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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:इष्टोपदेश - श्लोक 38

From जैनकोष



यथा यथा न रोचंते विषयाः सुलभा अपि।

तथा तथा समायाति संवित्तौ तत्त्वमुत्तमम्।।38।।

विषयों की अरुचिकरमें ज्ञानप्रकाशकी वृद्धि―ज्यों-ज्यों सुलभ भी विषय रुचिकर नही होते हैं त्यों-त्यों यह आत्मा का शुद्ध तत्त्व ज्ञान में विकसित होता रहता है । जब तक इंद्रिय के भोगोंमें रुचिकर रहती है तब तक इस जीव के ज्ञान नही समा सकता है, क्योंकि ये भोग विषय ज्ञान के विपरीत है। जैसे कोई उल्टी दिशा में चले तो इष्ट स्थान में वह नही पहुंच सकता है। मान लो जाना तो है इटावा और रास्ता चला जाय करहलकी ओर तो इटावा कैसे मिल सकता है? ऐसे ही विषयभोगों की गैलमें तो चलें और चाहे कि मुझे प्रभुदर्शन, आत्मानुभव, उत्तमतत्त्वका प्रकाश हो जाय तो कैसे हो सकता है? जब तक भोगों की रुचि न हटे तब तक ज्ञानप्रकाश न होगा। सभी भोग झूठे है, असार है। भोगों से आत्मा को संतोष होता हो तो बताओ। स्पर्शन इंद्रियका विषय काम बाधा विषयक प्रसंग, इनसे आत्मा को क्या लाभ मिलता है?

भोगों से अतृप्ति―कोई गृहस्थ जिसके ज्ञानप्रकाश नही हुआ है, वैराग्य नही हुआ है, क्या वह यह हठ कर सकता है कि मैं आज विषय भोगूँ इसके बाद फिर मैं कल्पना भी न रक्खूँगा। ज्यों-ज्यों यह भोगता है त्यों-त्यों इसकी कल्पना बढ़ती है। क्या कोई ऐसा सोच सकता है कि आज मैं बहुत मीठी चीज खालूँ फिर कलसे मैं इस चीज की तरफ ध्यान ही न दूँगा, ऐसा कोई कर सकता है क्या? कोई भोगों को भोगकर चाहे कि मैं तृप्त होऊँ तो यह नही हो सकता है। भोगों के त्यागसे ही तृप्ति हो सकती है, भोगों के भोगनेसे कभी तृप्ति नही हो सकती है। जैसे अग्नि में जितना ईधन डालते जावो उतनी ही अग्नि बढ़ती जायगी, उनसे कभी ईधन से तृप्त न होगी, इसी तरह जितना विषय भोग भोगो उतना ही भोगों से अतृप्ति बढ़ती जायगी, उनसे कभी संतोष न होगा। जैसे समुद्र में जितनी नदियाँ मिलती जायेगी उतना ही समुद्र का रूप बढता जायगा। समुद्र कभी यह न कहेगा कि मैं संतुष्ट हो गया हूं, मुझे अब नदियाँ न चाहिएँ, अथवा ऐसे ही चाहे ईधन से अग्नि तृप्त हो जाय, सूर्य पूरब के बजाय पश्चिम में ऊगे, कमल चाहे पत्थर पर पैदा हो जाये, पर भोग भोगने से कभी तृप्ति नही हो सकती। जिसे भी संतोष मिलेगा त्याग से ही मिलेगा।

कल्याणमें तत्त्वज्ञानका विशिष्ट सहयोग―ज्यों-ज्यों सुलभ भी विषय रुचिकर नही होते हैं त्यों-त्यों ज्ञानप्रकाश बढ़ता है। जो परिश्रम करके विषय साधन जुटाए जाएँ उसकी भी बात नही कर रहे, सुलभ अपने आप सामने हाजिर हो जाएँ भोग के साधन और फिर भी उनमें रुचिकर न जगे तो वहाँ ज्ञानप्रकाश बना है। जिसने अपने आत्मा के ज्ञानानंद स्वरूप का सम्वेदन किया है, जो अपने ज्ञानामृत रसका रुचिया है वह बाह्य पदार्थों में उदासीन रहता है। इन समस्त समागम को भिन्न और विनाशीक जानता है। यह भी बड़ी साधना है। तुमसे गृहस्थी छोड़ते न बने, न छोड़ो, पर इतना ज्ञान तो बनाए रहा कि ये सब भिन्न है, नियम से नष्ट होंगे, इनका वियोग जरूर होगा, ऐसी बात हो तो मान लो और न हो तो मत मानो। यह निर्णय कर लो कि जितने भी जिसे समागम मिले हैं वे समागम उसके संग में जायेंगे क्या? कुछ भी तो न जायगा।

स्वपरभेदविज्ञानका बल―हम आपका कुछ भी यहाँ नही है, शरीर तक तो अपना है नही, फिर धन दौलत और घर मकान की तो कौन कहे? शरीर में यद्यपि यह जीव रह रहा है तो भी शरीर के स्वक्षेत्रमें शरीर है, शरीरके परमाणुओं में शरीर है, वह आत्मा का स्वरूप नही बन जाता है और जीव के स्वरूप में जीव है वह शरीर नही बन जाता। तो जब शरीरमें भी यह आत्मा नही है अर्थात् शरीररूप नही बन पाता यह तो अन्यरूप तो बनेगा ही क्या? ये सब पदार्थ समागम भिन्न है कि नही? यदि समझमें आ गया हो कि वास्तवमें मेरे आत्मा को छोड़कर ज्ञानानंदस्वरूपको तजकर जो कुछ भी यहाँ दिख रहा है और मिल रहा है ये भिन्न है, ऐसा ज्ञान हो गया हो तो आप फिर धर्म कर भी सकते हैं और यदि ज्ञान ऐसा नही बना है तो पहिले यही ज्ञान बनावो, निर्णय कर लो, थोड़ासा भी विचार करने पर एकदम स्पष्ट हो जाता है कि ये अत्यंत भिन्न है। तो बस मान लो ऐसा कि सारे समागम मुझसे अत्यंत भिन्न है, मेरा उनमें कुछ नही है। क्या ये समागम तुम्हारे साथ अनंतकाल तक रहेंगे या 100,50 वर्ष तक भी रहेंगे, ऐसी कुछ भी उम्मीद है क्या? कुछ भी तो उम्मीद नही है । तो ये सब समागम बिछुड़ेगे कि नही? मनसे उत्तर दो। अगर बिछुड़ेंगे यह बात हृदय में जम गयी है तो इतना मन लो।

समागमकी भिन्नता व विनश्वरताके परिज्ञानका प्रताप―कोई पुरुष यदि इन दो बातों को हृदय से मान लेता है कि जो भी समागम है―मकान, परिवार, संपदा ये सब भिन्न है और ये कभी न कभी बिछुड़ेंगे, इतनी बात यदि हृदय में घर कर गयी हो तो वह धर्मात्मा पुरुष है और मानता हो कि ये तो मेरे ही है, न्यारे कहाँ है, अथवा ये तो मेरे ही साथ रहेंगे कैसे बिछुड़ सकते हैं,ऐसी मिथ्या प्रतीति हो तो अभी धर्म करने की योग्यता ही नही है। यह सब पहिली बात है। जिसे धर्म करना हो उसको पहिले ये दो निर्णय बनाने चाहिएँ। कोई पुरुष ज्यादा शास्त्र नही जानता है, भाषाएँ नही सीखा है, अथवा उपदेश किए गए विषयों को नही समझ पाता है, न समझ पाये, लेकिन उसे यदि इन दो बातों का पक्का श्रद्धान है कि मेरा तो यह शरीर भी नही है। मेरा तो मात्र में एक ज्ञानप्रकाश मात्र आत्मा हूं और ये सब भिन्न चीजें है, दूसरी जगह पड़ी है, मेरेमे मिली हुई तक भी नही है और ये सब विनाशीक है, इतना भी भान हो तो भी शांतिका मार्ग मिल जायगा।

संकटमोचक सहज अनुभव―एक बार भी तो यह हिम्मत बना लो कि इन भिन्न पदार्थों के सजाने से, अपने हृदय इन सब पदार्थों को रखने से अब तक आकुलता ही पायी है। मैं अब इन किन्ही भी पदार्थ को मनमें नही रखना चाहता हूं। अपने उपयोग में किसी भी बाह्य पदार्थ को न ले तो सहज आराम बन जायगा। उस विश्राम में जो शुद्ध ज्ञानप्रकाशका अनुभव होगा यही अनुभव संसार के संकटों से दूर कर देगा। ऐसा होने के लिए ये दो बातें निर्णयमें होनी चाहिएँ (1) समस्त भोगों के साधन भिन्न है और (2) ये नियम से बिछुड़ेंगे, इतने ज्ञान पर भी वैराग्य होना संभव है और सुलभ विषय भी उसे रुचिकर न होंगे। यह बात केवल साधुवोंकी नही कही जा रही है, यह तो संज्ञी जीवों की बात कही जा रही है। जो भी संज्ञी जीव है मन सहित यावन्मात्र मनुष्य अथवा पशु पक्षी तक भी उनके यदि ये विषय रुचिकर नही हो रहे हैं,श्रद्धा में उनसे हित नही माना है तो उन सबके यह उत्तम तत्त्वज्ञान प्रकाश आनंदस्वरूप अनुभव में आ जायगा, और जब यह अपना परमात्मा अपने अनुभव में आ जाय तो सब कर्म और संकट नष्ट हो जायेंगे। इतनी बड़ी कल्याण की पदवी पाने की मनमें इच्छा हो तो व्रत, नियम, संयम कुछ न कुछ अवश्य ही करना चाहिए। उनमें सुलभ विषयों की भी इच्छा न रहेगी जो तत्त्वज्ञान करेंगे।

भोगों में अतृप्ति, तृष्णा व बलक्षयका ऐब―इन भोगों के भोगने में यह बड़ा ऐब है कि ये भोग आगमी कालमें तृष्णा को बढ़ाते हैं,संतोष नही पैदा करते। भोग भोगनेके बाद भोगने लायक नही रहते, इस कारण भोगों का त्याग करना पड़ता है, मगर तृष्णावान् जीव त्याग कहाँ करना चाहते है? जैसे भोजन किया जाता है, कोई आसक्त होकर भी भोजन करे तो उसे भोजन छोड़ देना पड़ेगा, भोजन करता ही जाय ऐसा नही हो सकता। उसने जो भोजन छोड़ा तो क्या ज्ञान और वैराग्य के कारण छोड़ा ? अरे अब पेट में समाता ही नही है इसलिए छोड़ना पड़ा। ऐसी ही समस्त विषयों की बात है। किसी भी विषयों को यह मोही जीव त्यागता है तो क्या ज्ञान और वैराग्य से त्यागता है? भोग भोगनेके बाद फिर भोग भोगने लायक नही रहता, यह इस कारण इसे त्यागना पड़ता है खूब इत्र फुलेल आदि सुगंधित चीजें सूँघते रहने के बाद वह कुछ समय को छोड़ देता है क्योंकि कहाँ तक सूँघता रहे। भोग भोगनेमें श्रम तो होता ही है। बिना राग, बिना प्रवृत्ति और बिना परिश्रम के कोई सा भी भोग नही भोगा जाता, उसको तो त्यागना ही पड़ता है।

विषयों ऊब―किसी सुंदर रूप को निहारते रहो, सनीमा, थियेटर अथवा कोई सुरूप स्त्री, सुरूप पुरुष, किसी को भी निहारते रहो तो कहाँ तक निहारते रहोगे, आखिर पलक बंद ही करना पड़ेगा और अपना अलग रास्ता नापना ही पड़ेगा। तो उस मोही जीवने जो देखने का विषय छोड़ा है वह क्या ज्ञान और वैराग्य के कारण छोड़ा है? अरे छोड़ना पडा है? छोड़ना नही चाहते हैं । ऐसे ही मानो रात के 10 बजे से खूब संगीत गायन सुना, नाच देखा धीरे-धीरे चार बज गए। आखिर उसको छोड़कर तो जाना ही पड़ता है। ऐसा तो है नही कि कोई 5-7 दिन तक लगातार नाच गायन में बैठा रहे। नाच गायन खूब देखने सुनने के बाद अब उसमें शक्ति नही रही कि ऐसे ही देखता सुनता जाय, इस कारण उसे छोड़ना पड़ता है तो ये भोग अतृप्ति ही पैदा करते हैं। कोई मनसे इन भोगों को छोड़ नही पाता है और जहाँ विषयों में ऐसी आकांक्षा बन रही है वहाँ यह ज्ञानप्रकाश अपने अनुभव में नही आ सकता है।

अंतर्मिलनमें प्रभुमिलन―लोग भगवान के दर्शन करने को हैरान होते हैं। प्रथम तो इस मोही जीवको भगवान की बात हो नही सुहाती, भगवान है भी कोई या नही, उसके स्वरूप का भान नही होता, और कोई भाव करता है तो भगवान के नाते से नही करता, किंतु मेरे घरके बच्चे खुश रहे, मेरे धन खूब बढ़ता रहे इस स्वार्थ के नाते से भगवान की सुध लेता है क्योंकि सुन रक्खा है ना कि भगवान सबको सब कुछ देता है। भगवान की सुध लेना ही बडा कठिन है और कदाचित् किसी को सुध आए औरभगवान से मिलने की अंतरंगमें उमंग भी करे, लेकिन वह अपने स्वरूप से चिगकर बाहर में कही भगवान को ढूँढा करे तो क्या भगवान मिल जायगा? आँखे तानकर, आसमान में देखकर या किसी और दृष्टि देकर प्रभु से कोई मिलना चाहे तो नही मिल सकता है, प्रभु का दशर्न करना चाहे तो नही कर सकता है। हाँ अपने ही आत्मा में जो शाश्वत विराजमान स्वरूप है, चैतन्यभाव है उस चैतन्यस्वरूप पर दृष्टि दे तो उसके दर्शन में प्रभुता का दर्शन हो जायगा, किंतु इतनी कठिन बात उस पुरुष मे कैसे आ सकती है जो व्यसनों का लोभी है, पापों को छोड़ना नही चाहता मोह में पगा है, ऐसे पुरुष को प्रभु का दर्शन नही हो पाता है।

ज्ञानप्रकाशमें विषयों की अरुचिका विशिष्ट सहयोग―जैसे-जैसे सुलभ विषय भी, भोग साधन भी रुचिकर नही मालूम होते वैसे ही वैसे इस ज्ञान में यह उत्तम तत्त्व समाता जाता है। पहिले श्लोक में यह कहा था कि ज्यों-ज्यों ज्ञानस्वरूप ज्ञान में आता रहता है त्यों-त्यों सुलभ भी विषय रुचिकर नही होते। वहाँ यह शंका होना स्वाभाविक है कि इसका भी कुछ उपाय है कि ज्ञान में यह उत्तम अंतस्तत्त्व समाता जाय। उसके उत्तर में दूसरे श्लोक में यह कहा है कि ये सुलभ विषय भी जब जीवों को रुचिकर न लगे, इन विषयों में प्रीति न जगे तो वह योग्यता आ सकती है कि ज्ञान में यह उत्तम तत्त्व प्रकाश पाये। इंद्रियां के विषयों से वैराग्य होवे तो आत्मा का यह विशुद्ध स्वरूप अनुभवमें आने लगता है। भोगने के बाद तो कुछ विवेक बनता है कि अरे न भोगते भोग तो क्या था, बड़ा सुरक्षित रहता। जब ज्यादा पेट भर जाता है, कुछ अड़चन सी होने लगती है अथवा कोई उदर विकार हो जाता है तो वह सोचता है कि मैने बड़ी चूक की, अधिक चीज खा ली, अगर न खाते तो कुछ भी नुकसान न था। यह कष्ट तो न होता जिसके दर्द के मारे यह बेचैनी हो रही है। तो भोग भोगनेके बाद फिर सुध आती है। यह कुछ यद्यपि जघन्य ज्ञान की बात है, लेकिन भोगनेके बाद भी यदि यथार्थ रूप में सुध आ जाय तो वह भी भली बात है। मोही प्राणियों को तो केवल विषय भोग, इंद्रियविषयों के साधन जोड़ना, धन कमाना―ये ही सब रुचिकर लग रहे हैं। इन विषयों की प्रीति तो स्वात्माके अनुभवमें बाधक है। यह सभी विषयों की चाह और परिग्रहों की मूर्छा हो जाये तो आत्मा आनंदका स्वाद लेने लगता है।

व्यर्थके कोलाहलसे अलाभ―हे आत्मन् !व्यर्थ के कोलाहल से क्या लाभ पा लोगे? दूसरे जीवों से प्रीति बढ़ाना और दूसरों का भार अनुभव करना, दूसरों के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करना ये सब व्यर्थ के कोलाहल है, इनमें मिलता कुछ नही है, आखिर मरना सबको पड़ता है। मरने के बाद भी इस जीवको यहाँ के कामों से कुछ लाभ मिले तो बतावो। जो जीव चला गया यहाँ से तो लोग शरीर को तुरंत जलाने का यत्न करते हैं। भले ही कभी किसी बूढ़े के मर जाने पर बहुत बड़ा विमान सजाया जाय, शंख बजाया, पर अब उस आत्मा के लिए क्या है? उसने तो अपने जीवन में जैसा परिणाम बनाया उसके अनुकूल कोई गति पा ली। अब दान, शील, उपकार, संयम कुछ सदाचार पालन किया, बाकी क्या लाभ हो सकता है?

बहकावेका ज्ञानीपर अप्रभाव―किसी के मरने पर उसका श्राद्धकरने से उस मरे हुए जीवको शांति मिलेगी ऐसा बहका कर लोगों ने अपनी आजीविका बनायी है। साल भर बाद उसी दिन इतने लोगों को खिलावोगे, इतनी-इतनी चीजें गंगा यमुना के किनारे बैठे किसी नियत पुरुष को पूज्य मानकर दे दोगे तो इतनी चीजें उस मरे हुए पुरुष के पास पहुंचा देंगे―ऐसा भ्रम डाल देते हैं। यह सब आजीविका का साधन है दूसरों का। जो मर चुका है उसके पास कैसे क्या पहुंच जायगा। तुम जो करोगे सो तुम्हारे साथ रहेगा। उन पुरुषों ने जो किया सो उन कुछ विश्राम लेकर अपने आपमें देखो तो सही इन समस्त समागम से भिन्न कोई तेज स्वयं में है अथवा नही। सब प्रकट हो जायगा।

भोगत्यागकी प्राथमिकता―भैया। यदि शांतिकी चाह है तो आपको त्यागना पड़ेगा विषयोंको। भोगों के त्यागे बिना ज्ञान प्रकाश मिल जाय, ऐसा कभी नही हो सकता। इस कारण जो आत्मस्वरूपके अनुभव के अनुयायी है उन्हें चाहिए कि विषयों को, ठाठबाटोंको, समागमोंको भिन्न, असार, हेय जानकर उनकी ओर से उपेक्षा करे, और एकांत बैठकर अपने आपमें अपने को एकाग्र कर लें। इस विधि से यदि हमारा ज्ञानप्रकाश बढ़ेगा तो भोग अरुचिकर लगेंगे और यह ज्ञानका अनुभव ही रुचेगा। सब असार है, हेय है, एक अपना आत्मा ही सार है, उसको जानो यही धर्म है बतावो धर्म में कहां मजहब है? यह अमुक धर्म है, यह अमुक धर्म है ऐसा मजहबों का कहां भेद है? आत्मा जब एकस्वरूप है तो धर्म भी एक स्वरूप है। आत्मा का धर्म आत्मा में मिलेगा अन्यत्र न मिलेगा, सो अपने आत्मस्वरूपको सम्हालना यही एक धर्म है और इस धर्म के पालन से संसार के संकट नियमसे कटेंगे। एक सारभूत बात यहां कही है कि ऐसा ज्ञान बढ़ावो कि आपको भोग विषय भी रुचिकर न लगे।


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