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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:इष्टोपदेश - श्लोक 27

From जैनकोष



एकोऽहं निर्ममः शुद्धो ज्ञानी योगींद्र गोचर:।

बाह्य: संयोगजा भावाः मत्तःसर्वेऽपि सर्वथा।।27।।

ज्ञानी का चिंतन―ज्ञानी पुरुष चिंतन कर रहा है कि मैं एक हूँ, अकेला हूँ अपनी सब प्रकार की सृष्टियों में-मैं ही एक परिणत होता रहता हूं। मेरा कोई दूसरा नहीं है। मेरा मात्र मैं ही हूं, निर्मम हूं। मेरे में ममता परिणाम भी नहीं है और ममता परिणाम का विषयभूत कोई पदार्थ मेरा नहीं हे। मैं शुद्ध हूं अर्थात् समस्त परपदार्थों से विविक्त अपने आपके द्रव्यत्व गुण से परिणत रहने वाला हूं, योगींद्रों के द्वारा गोचर हूं। मेरा यह सहज आत्मस्वरूप योगींद्र पुरुषो के द्वारा विदित है। अन्य समस्त संयोगजन्य भाव मेरे से सर्वथा पृथक है।

नाना पर्यायों में भी आत्मा का एकत्व―यद्यपि पर्यायार्थिकनय की दृष्टि से यह जीव नाना रूप बनता है। मनुष्य बना, देव बना, नारकी हुआ, नाना प्रकार का तिर्यंच हुआ। नाना विभाव व्यंजन पर्यायें प्रकट हुई है फिर भी यह जीव अपने स्वरूप में एक ही प्रतिभासमान है, प्रत्येक पदार्थ द्रव्यपर्यायात्मक होता है। कोई पदार्थ हो वह है और उसकी कुछ न कुछ दशा है। पर्याय और द्रव्य इन दोनों से ही तदात्मक यह समस्त विश्व है। कोई पदार्थ ऐसा नहीं है कि वह केवल द्रव्य ही हो और उसमें परिणति कुछ न होती हो और न कोई पर्याय ऐसा है कि केवल पर्याय ही है उसका आधारभूत कोई-द्रव्य नहीं है, इसी कारण यद्यपि आत्मा की नाना स्थितियाँ होती है, ज्ञानादिक गुणो का परिणमन भी चलता है और व्यंजनपर्यायें भी नाना चल रही है तिस पर भी मैं सर्वत्र अकेला हूं।

व्यावहारिक प्रसंगो में भी एकाकित्व―व्यावहारिक प्रसंगो में भी मैं अकेला हूं। सुखी दुःखी भी मैं अकेला ही होता हूँ। जिस रूप भी परिणत होता हूं यह मैं अकेला ही। किन्ही भी बाह्य पदार्थों का ध्यान करके किसी विभावरूप परिणम जाऊँ, वहाँ पर भी यह मैं अकेला ही परिणत होता हूं, दूसरा कोई मेरे साथ परिणत नहीं होता। मैं सर्वत्र एक हूं। जो पुरुष अपने को एक नहीं निरख पाते हैं किंतु मैं अनेक रूप हूँ, दूसरा कोई मेरे साथ परिणत नहीं होता। मैं सर्वत्र एक हूं। जो पुरुष अपने को एक नहीं निरख पाते हैं किंतु मैं अनेक रूप हूँ, मेरे अनेक है, मुझे अनेक वस्तु शरण है, अमुक पदार्थ के होने से मेरी रक्षा है―इस प्रकार के विकल्पो से अपने एकत्व को भूलकर किन्ही बाह्य पदार्थों को लक्ष्य में लेकर मोहविकार रूप परिणमन में लगता है वह पुरुष संसार में ही भटकता है। एक अपने चैतन्यस्वरूप एकत्व को त्याग कर इसको उपयोग में न लेकर अब तक संसार में रुला हूँ।

श्रद्धानकी कला से आनंद या क्लेश की सृष्टि―जिस भव में गया उस ही भव में जो मिला उसमें ही ममता की, जो पर्याय मिली उस ही रूप अपने को माना। गाय, बैल, भैंसा हुआ तो वहाँ उस ही रूप अपनी प्रतीति रखी। देव नारकी हुआ तो वहाँ उस ही रूप अपनी प्रतीति रखी। मनुष्य भव में तो है ही, यहाँ ही देख लो, हम अपने निरंतर मनुष्यता की प्रतीति रखते हैं मैं मनुष्य भी नहीं हूं, किंतु एक अमूर्त ज्ञानानंदस्वरूप चेतन पदार्थ हूँ। ऐसी प्रतीति में कब-कब रहते हैं ? कभी नहीं। यदि ज्ञानानंदस्वरूप की प्रतीति हो तो फिर आकुलता नहीं रह सकती है, आकुलता कहाँ है ? निराकुल शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप आत्मतत्त्वको निरखें तो वहाँ आकुलता का नाम नहीं है। वह अपने स्वरूप से सत् है, समस्त परभावों से मुक्त है। यह मैं आत्मा निर्मम हूं। यहाँ शुद्ध ज्ञायकस्वरूप आत्मतत्त्व को निरखा जा रहा है, इसमें मिथ्यात्व, काम, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कुछ भी परभाव नहीं है। स्वरसतः निरखा जा रहा है।

विभावों के संबंध के विवरण में एक दृष्टांत―यद्यपि वर्तमान में ये समस्त विभाव इस आत्मा के ही परिणमन है। रागी कौन हो रहा है ? यह जीव ही तो, परंतु यह राग जीव में नहीं है, जीव के स्वभाव में राग नहीं है राग हो गया है। किसका बताएँ। जैसे जब दर्पण को देखते हैं तो उसमें सुख की छाया झलकती है, अब वहाँ यह बतलावो कि यह मुख के आकार का जो परिणमन है वह परिणमन क्या मुख का है अथवा दर्पण का है। दर्पण में जो मुंह का आकार बना है वह आकार यदि देखने वाले पुरुष का होता तो उसके शरीर में फिर मुंह ही न रहता क्योंकि उसका मुंह तो दर्पण में चला गया। दो मुंह तो नहीं है, हम आपका एक-एक ही तो मुंह लगा है। इसलिए वह दर्पण से हटा लो या मुंह को हटा लो वहाँ से तो कहाँ रहा मुंह का प्रतिबिंब? वह स्वच्छ का ही स्वच्छ है। जिस समय दर्पण में मुख का प्रतिबिंब झलक रहा है उस काल में भी ऐसा लगता है कि यह प्रतिबिंब दर्पण के ऊपर लोट रहा है। दर्पण में थमकर नहीं रह पाता। वह दर्पण से पृथक है।

विभाव का किसी भी पदार्थ में टिकाव का अभाव―ऐसे ही जो रागद्वेष भाव उत्पन्न होते हैं आत्मा में, ये रागादिक भाव क्या कर्म के है? यदि कर्म के रागादिक होते तो कर्म दुःखी हो रहे हैं,फिर मुझ जीव को क्या पड़ी है कि व्रत करे, तप करें, साधना करे। ये रागादिक तो कर्मों में है, दुःखी हो तो कर्म दुःखी हो, पर ऐसा तो नहीं है। ये रागादिक भाव कर्म मे नहीं है, ये तो चेतन में ही परिणत हो रहे हैं,लेकिन क्या ये रागादिक इस चैतन्य के स्वभाव से उठे हुए है ? क्या इस जीव के स्वभाव में रागद्वेष करना पड़ा है ? इस तत्त्व को उसही दृष्टि में निहारे जैसे दर्पण में प्रतिबिंब की बात निरखी गयी थी। दर्पण में प्रतिबिंब डगमग डोलता रहता है। सामने मुख है तो दर्पण मे प्रतिबिंब है, मुख को थोड़ा एक तरफ किया तो वह दर्पण का प्रतिबिंब भी एक तरफ हो गया। मुख हटा लिया तो प्रतिबिंब हट गया, मुख दर्पण के सामने कर लिया लो प्रतिबिंब आ गया। क्या दर्पण की चीज इस तरह से अस्थिर होती है? जरा-जरा सी देर में बिल्कुल हट जाये, जरा सी देर में फिर आ जाय, क्या ऐसी बात दर्पण में पायी जाती है ? नहीं। यह दर्पण का प्रतिबिंब नहीं है, यह औपाधिक है। ऐसे ही ये रागद्वेष मेरे स्वरूप में नहीं है, ये औपाधिक है ये कर्मों की उपाधि से उत्पन्न हुए है, कर्मों का उदय है वह निमित्त है, जीव में वे रागादिक होते हैं ये रागादिक मानो आत्मा में ऊपर-ऊपर ही लोट रहे हैं। भीतर तो स्वरूप और स्वभाव ठोस रूप से बना हुआ है।

आत्मा में भेदषट्कारकता का अभाव―यह आत्मा ज्ञानघन है आनंदघन है। जो इसका स्वरूप है वह इसके स्वरूप में स्वभाव में स्थिरता से है। रागादिक मुझ आत्मतत्त्व मे नहीं है। मैं निर्मम हूं, शुद्ध हूं। मैं हूं और परिणत हो रहा हूं, पर ये परिणमन, ये वर्तमान परिवर्तन किसके द्वारा हो रहे हैं,किसमें हो रहे हैं,किसके लिए हो रहे हैं ? यह भेद यहाँ नहीं है। बस ज्ञाताद्रष्टा बनो और यह निरख लो कि यह जीव है और इस तरह परिणम रहा है, वह दूसरे पदार्थ से नहीं परिणमता, वह दूसरे पदार्थ मे नहीं परिणमता। समस्त कारक चक्र की प्रक्रियायें इस आत्मतत्त्व में नहीं है यह मैं परमार्थतः जाननहार हूं, मैं जानता हूं, किसको जानता हूं? इस जानते हुए निजस्वरूप को जानता हूं, किसी बाह्य पदार्थ को नहीं । जब यह जीव विकल्प करके किसी बाह्य पदार्थ को भी जान रहा है तो वहां भी यह बाह्य पदार्थों को नहीं जान रहा है किंतु बाह्यपदार्थों के संबंध में अपने आपका उस तरह से ज्ञान प्राप्त कर रहा है।

पर के जानन का व्यवहार―मैं जानता हूँ किंतु इस जानते हुए को ही जानता हूँ, किसी अन्य को नहीं जानता। भेदभाव में यह बात देर में बैठेगी पर एक युक्ति से देखो मैं जितना जो कुछ हूँ और जो यह मैं जो कुछ परिणम सकता हूँ वह अपने में ही परिणमूंगा किसी अन्य में नहीं। मेरी क्रिया, मेरी चेष्टा मेरे में ही होकर समाप्त होगी। जो कुछ भी मेरी क्रियायें है वे सब मेरे आत्मा मे ही होगी य अन्य मे होगी? तब इस बाह्य पदार्थ को वास्तव मे जाना कैसे? अपने आपको जाना है, पर उस जानन में जो बाह्य पदार्थ विषय होते हैं उनका नाम लगाया जाता है। जैसे एक लोक दृष्टांत लो। हम दर्पण को देख रहे हैं,बड़ा दर्पण है, हमारी पीठ पीछे दो चार बालक खड़े है। उन बालकों के निमित्त से इस दर्पण मे भी उन जैसा प्रतिबिंब हो गया है। हम क्या कर रहे हैं ? केवल दर्पण को देख रहे हैं और बताते जा रहे हैं सब कुछ, अमुक लड़के ने हाथ उठाया, अमुक ने पैर उठाया, अमुक ने हाथ हिलाया, उन लड़कों की सब बातें हम कहते जाते हैं,जानते जाते हैं,पर हम देख रहे हैं केवल दर्पण को । तो जैसे हम केवल दर्पण को देख रहे हैं पर बातें सब लड़कों की बता रहे हैं इसी प्रकार हम केवल ज्ञानमयी आत्मा को जान रहे हैं और बातें बताते हैं दुनियाभर की । पूर्व जो की, इतिहास की, लोक की स्थिति की, क्षेत्र की। सभी प्रकार की बातें बताते हैं,पर हम जान रहे हैं केवल अपने आत्मा को।

ज्ञाता में ज्ञान का चमत्कार―कैसा विशाल चमत्कार है, कैसा ज्ञानस्वरूप यह आत्मा है कि यह केवल ज्ञानस्वरूप आत्मतत्त्व को जान रहा है और बखान करता है अनेक पदार्थों का। मैं ऐसा शुद्ध हूँ, मैं जो कुछ करता हूँ, अपने को, अपने से, अपने में, अपने लिए अथवा करने का कुछ नाम ही नहीं है। मैं जो कुछ भी हूं, बर्त रहा हूं उतना ही मात्र द्रव्य पर्यायात्मक संबंध है। इस प्रकार यह ज्ञानी पुरुष अपने आत्मा के स्वरूप को निरख रहा है, मैंशुद्ध हूं। स्वभाव पर दृष्टि देकर यह बात समझी जा रही है कि मैं अपने आप अपनी ही सत्ता के कारण अपने में शुद्ध हूं, ज्ञानमय हूं।

पदार्थों का पर के द्वारा अभेद्य स्वरूप―भैया! जितने भी पदार्थ होते हैं सबमें अस्तित्व, वस्तुत्व, द्रव्यत्व, अगुरूलघुत्व, प्रदेशवत्व, प्रमेयत्व ये 6 गुण होते हैं। अस्तित्व के कारण ये पदार्थ सत् है, इनमें है पना है, इनका अस्तित्वपना है वह अस्तित्व गुण का काम है। वह पदार्थ वही रहे, दूसरा न बन जाये, दूसरे रूप न हो जाय, अपने मे ही सत् है, परसे असत् है, ऐसा नियम वस्तुत्व गुण से हुआ है। प्रत्येक पदार्थ निरंतर परिणमता रहे, परिणमन को छोड़कर वह विश्रांत नहीं हो सके, यो द्रव्यत्व गुण के कारण यह निरंतर परिणमता रहता है। अगुरूलघुत्व गुण से यह नियम बन जाता है कि यह पदार्थ अपने में ही परिणमेगा, किसी दूसरे में न परिणमेगा। प्रदेश इसमें है ही और प्रमेय भी है, इस प्रकार आत्मा में सभी पदार्थों की भाँति ये 6 गुण है, इसके अतिरिक्त सूक्ष्मत्व आदि अनेक गुण है किंतु कल्पना करो कि इस आत्मा में ज्ञान गुण न होता और बाकी गुण होते तो क्या स्थिति होती? क्या हो सकता था कुछ? नहीं । यो आत्मा ज्ञानमयी है, ज्ञानघन है, ज्ञानात्मक है। इस अंतस्तत्व को अध्यात्मयोगी पुरुष ही जान सकता है। जिन्होंने पर को पर जानकर निज को निज जानकर परपदार्थों के विकल्पो को तोड़ा है और केवल अपने आपके स्वरूप में ही रत रहा करते हैं ऐसे पुरुषो को ही इस शुद्ध चैतन्यस्वरूप का दर्शन होता है और इस चित् चमत्कार के अनुभव से ही यथार्थ मर्म को समझते हैं एवं विश्व के समस्त प्राणियों को एक चैतन्य के रूप में देखा करते हैं।

संयोगज भावों की आत्मस्वरूप से भिन्नता―यह मैं यथार्थ शुद्ध केवल आत्मा केवलयोगींद्रों के द्वारा ही परिचय में आ सकता हूं। अज्ञानी जन अपने आप की बात को नहीं समझते हैं। ऐसा यह मैं आत्मा सबसे विविक्त शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप हूं, जितने भी बाह्य भाव है, रागद्वेषादिक है, वे सब संयोगी भाव है। कर्मों के संबंध से यह भाव बनता है, जिसको यह प्रतीति नहीं है कि ये भाव सब संयोगी है, मरे स्वरसतः होने वाले नहीं है, वे कभी मुक्त नहीं हो सकते। जिन अपराधो से मुक्त होना है उन अपराधो का मेरे में वस्तुतः प्रवेश नहीं है। मेरे स्वयं के उन अपराधो का भान हुए बिना कैसे मुक्ति प्राप्त हो सकेगी? समस्त ये औपाधिक भाव, संयोगभाव मेरे से सर्वथा स्वभावतः दूर है। यह सब जानकर कर्तव्य यह है कि जो उपादेय है उसे ग्रहण करें और जो हेय है उसका परिहार करे। उपादेय है यहाँ अपने आपका यह शुद्ध ज्ञानानंदस्वभाव। तन्मात्र ही अपने को अनुभवे तो वहाँ संकटो का नाम ही नहीं है। जहाँ इस निर्विकार स्वरूप से चिगे और संयोग लक्षण बाले इन जड़ पदार्थों में ममत्व बुद्धि की, संकट वही से बन जाते हैं।

प्रधान और गौण कर्तव्य―उद्देश्य जीवन में एक प्रधान होता है और एक गौण होता है जैसे किसको मकान बनवाना है, तो मकान बनवाने का उद्देश्य तो प्रधान है और उस मकान बनवाने के प्रसंगमें अनेक काम किए जाते हैं,जैसे ईटें खरीदना है, सीमेन्टका परमिट बनवाना है, अमुक वस्तु लेना है, मजदूरों को इकट्ठा करना है, ये सब रोज-रोज प्रोग्राम बनते हैं,पर ये प्रधान उद्देश्य तो इसका एक है, जो भी इसने सोचा है। ऐसा ही ज्ञानी पुरुषका मुख्य उद्देश्य केवल एक ही होता है - निरपराध ज्ञानानंदस्वरूप निज कारण प्रभु का दर्शन करना, चिंतन और मनन करना। इसके अतिरिक्त इसकी ही साधना के लिए दर्शन पूजन स्वाध्याय, जाप, सत्संग आदिक जितने भी प्रयोग है वे सब प्रयोग केवल एक इस उद्देश्य को सिद्ध करने के लिए है, वे मुख्य उद्देश्य नहीं है, वे सब गौण है। हमारा मुख्य उद्देश्य है संयोगजन्य भाव से मुक्त होकर सहज आनंदस्वरूप में मग्न रहना, इसकी उपलब्धि जैसे हो इसका प्रयत्न करना यह हमारा गौण प्रोग्राम है।

ज्ञानीका निर्णय―ज्ञानी पुरुष अपने आपके स्वरूप का निर्णय कर रहा है। मैं एक हूं, अपने लिए मैं अद्वैत हूँ। अपनी सब स्थितियों में मैं-मैं ही हूं। मेरा कोई दूसरा शरण अथवा साथी नहीं है समस्त कामनावों से रहित हूं। ज्ञानानंदघन अध्यात्मयोग द्वारा मैं सर्व परपदार्थों में उत्कृष्ट चैतन्यस्वरूप हूं। इस ही तत्त्व की आराधना के प्रसाद से भगवान अरहंत हुए है। जिनका हम पूजन वंदन करते हैं।उनकें और कला ही क्या थी जिससे वे आज हम लोगो के पूज्य कहलाते हैं,वह कला है स्वभाव दर्शन की कला। वे अपने इस चित्स्वभाव में मग्न हुए थे, उसके ही प्रसाद से भव-भव के संचित उनके कर्म जाल नष्ट हुए और अनंत चतुष्टयसंपन्न सर्व भव्य जीवों के उपास्य हुए, ऐसा होने का मेरे में स्वभाव है। ज्ञानी संत इस स्वभाव की उपासना किया करते हैं।


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