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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:इष्टोपदेश - श्लोक 34

From जैनकोष



स्वस्मिन् सदभिलाषित्वादभीष्टज्ञापकत्वतः।

स्वयं हितप्रयोक्तृत्वादात्मैव गुरुरात्मनः।।34।।

स्वयं के द्वारा ही स्वयं के कल्याणका यत्न―यह जीव उत्तम प्रयोजनकी अपने आपमें भी अभिलाषा करता है और उत्तम प्रयोजन के कार्य का खुद ही ज्ञान करता है और हितका प्रयोग भी यह स्वयं ही करता है। इस कारण आत्मा का गुरु वास्तवमें आत्मा ही है। लोक में जब किसी का कोई अभीष्ट गुजर जाता है और उसके हृदय बड़ा धक्का लगता है तब उस विह्लल पुरुष को समझाने के लिए अनेक रिश्तेदार अनेक मित्र खूब समझाते हैं और उपाय भी उसके मन बहलाने का करते हैं किंतु कोई क्या करे, जब उसके ही ज्ञान में सही बात आये, भेदविज्ञान जगे, तब ही तो उसे संतोष हो सकेगा, दूसरे हैरान हो जाते हैं,पर स्वयं समझे तो समझ आये। इससे यह सिद्ध है कि स्वयं के किए से ही फल मिलता है। यहाँ मोक्षमार्ग प्रकरण की बात कही जा रही है। उत्तम बात की अभिलाषा यह जीव स्वयं ही करता, स्वयं में करता और ज्ञान व आचरण भी स्वयं करता है। तब अपना घर परमार्थ से तो स्वयं ही है, किंतु इससे प्राक् पदवी में यह दोष ग्रहण नही करना चाहिए कि लो शास्त्र में तो कहा है कि आत्मा का गुरु आत्मा ही है। अब दूसरा कौन गुरु है, सब पाखंड है, सब ऐसे ही है, ऐसा संशय न करना चाहिए क्योंकि जिस किसी को भी अपने परमार्थ गुरु का काम बना, ध्यान बना, ज्ञानप्रकाश हुआ उसको भी प्रथम तो गुरु का उपदेश आवश्यक ही हुआ।

आत्मलाभमें देशनाकी प्रथम आवश्यकता―भैया ! कोई भी हो वह पुरुष किसी न किसी रूप में ज्ञानी विरक्त गुरुवों का उपदेश लगे तब उसकी आँखे खुलती है। प्रथम गुरु की देशना सबको मिली है, कोई ऐसे पुरुष होते हैं जिनको गुरु को कोई नियोग नही मिला और स्वयं ही अपने आप तत्त्वज्ञान जगा, उनको भी इस भव में नही तो इससे पूर्वभवमें गुरु की देशना अवश्य मिली थी। यह तो शास्त्र का नियम है कि सम्यक्त्वकी उत्पत्ति में 5 लब्धियाँहोती है। सम्यग्दर्शन किसके होता है और किस विधि से होता है, उसके समाधान में कहा गया है कि 5 लब्धियाँ हो तो सम्यग्दर्शन हो उसमें देशना तो आ ही गई।

सम्यक्त्वकी पांच लब्धियों में क्षयोपशम, विशुद्धि, देशना और प्रायोग्यलब्धि―सम्यक्त्वकी लब्धियों में पहिली लब्धि है क्षयोपशम लब्धि। कर्मोंका क्षयोपशम हो, उदय कुछ कम हो तब इसकी उन्नति का प्रारंभ होता है। जब इस प्रकार का क्षयोपशम हो तो दूसरी लब्धि पैदा होती है उसका नाम हैविशुद्धि लब्धि। किसी उत्कृष्ट चीज के लाभ का नाम लब्धि है, परिणाम उसका उत्तरोत्तर निर्मल होता जाता है। जिसकी कषायें मंद हो वही पुरुष तो गुरु के सम्मुख बैठ सकेगा, गुरु की विनय कर सकेगा, गुरु की बात ग्रहण कर सकेगा। ऐसा व्यक्ति जो कषायों में रत रहता है वह गुरु की देशना सुनेगा ही क्यों? तो जब विशुद्धि बढ़ी, जब यह गुरु के उपदेश का लाभ प्राप्त करता है। यहाँ तक तो कुछ बुद्धिपूर्वकउद्यम की बात रही। अब इसके बाद स्वयं ही ऐसा परिणाम निर्मल होता है। जिसके प्रताप से कर्मों का बंध और बहुत बड़ी स्थिति वह घटाने लगता है, कम स्थितिका कर्म बाँधने लगता है। और उसही दरम्यान में 34 अवसर ऐसे आते हैं जिनमें जो नियत प्रकृतियाँ है उनका बंध रूक जाता है। यह मिथ्यादृष्टि जीव की ही बात कह रहे हैं अभी। जिसको सम्यक्त्व पैदा होने वाला है ऐसे मिथ्यादृष्टि की निर्मलता बतायी जा रही है। यों बंधापसरण भी करते हैं और स्थिति का बंध भी कम करते जाते हैं। तो इसके बाद फिर करणलब्धि पैदा होती है।

सम्यक्त्वकी नियामिका करणलब्धि―प्रायोग्यलब्धि नाम है उसका जिससे बंधापसरण होता है और स्थिति कम होती है इन चार लब्धियों तक तो अभव्य भी चल सकता है जिसको कभी सम्यग्दर्शन नही होना है, ऐसा अभव्य जीव भी चार लब्धियोंका लाभ ले सकता है, किंतु करणलब्धि उनके ही होती है, जिनको नियम से अभी ही सम्यग्दर्शन होना है, उन करणों का नाम है अधःकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण। इन करणों का 8वें, 9वें गुणस्थान से संबंध नही है। जो अभी कहे जा रहे हैं,ये तो मिथ्यादृष्टिके हो रहे हैं अधःकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण। सम्यक्त्व उसके प्रताप से उत्पन्न होता है। तो इस विधि से आप जान गये होंगे कि सम्यग्दर्शनके लिए गुरु का उपदेश आवश्यक है, लेकिन यहाँ परमार्थ स्वरूप कहा जा रहा है कि गुरु का उपदेश भी मिले और न माने जरा भी तो क्या लाभ होगा? जैसे कहावत है कि पंचों की आज्ञा सिर माथे पर पनाला यहीं से निकलेगा, ऐसे ही शास्त्रों की बात सिर माथे, गुरु की बात सिर माथे, पर धन वैभव घर, कुटुंब इनमें मोह वही का वही रहेगा। इनमें अंतर न आए तो उसका फल खुद को ही तो मिलेगा।

स्वयंका हित स्वयंके ही द्वारा संभव―भैया ! सत्य आनंद चाहो तो मोह में ढिलाव खुदको ही तो करना पड़ेगा। ऐसा कोई गुरु न मिलेगा जिससे कह दें गुरुजी कि आप ऐसा तप कर लो जिससे मुझे सम्यग्दर्शन हो जाय। जैसे पंडों से कह देते हैं ग्रहशांति के लिए कि तुम एक लाख जाप हमारे नाम पर कर दो तो हमारा उपसर्ग टल जायगा। उसका उपसर्ग टले या न टले, पर उस पंडा का उपसर्ग तो तुरंत टल जायगा। जो सामग्री लिखी―इतना सोना, इतना चाँदी, पंचरत्न, अनेक नाम ऐसे रख लिए कि पंडा का उपसर्ग तो टल जाता है। भला, दूसरे के विग्रह को कौन टालेगा? ऐसा वस्तु का स्वरूप ही नही है। कोई गुरु को नाम का ध्यान करे, तप करे, उपदेश सुने, सत्संगमें रहे किंतु खुद के ही परिणामों में योग्य परिवर्तन न करे तो काम न चलेगा। तब स्वयं का गुरु स्वयं ही हुआ। जो आत्महितकारी उपदेश देता है अथवा अज्ञान भावको दूर करता है वही वास्तवमें मेरा गुरु है, यह तो व्यवहार की बात है, ऐसे आचार्य उपाध्याय आदिक हो सकते हैं,लेकिन वे निमित्तरूप रहें इस कारण व्यवहार में गुरु हुए।

औपचारिक व्यवहार―क्या कोई गुरुजन शिष्य के आत्मा को, भक्तों के उपयोग को सम्यग्दर्शन रूप परिणमा सकते है? कभी नही। व्यवहारमें लोग कहा करते हैं कि तुम्हारे सुखसे हमें सुख है, तुम्हारे दुःख में हमें दुःख है, यह सब मोह में कहने की बात है, ऐसा कभी हो ही नही सकता कि किसी दूसरे के परिणमनसे किसी दूसरे को सुख दुःख मिले। यह तो एक मोह में बकवाद है। कितने ही लोग कहते हैं कि हमारा दिल तो तुम ही में धरा है, पर ऐसा हो ही नही सकता कि किसी का दिल किसी दूसरे के दिल में धर जाय। जिस वस्तु का जो परिणमन है वह उस वस्तु में ही सन्निहित रहेगा, अन्यत्र पहुंच नही सकता। जो ऐसी गप्पें मारते हैं उनकी पूरी परीक्षा करना हो तो उनके मनके खिलाफ दो एक काम कर बैठो, सब निर्णय सामने आयगा।

परमार्थ गुरु―आजकल कितना अच्छा हमें संयोग मिला है? गुरुजनों का हितकारी उपदेश भी मिलता है लेकिन स्वयं ही इस प्रकार की अभिलाषा करे, ध्यान जमायें, आचरण करे तो मोक्षमार्ग नही मिलता, वह केवल निमित्तरूप कारण है इसलिए वास्तविक गुरु तो आत्माका आत्मा ही है क्योंकि आत्मसुखकी प्राप्ति हो, मोक्ष मिले ऐसी रूचि भी इसको ही करना होता है। परमार्थ से मेरे हितरूप तो मोक्ष ही है ऐसा यथार्थज्ञान इसको ही करना होता है, ऐसा यत्न, ऐसी भावना और इस प्रकार की प्रवृत्ति इस ही को करना पड़ती है। तब गुरु स्वयं का स्वयं ही हुआ ना। कोई दोष बन जाय तो इसको ही अपनी निंदा, गर्हा, आलोचना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान, ध्यान ये सब इसको ही करने पड़ते हैं तब दोषों की शुद्धि होती है। कल्याण के लिए विषय सुखों से सुख मोड़ना प्रथम आवश्यक है। यह भी एक तप है जो सुगम मिले हुए विषयसाधनों में भी आसक्ति उत्पन्न नही होती। वह बात स्वयं को ही करना पड़ता है।

स्वयं के कार्यमें स्वयं का कर्तृत्व―भैया ! जैसे और कामों में लोग कहते हैं चलो रहने दो, यह काम हमी करें आते हैं। शायद कोई ऐसा भी कह देता हो कि चलो तुम यहाँ ही बैठो हम ही दर्शन किए आते हैं,तुम्हारा जगह पर मंदिर का दर्शन हम कर आयेंगे और कहआयेंगे कि हमारे बब्बू का भी दर्शन ले लो। ऐसा तो शायद कोई भी न कहता होगा, और ऐसा कह भी दिया यदि किसीने तो क्या दर्शन हो गया? ध्यान और ज्ञान के अंतः प्रयोग की बात तो सबसे अनोखी बात है। खुद को ही ज्ञान ध्यान तप में रत होना पड़ता है और स्वयं ही स्वयं में प्रसन्न रहे तब मोक्षमार्ग मिलता है, इसलिए आत्मा का गुरु यह आत्मा ही हुआ, आत्मा चाहे तो अपने को संसारी बनाए और चाहे तो मोक्ष सुख में ले जाए, दूसरा मेरी परिणति का अथवा स्वभाव का कर्ता धर्ता नही है। स्वयं ही शुभ भाव करता है तो उत्तम गति पाता है और स्वयं ही कुभाव करता है तो खोटी गति पाता है, और शुभ और अशुभ भावों का परित्याग करके आत्मा के शुद्ध चैतन्यस्वरूपमें जब यह विचरने लगता है तो कर्म बंधनों को तोड़कर मुक्ति को भी यह अकेले प्राप्त करता है। यही जीव भ्रमी बनकर संसार में रूलता है।

कथन और आचरण―विषयोंसे मुझे सुख मिलता है ऐसी भीतर में वासना बसी है, मुख से कुछ भी कहे, धर्म के नाम पर ज्ञान और वैराग्य की बात भी कहें किंतु प्रतीति में वही विषय विषरस भरा है सो ऐसी हालत हो जाती है जैसे सुवा पाठ रटता रहता है, उड़ मत जाना, नलनी पर मत बैठ जाना, बैठ जाना, तो दाने चुगनेकी कोशिश न करना, दाने चुगना तो उसमें औंध न जाना औंध भी जाना तो नलनीको छोड़कर उड़ जाना। पाठ याद है लेकिन अंतरंग में प्रेरणा जगती है विषयवासना की, तृष्णाकी। मौका पाकर वह तोता पिंजड़े से उड़ गया, नलनी पर बैठ गया, दाने चुगने लगा, उलट गया और कही मैं गिर न जाऊं इस ख्याल से वह नलनीको ही पकड़े रहता है। ऐसे ही जिसके अंतर में भ्रमवासना बसी है वह पूजा भी करता जाय, पाठ भी पढ़ता जाय, साथ ही विषय कषायों में बुद्धि भी बनी है, ऐसा भ्रमी पुरुष शांति संतोष कहाँ से पायगा? विवेक जाग्रत हो तो जैसे वह तोता नलनी को छोड़कर उड़ जायगा।

स्वयंकी उलझन और सुलझन―भैया ! विवेक जागृत हो तो भीतर में ही तो एक सही ज्ञान बनाना है। कुछ घरके लोगों से यह नही कहना है कि तुम नरक में डुबाने वाले हो, ऐसी गालियां नही देना है किंतु अंतरंग में ऐ समझ भर बना लेना है कि मेरा मात्र मैं ही हूं जैसा भी मैं अपने को रच डालूँ। इस अज्ञानी प्राणी ने अपने ही अज्ञान से अपने ही अन्याय से इन संसार के बंधनों को बढ़ाया है। अब बंधनों को कौन तोड़ेगा। यह आत्मा स्वयं ही तोड़ेगा। अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत आनंद, अनंत शक्ति रूप यह स्वयं ही परिणमेगा। अरहंत अवस्था तो इसकेस्वयं के ही स्वसम्वेदनसे प्रकट होगी और समस्त कर्मों से मुक्त होकर शाश्वत सुख और पूर्ण निरंजनताको यही अकेला प्राप्त करेगा।

स्वयंका कर्तव्य―इससे यह शिक्षा लेनी है कि हमारे करने से हमारा कल्याण है दूसरे के प्रयत्न से हमारा कल्याण नही है। घरके आंगनामें कोई आसपास की भीत गिर जाय और आंगन में इकट्ठी हो जाय तब तो यह बुद्धि चलती है कि यह आंगन हमें ही साफ करना पडे़गा, कोई दूसरा साफ करने न आ जायगा। ऐसे ही यहाँ समझो कि भ्रम से खुद में दोष भर गए है तो उन दोषों का निराकरण खुद के ही पुरुषार्थसे होगा, दूसरा कोई मेरी गंदगी निकालने न आ जायगा।

ज्ञानवैभव―यथार्थ ज्ञान होना सबसे अलौकिक वैभव है। धन, कन, कंचन, राजसुख सब कुछ सुलभ है किंतु आत्मा के यथार्थ स्वरूप का यथार्थ बोध होना बहुत कठिन है। यह वैभव जिसने पाया है समझिए उन्होने सब कुछ प्राप्त कर लिया, एक इस ज्ञाननिधि के बिना यह जीव वैभव के निकट बसकर भी हीन है, गरीब है, अशांत है। इसलिए सब प्रकार से प्रयत्न करके एक इस आत्मज्ञानको उत्पन्न करे, यही शरण है।


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