें तीन जगह आग है। वह एक ही जगह मालूम होती है। अच्छा, चका और आग की बात दूर जाने दो। अब जो बिजली का पंखा चलता है उसमें पंखुड़ियां है पर जब पंखा चलता है तो यही नहीं मालूम होता है कि इसमें तीन पंखुड़ियाँ है वह पूरा एक नजर आता है। इससे भी अधिक वेग से चलने वाला आत्मा यों नहीं विदित हो पाता है कि यह आत्मा बटके दाने के बराबर सूक्ष्म है, ऐसा एक मंतव्य है। वह भी मंतव्य ठीक नहीं है।

आत्माके देहप्रमाण विस्तारका समर्थन—आत्मा के बट बीज के बराबर छोटा होने का कोई कारण नहीं है, और यह इस तरह के चक्कर अगर लगाए तो शरीर तो बड़े बेहूदे ढंग का है, दो टांगे, इतनी लम्बी पसर गयी है, २ हाथ ऐसे अलग-अलग निकल गए है, इसमें आत्मा किस तरह घूमें, कहाँ-कहाँ जाय? यह आत्मा न तो बड़के बीज के दाने बराबर छोटा है और न आकाश की तरह एक सर्वव्यापक है किन्तु कर्मोदयानुसार जब जैसा छोटा या बड़ा शरीर मिलता है तो उस शरीर प्रमाण ही इस आत्मा का विस्तार बनता है। इस आत्मा के प्रदेश में संकोच और विस्तार करने की प्रकृति है। छोटा शरीर मिला तो प्रदेश संकुचित हो गए बड़ा शरीर मिला तो प्रदेश फैल गए। यह आत्मा कर्मोदयसे प्राप्त अपने-अपने शरीर के प्रमाण ही विस्तार में रहता है।

चारुवाक्—आत्मा के सम्बंध में सिद्धान्त रूपसे जो यह मान्यता है कि यह शरीर, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पांच तत्त्वों से बनता है ऐसा सिद्धान्त मानने वालों का नाम है चार्वाक, जिसे सम्हाल करके बोलिये चारुवाक। चारु मायने प्रिय, वाक् मायने वचन, जिसके वचन सारी दुनिया को प्रिय लगें उसका नाम है चारुवाक। यदि कोई यह कहे कि क्या आत्मा और धर्म के झगड़े में पड़ते हो, खूब खावो, पियो, मौज उड़ावो और देखो इन्द्रियके विषयो में कितना मौज है, कौन देख आया है कि क्या है आगे? है ही कुछ नहीं आगे। जो कुछ है वह दिखता हुआ सब कुछ है इसलिए आराम से रहो, खूब मौज से रहो, कर्जा हो तो हो जाने दो मगर खूब घी शक्कर खावो। आगे न चुकाना पड़ेगा, जीव आगे कहाँ रहता है, ऐसी बातें सुनने में जगतके लौकिक जीवों को तो प्रिय लगती होगी, ऐसे लौकिक वचन जिनको प्रिय लगते हैं उनका नाम है चारुवाक। यह तो सिद्धान्त वाली बात है, परन्तु इस सिद्धान्त का परिचय नहीं है तो न सही किन्तु इस मंतव्य वाले इने गिने बिरले तत्त्वज्ञ साधु संतों को छोड़कर सारी दुनिया इसके मत की अनुयायी है।

नास्तिकता—भैया ! यों तो नाम के लिए कोई जैन कहलाए फिर भी इन जैनों में जैसे मानो आज संख्या लाखों की है तो उन जैनों में व्यवहारिक रूपसे और मंतव्य के रूपसे चारुवाककी श्रेणी में अधिक होगा। और भी जितने धर्म मजहब है उनमें भी चारुवाक भरे पड़े है। जो आस्तिक नहीं है वे सब चारुवाक है। यहाँ आस्तिक का अर्थ है पदार्थ की जिसकी जैसी सत्ता है, अस्तित्त्व है उसे जो माने उसका नाम आस्तिक है, और जो पदार्थ का अस्तित्त्व न मानें उनका नाम नास्तिक है। यह तो मनगढ़न्त परिभाषा है कि जो हमारे शास्त्रों को न माने सो नास्तिक है। जो हमारे वेदों को न माने सो नास्तिक, जो हमारे कुरान को न माने सो नास्तिक। हर एक कोई अपना-अपना अर्थ लगा ले, कोई काफिर शब्द कहता है, कोई नास्तिक शब्द कहता है, कोई मिथ्यादृष्टि शब्द कहता है, ये सब एकार्थक शब्द है। नास्तिक का अर्थ यह नहीं है कि जो मेरे मत की बात न माने सो नास्तिक, किन्तु नास्तिक का अर्थ है पदार्थ की जैसी सत्ता है, अस्तित्त्व है उस अस्तित्त्व का न होना माने सो नास्तिक है। नास्तिक शब्द में कहाँ लिखा है यह कि वेद को या अमुक मजहब को या इस पुराण को न माने सो नास्तिक उसमें दो ही तो शब्द है, न और अस्ति। जैसा जो अस्ति है उसे न माने सो नास्तिक।

लौकायतिकता—चारुवाक सिद्धान्त में यह मत बना है कि आत्मा कुछ नहीं है। पृथ्वी, जल, अग्नि, और वायु के संयोग से एक नवीन शक्ति प्रकट हो जाती है जिसे लोग जीव कहते हैं। जैसे महुवा और कोदो आदिक जो मादक पदार्थ है उनका सम्पर्क हो, वे सड़े गले तो एक मादक शक्ति पैदा हो जाती है जिसके सेवन से, नशा जनक उन्मादक पदार्थों के प्रयोग से मनुष्य पागल हो जाता है। तो जैसे शराब कोदो में नहीं भरी पड़ी है, कोदो को लोग खाते हैं,उसके चावल खाते हैं,रोटी खाते है? कोदोमें कहाँ शराब है पर कोदो और अन्य-अन्य पदार्थों को मिला दिया जाय तो विधिपूर्वक उन पदार्थों का संयोग होने से शराब बन जाती है, ऐसे ही पृथ्वी में समझ नहीं है, जल में चेतना नहीं है, अग्निमें नहीं है, वायु में नहीं है, पर इसका विधिपूर्वक संयोग हो जाय तो चेतना शक्ति हो जाती है ऐसा चारुवाक का सिद्धान्त है।

चार्वाकसिद्धान्त में आत्मविनाशकी विधि—चार्वाक मन्तव्य में यह धारणा जमी हुई है कि पृथ्वी आदि बिखरे कि चेतना मूल से खतम हो गई। पृथ्वी-पृथ्वी से मिल गयी, अग्नि-अग्निमें, जल-जल में, वायु-वायु में, चेतना समाप्त। बच्चे लोग जब अपनी धोती सुखाते हैं तो ऐसा बोलते हैं कि कुवांका पानी कुवांमें जाय, तला का पानी तला में जाय, ऐसा काम बच्चे लोग कलासहित करते हैं। सीधे काम करने की उनकी प्रकृति नहीं है। तो जैसे उन बच्चोंका मंतव्य है कि हमारी धोती में तला का पानी चिपका है जिससे गीली है तो तला का पानी तला में चला जाय ऐसे ही इस चारुवाकबच्चे का यह मंतव्य है कि इस मुझमें जो अंश जहाँ का हो पृथ्वी तत्त्व, जल तत्त्व जो मुझमें शामिल हो वे तत्त्व बिखर जायेंगे तो आत्मा मिट गया। कितने ही लोग मरना चाहते हैं और कितने ही लोग जीना चाहते हैं। कुछ सुख भरी जिन्दगी हो तो जीना अच्छा है और क्लेशकारी जिन्दगी हो तो मरना अच्छा है। उनका जीना भी मुफ्त है और मरना भी मुफ्त है अर्थात् मरकर भी कुछ न रहेगा।

अत्यय शब्दका भाव—विनाशवादी लोग इस आत्मा का अस्तित्त्व नहीं मानते हैं। वे जानते हैं कि गर्भ से लेकर मरने तक ही यह जीव है आगे यह जीव नहीं है। इस मंतव्य का खण्डन करने के लिए इस श्लोक में निरत्ययः शब्द दिया है। आत्मा की जानकारी के लिए यह ५ विशेषणों का विवरण चल रहा है। जिससे तीसरा विशेषण है निरत्ययः। आत्मा अविनाशी है। अत्यय का अर्थ है अतिक्रान्त हो गया है अय मायने आना जहाँ याने अत्यय अभाव को कहते हैं। अत्यय न हुआ जहाँ उसका नाम है निरत्ययः। लोग निरत्ययः का अर्थ सीधा नष्ट हो जाना कह देते हैं। ठीक है, निरत्ययका अर्थ है नष्ट होना। किन्तु नष्ट होने मे होता क्या है? तो नष्ट होने का यह अत्यय जो नाम है उसमे यह मर्म पड़ा है कि इसमें अब परिणमन न होगा। जब तक परिणमन है तब तक पदार्थ है। जब परिणमन ही न हो तो पदार्थ ही कहाँ रहेगा? न हो परिणमन तो मूल से नाश हो गया। यह कठोर शब्द है अत्यय। विनाश शब्द के जितने पर्यायवाची शब्द है उन सबमें यह बड़ा कठोर शब्द है।

विलय शब्द का भाव—विनाश का पर्यायवाची शब्द विलय है, किन्तु विलय शब्द कठोर नहीं है। पर्याय का विलय हो गया अर्थात् पर्याय विलीन हो गयी। पर्याय द्रव्य में समा गयी—इसका कुछ सत्त्वरखा, कठोरता नहीं वर्ती, और होता भी यही है विनाश में कि नवीन पर्याय द्रव्यमें विलीन हो जाती है। जैसे एक बूढिया रहटा कातती थी। उसका तकुवा टेढ़ा हो गया तो उसे लेकर वह लोहार के पास पहुंची, बोली कि इस तकुवाकी टेढ़ निकाल दोगे? बोला हाँ निकाल देंगे, दो टके (चार पैसे) लेंगे। ठीक है। लोहार ने उसे सीधा कर दिया, टेढ़ निकल गयी। तो जब लोहार उसे देने लगा तो कहा कि अब लावो २ टके पैसे। तो बुढ़िया बोली कि तुमने जो इस तकुवेकी टेढ़ निकाली है वह हमारे हाथ में दे दो तब अपने टके ले लो। अब लोहार बड़ा हैरान हुआ। सोचा कि कैसे इस तकुवेकी टेढ़को इसके हाथ में दे-दे? हाँ वह ऐसा कर सकता है कि उस तकुवेको फिर टेढ़ा कर दे। सोचा कि इस तकुवेके टेढ़ा करने में हैरान भी हो तो भी यह हमारे दो टके न देगी। तो जैसे वहाँ यह बतावो कि तकुवामें जो टेढ़ थी वह गयी कहाँ? उस तकुवेसे निकलकर कही बाहर गयी है क्या? अथवा वह टेढ़ तकुवामें अब भी धंसी हुई है क्या? न टेढ़ बाहर गयी है, न टेढ़ तकुवे मे धंसी है तो हुआ क्या उसका ? टेढ़ तकुवा में विलीन हो गयी। न यहाँ दूर होने की बात कही, न तकुवामें रहने की बात कही और दोनों की बात कह दी। तो विनाश का अर्थ विलीन भी है पर यह कोमल प्रयोग है।

आत्माकी निरत्ययरूपता—यह चारुवाक विलय शब्द जैसे कोमल प्रयोग को भी राजी नहीं है, वह मानता है अत्यय। जहाँ अत्यय होता ही नहीं है, अयसे अतिक्रान्त हो गया, अयसे ही पर्यय शब्द बना है, पर्यय और पर्याय दोनों का एक ही अर्थ है। जैसे मनःपर्ययज्ञान । तो कही इस परिणमनका नाम पर्यय भी रख दिया है। कही इसका नाम पर्याय भी रख दिया है। आचार्य कहते हैं कि आत्मा निरत्यय है, उसका अभाव नहीं होता है विनाश नहीं होता है। यह द्रव्यरूपसे नित्य है। कुछ भी परिणमन चलो, व्यक्त हो, अव्यक्त हो वह परिणमन जिस स्त्रोतभूतद्रव्य के आधार में होता है वह द्रव्य शाश्वत रहता है। आत्मा द्रव्य रूपसे नित्य है। यद्यपि पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा से आत्मा प्रतिक्षण विनाशीक है, फिर भी द्रव्यदृष्टिसे देखो तो शाश्वत वही का वही है। पर्यायदृष्टिसे देखने पर ही प्रतीत होगा कि प्रत्येक पदार्थ अपने आपमें प्रतिसमय नवीन-नवीन परिणमन करता है, वह नवीन परिणमन पूर्व परिणमन से अत्यन्त विलक्षण नहीं है अथवा समान हो तो वहाँ यह परिचय नहीं हो पाता कि इस पदार्थ में कुछ बदल हुई।

पर्यायदृष्टिमें क्षणिक रूपता—परमात्मा का केवलज्ञान जैसा शुद्ध परिणमन भी केवलज्ञान भी परमार्थतः प्रतिक्षण नवीन परिणमनसे रहता है, यद्यपि वह अत्यन्त समान है, जो पूर्वसमयमें विषय था केवलज्ञानका वही का वही उतना का ही उतना अगले-अगले समय में विषय रहता है फिर भीपरिणमन न्यारा-न्यारा है। जैसे बिजली का बल्ब १५ मिनट तक रोशनी करता रहा और पूरे पावर से बिजली है, उसमें कुछ कमीबेशी नहीं चल रही है, बिल्कुल एकसा प्रकाश है। इस बल्बने जो एक मिनट पहिले प्रकाशित किया था वही का वही प्रकाश दूसरे मिनट में भी प्रकाशित है फिर भी पहिले मिनट की बिजली का पुरूषार्थ पहिले मिनट में था, दूसरे मिनट नया पुरुषार्थ है, नई शक्ति का परिणमन है, विषय भले ही समान है किन्तु परिणमने वाला पदार्थ प्रतिक्षण नवीन-नवीन पर्याय से परिणमता है। यो पहिले समय की पर्याय अगले समय में भी नहीं रहती है, इतना क्षणिक है समस्त विश्व, लेकिन यह पर्यायदृष्टि से क्षणिक है।

विभावपरिणतिकी क्षणिकरूपता—संसारी जीव में किसी वस्तुविषयक प्रेम हुआ, राग परिणमन हुआ तो जब तक वह राग अन्तर्मुहूर्त तक न चलता रहे, न बनता रहे तब तक हम आपके ज्ञान में नहीं आ समता। हम जिस राग का प्रयोग करते हैं,जिस राग से प्रभावित होते हैं वह एक समय का राग नहीं है। कोई भी संसारी प्राणी एक समय के राग से प्रभावित नहीं होता, किन्तु असंख्यात समय तक वह राग-राग चलता रहे तब हम उपयोग में, ग्रहण में आता है और हम प्रभावित होते हैं,फिर भी उपयोग के विषयभूत उस रागपर्याय समूह में प्रतिक्षण जो राग परिणमन है वह प्रतिसमयका एका एक परिणमन है, किन्तु वह एक समय के परिणमन प्रभु के ज्ञान द्वारा जाने जा सकते हैं,क्योंकि उनका केवलज्ञान निरपेक्ष असहाय होता हुआ प्रति समय की परिणति को जाननेवाला है, पर छद्मस्थ जीव एक समय के रागपरिणमनको ग्रहण नहीं कर सकते। यो उपयोग द्वारा जान भी नहीं सकते। यद्यपि इस ही उपयोग से हम राग के एक समय की चर्चा कर रहे हैं। समयवर्ती राग होता है, हम चर्चा कर रहे हैं,पर विशद परिचय नहीं हो सकता। हम छद्मस्थ जान लेते हैं युक्तियों से, आगम से, पर जिसे अनुभव में आना कहो, परिचय में आना कहो वैसा एक समय का राग परिचय में आ ही नहीं सकता, किन्तु होता है अवश्य प्रतिसमयमें परिणमन और एक समयका परिणमन दूसरे समय रहता नहीं है।

परिणमनके आधारकी ध्रुवता—प्रतिक्षण परिणामी क्षणिक है यह आत्मा और समस्त पदार्थ परन्तु परिणमन दृष्टि से यह क्षणिकता है। अत्यय नहीं हो गया उसका, पर्यायों का आना नहीं खत्म हुआ है, पर्यायें चलती ही रहेंगी। एक पर्याय मिटनेके बाद उसमें दूसरी पर्याय आती है, तो जिसमे पर्याय आयी वह पदार्थ शाश्वत है। यह आना जाना किस पर हुआ? वह पदार्थ ही कुछ न हो, मात्र परिणमन ही हो सब, तो सिद्धि नहीं हो सकती। क्षणिकवादी लोग परिणमनको ही सर्वस्व पदार्थ समझते हैं परन्तु परिणमनका आधार अवश्य हुआ करता है और वह अविनाशी है। इस प्रकार यह आत्मा किन्ही बाह्य चीजों से उत्पन्न नहीं हुआ है किन्तु यह अविनाशी ध्रुव पदार्थ है।

आत्मा आनन्दमयता व ज्ञानस्वरूपता—चौथेविशेषण में कहा है कि आत्मा सुखमय है। कोई मंतव्य ऐसे है कि आत्मामें सुख नाम का गुण ही नहीं मानते किन्तु कलंक मानते हैं,इसी प्रकार ज्ञान नाम का गुण ही नहीं मानते किन्तु कलंक मानते हैं। इस सुख का और इस ज्ञानका जब विनाश होगा तभी मोक्ष मिल सकेगा, ऐसा मंतव्य है। वर्तमान परिचय की दृष्टि से उन्होंने इसकी शुद्धता मानी है, क्योंकि लौकिक सुख और लौकिक ज्ञान इन दोनों से ज्ञानी पुरुष परेशानी मानता है। ज्ञानी तो शुद्ध ज्ञान और शुद्ध आनन्द को ही उपादेय मानता है। आत्मा का ज्ञान और सुख दोनों ही स्वरूप है, इसी कारण यह आत्मा अनन्त सुखवान है और लोक अलोक समस्त पदार्थों का जाननहार है। इस प्रकार यह आत्मा जिसके ध्यान से सहज आनन्द प्रकट होता है वह आत्मा स्वसम्वेदनगम्य है, शरीर मात्र है अर्थात् शरीर प्रमाण है, अविनाशी है, सुखस्वरूप है और समस्त लोकालोकका जाननहार है, ऐसे परमात्मतत्त्वमें जो आदर करता है वह विवेकी पुरुष है।

 


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