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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:इष्टोपदेश - श्लोक 49

From जैनकोष



अविद्याभिदुरं ज्योतिः परं ज्ञानमयं महत्।

तत्प्रष्टव्यं तदेष्टव्यं तद्द्रष्टव्यं मुमुक्षुभिः।।49।।

आत्महितकर परमज्योति―आत्मा का परमहित करने वाला परमशरण तत्त्व क्या है? इस संबंध में बहुत पूर्व प्रसंग से वर्णन चल रहा है। आत्मा का हित आत्मतत्त्व के सहज ज्ञानज्योति के अवलंबन में ही है वही जिन आत्माओं को इष्ट हो जाता है। उसका कल्याण होता है, किंतु जो व्यामोही पुरुष केवल परिजन संपदा को ही इष्ट मान पाते हैं रात दिवस उन ही परिजनों की चिंता में समय खो दिया करते हैं उनका शरण इस लोक में कोई नही है। शरण तो किसी का कोई दूसरा हो ही नही सकता, हम ही हमारे शरण है। तब शरण होने की पद्धति से खुद में खुद का अनुभव किया जाय। यह ज्ञानज्योति यह शुद्ध ज्ञानस्वरूप जो निर्विकल्प स्थिति करके अनुभवों में आ सकने योग्य है यह ज्ञानज्योति समस्त चाह का भेदन कर देने वाली है। जैसे सूर्य प्रकाश गहन अंधकार को भी भेद देता है इस ही प्रकार ज्ञानज्योति भ्रम के गहन अंधकार को भेद देती है।

अज्ञानांधकार और उसका भेदन―भैया !कितना बड़ा अंधेरा है यहाँ कि है तो मेरा परमाणु मात्र भी कुछ नही और उपयोग ऐसा पर की और दौड़ गया है कि परिजन और संपदा को यह अपना सर्वस्व मानता है। यह विचित्र गहन अंधकार है। सर्व पदार्थ विमुक्त हो जायेगें, इस पर अज्ञानी घुटने टेक देते हैं। जीवनभर कितने ही काम कर जाय अर्थात् कितनी ही धन संपदा निकट आ जाय, पर एक नियम सब पर एक समान लागू है। वह क्या कि सब कुछ छूट जायगा। इस व्यामोही जीवन ने यहाँ घुटने टेक दिये। वहाँ तो अज्ञान की प्रेरणा से रात दिवस खोटे-खोटे कार्यों में ही जुट रहे हैं लेकिन यहाँ वश नही चलता, और इसी कारण अज्ञानी मोहियों के दिमाग भी कभी-कभी सुधार पर आ जाया करते हैं। यह ज्ञानप्रकाश अज्ञान अंधकार को नष्ट करने वाला है। यह ज्ञानस्वरूप खुद का भी प्रकाश करता है और दूसरों का भी प्रकाश करता है। खुद ज्ञानस्वरूप है इसलिए खुद ज्ञान का प्रकाश कर ही रहा है, किंतु इस ज्ञान में ये समस्त परपदार्थ भी आते हैं,उनका भी प्रकाश है। यह उत्कृष्ट ज्ञानरूप है।

भेदविज्ञान से स्वातंत्र्यपरिचय―वस्तु में पूर्ण स्वतंत्रता भरी हुई है, इसका जिस ज्ञानी को परिचय हो जाता है वह सम्यग्ज्ञान पर न्यौछावर हो जाता है। लोग कहा करते हैं कि मकान बनाया, दुकान बनाया, यह बात तो बिल्कुल विपरीत है। यह मनुष्य कहाँ ईंट पत्थर को बनाता है। ईंट पत्थर में अपना कुछ लगा दिया हो ऐसा तो कुछ नजर नही आता है। अब इससे और कुछ गहरे चलें तो यह कह देते हैं कि मकान दूकान तो नही बनाता है जीव किंतु अपने-अपने पैरों को चलाता है। यह भी बात विपरीत है। आत्मा के हाथ पैर ही नही है। वह तो एक ज्ञानप्रकाश है, आकाश की तरह अमूर्त और निर्लेप है, यह हाथ भी नही चलाता है, पैर और जिह्वा भी नही चलाता है। ये क्रियापरिणत हो जाते हैं निमित्तनैमित्तक संबंध से। इस बात का भी ख्याल रहा तो बतावेंगे। अब आगे और चलें तो यह ध्यान में आता कि आत्मा हाथ पैर भी नही चलाता है किंतु रागद्वेष की कल्पनाओं को तो करता है, यहाँ भी विवेक बनाये। आत्मा है ज्ञानस्वरूप । आत्मा में रागद्वेष विकार करने का स्वभावतः कर्तृत्व नही है। ये रागादिक हो जाते हैं,इन्हे आत्मा करता नही है।

दृष्टांतपूर्वक वस्तुस्वरूप का परिचय―वस्तु का स्वतंत्र परिणमन समझने के लिए एक दृष्टांत लो―दर्पण सामने है, उस दर्पण में सामने खड़े हुए दसों लड़कों के प्रतिबिंब आ गए है। यद्यपि वह प्रतिबिंब दर्पण में हैं लेकिन दर्पण तो अपने में अपनी स्वच्छता की वृत्ति बना रहा है। ऐसे ही इस आत्मा में रागद्वेषों के परिणमन आ गए है, इस आत्मा ने रागद्वेषों को पैदा नही किया है। यह आत्मा रागद्वेषों का भी कर्ता नही है। इस समय बात अध्यात्ममर्म की बात चल रही है और चलेगी, लेकिन ध्यान से सुनने पर सब सरल हो जायगा हाँ इन रागद्वेषों का भी करने वाला यह आत्मा नही है।

निज में निज का परिणमन―अब कुछ और आगे चलकर यह समझ रहा है जीव कि यह रागद्वेष का करने वाला तो है नही, किंतु यह चौकी को, पुस्तक को, जितनी भी वस्तुऐ सामने आयी है उन सबको जानता तो है। अपने आत्मा को तके जरा, यह कितने बड़ा है, कितनी जगह में फैला है, कैसा स्वरूप है? तब ध्यान में आयगा कि यह जो कुछ कर पाता है अपने प्रदेशों में कर पाता है, बाहर कुछ नही करता है। तब आत्मा में एक ज्ञानगुण है, इस ज्ञानगुण का जो भी काम हो रहा है वह आत्मा में ही हो रहा है, अतः इस आत्मा ने आत्मा को ही जाना, किंतु ऐसा अलौकिक चमत्कार है इस ज्ञानप्रकाश में कि ज्ञान जानता तो है अपने आपको ही किंतु झलक जाता है यह सारा पदार्थ समूह। जैसे हम कभी दर्पण को हाथ में लेकर देख तो रहे हैं,केवल दर्पण को, पर पीछे खड़े हुए लड़कों की सारी करामातों को बताते जाते हैं तो जैसे दर्पण को देखकर पीछे खड़े हुए सारे लड़कों की करामात बताते जाते हैं इसी तरह हम आप पदार्थो को जान नही रहें है किंतु इन पदार्थों के अनुरूप प्रतिबिंबित हम अपने ज्ञानस्वरूप को जान रहे हैं और इस अपने आप को जानते हुए में सारा बखान कर डालतें है।

पर से असंप्रक्त जीव का पर से कैसा नाता―भैया ! अब परख लिया अपने इस आत्मा को? इसका परपदार्थो के जानने तक का भी संबंध नही है, किंतु यह मोही प्राणी यह मेरा कुटुंबी है, संबंधी है इत्यादि मानता है। अहो! यह कितना बड़ा अज्ञान अंधकार है? इस महान् अंधकार को भेदने वाली यह ज्ञानज्योति है। यह ज्ञानज्योति उत्कृष्ट ज्ञानस्वरूप है। इसका जिसे दर्शन हो जाता है उसकी समस्त आकुलताएं दूर हो जाती है। इस कारण हे मुमुक्ष पुरुषो! संसार के संकटों से छूटने की इच्छा करने वाले ज्ञानीसंत जनो!एक इस परम अनुपम ज्ञानज्योति की ही बात पूछा करो, एक इस ज्ञानस्वरूप की ही बात चाहा करो और जब चाहे इस ज्ञानस्वरूप की ही बात देखा करो, इसके अतिरिक्त अन्य कुछ चीज न चाहने लायक है और न देखने लायक है। इस ज्ञानस्वरूप के दर्शन से अर्थात् अपने आपको मैं केवलज्ञानमात्र हूं―ऐसी प्रतीति बनाकर उत्पन्न हुए परमविश्राम के प्रसाद से अनुभव करने वाले पुरुष के अज्ञान का सर्वथा नाश हो जाता है और अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंत आनंद और अनंत शक्ति प्रकट हो जाती है, जिस ज्ञान के प्रसाद से समस्त लोक और अलोक को यह आत्मा जान लेता है।

स्वकीय अनंत तेज की स्मृति―हम आप सब मे अनंत महान तेज स्वरसतः बसा हुआ है, लेकिन अपने तेज को भूलकर पर्यायरूप मानकर कायर बना हुआ यह जंतु विषय के साधनों के आधीन बन रहा है। जैसे कोई सिंह का बच्चा भेड़ो के बीच पलने लगा तो भेड़ो बकरियों की तरह ही वह रहने लगा, इसको जो जैसा चाहे वैसे ही सींग मारे, गड़रिया कान पकड़कर खीचता है और वह सिंह का बच्चा उसी तरह दीन होकर रहता है जैसे भेड़ बकरियाँ रहती है। कभी किसी दूसरे सिंह की दहाड़ को सुनकर, उसकी स्थिति की देखकर कभी यह भान कर ले कि ओह मेरे ही समान तो यह हे जिसकी दहाड़ से ये सारे मनुष्य ऊटपटांग भाग खड़े हुए है। अपनी शूरता का ध्यान आए तो यह भी दहाड़ मारकर सारे बंधनो को तोड़ कर स्वतंत्र हो जायगा, ऐसे ही हम आप संसारी प्राणी उस तेजपुँज के प्रताप को भूले हुए है जिस विशुद्व ज्ञान में यह सामर्थ्य है कि सारे संकट दूर कर दे। इस भव की बातों में ज्यादा न उलझे, यहाँ कोई संकट नही है। संकट तो वह है जो खोटे परिणमन उत्पन्न होते हैं,मोह रागद्वेष की वासना जगती है यह है संकट। यह मोही प्राणी प्रतिक्षण आकुलित रहता है। ये ही हम आप जब इस मोह को दूर करे, विवेक का बल प्रकट करें और अपने तेजपुँज की संभाल करे, अतंरगं में दृढ़ प्रतीति कर लें तो समस्त संकट दूर हो जायेंगे।

आत्मोन्नति से महत्त्व का यत्न―भैया ! दूसरे नेतावों को, धनिकों को देखकर विषाद न करे। वे दुःखी प्राणी है। यदि उन्हें ज्ञानज्योति का दर्शन नही हुआ है, तुम उनसे भी बहुत बड़े बनना चाहते हो तो सांसारिक माया का मोह दूर करके अपने आप में शाश्वत विराजमान इस ज्ञानस्वरूप का अनुभव कर लो, तुम सबसे अधिक बड़े हो। जिन्हें कल्याण की वांछा है उनका कर्तव्य है कि वे ऐसी धुन बनाएँ कि जब पूछे तो इस आत्मस्वरूप की बात पूछें, जब चाहे तब आत्मस्वरूप की बात चाहे और देखें जानें तो आत्मस्वरूप की बात ही देखें जाने, ऐसी ज्ञानज्योति प्रकट हो जाय तो फिर आकुलता नही रह सकती है।

सम्यग्ज्ञान का चमत्कार―भैया ! लग रहा होगा ऐसा कि यह योगी संतो के करने की बात गृहस्थजनों को क्यों बताना चाहिए? इससे गृहस्थ कुछ फायदा लेंगे क्या ? अपने हृदय से ही बतावों। बिडंबना का बोझ कुछ हल्का हुआ है या नही? कुछ अंतरंग में प्रसन्नता जगी है या नही? अरे इतना आचरण नही कर सकता तो न सही, किंतु करने योग्य परमार्थतः क्या काम है, उसका ज्ञान करने में ही महान् आनंद उत्पन्न होने लगता है। सूर्य जब उदित होकर सामने आये तब आयगा, किंतु उससे पौन घंटा पहिले से ही अंधकार सब नष्ट हो जाता है। यह चारित्र आचरण आत्मरमण, स्थिरता जब आए, किंतु इसका ज्ञान, इसकी श्रद्धा तो पहिले से ही आकुलता को नष्ट करने लगती है। यह ज्ञानभावना समस्त दुःखों का नाश करने वाली है और आत्मा में बल उत्पन्न करने वाली हे। इस ज्योति के अनुभव से जो उत्कृष्ट आनंद होता है उससे कर्म भी क्षीण होने लगते हैं और आत्मा में भी एकाग्रता होने लगती है।

आत्मलाभ की प्रारंभिक तैयारी―आत्मा के सहज स्वरूप की बात तो जानने की और लक्ष्य की है। अब इसकी प्राप्ति के लिए हम अपने पद में कैसा व्यवहार करें कि हम इसके धारण के पात्र रह सके। प्रथम कर्तव्य यह है कि संपदा को भिन्न, असार, नष्ट होने वाली जानकर इस संपदा के खातिर अन्याय करना त्याग दे। कोई भी ऊँची बात मुझे पुरुषार्थ बिना मिलेगी कैसे? और कुछ उससे नुकसान भी नही है, तो हम अन्याय त्याग दे। क्योकि जगत में जीवन के आवश्यक पदार्थों का समागम पुण्योदय के अनुसार सहज सुगमतया मिलता रहता है। अन्याय से सिद्वि नही होती। अन्याय वह है जिसे अपने आपपर घटाकर समझ सकते हैं कि जो बात अपने को बुरी लगती है वह बात दूसरों को भी बुरी लगती है, उसका प्रयोग दूसरों पर करना अन्याय है। ऐसा जानकर उसका प्रयोग दूसरों पर न करे, यही है अन्याय त्याग। हमारे बारे में कोई झूठ बोले, हमारी चीज चुरा ले, हमारी माँ बहिन पर कोई कुदृष्टि डाले तो हम को बुरा लगता है, तो हम भी किसी का दिल न दुखावे, किसी की झूठ बात मब कहें, किसी की चीज न चुराये, किसी परस़्त्री पर कुदृष्टि न करें और तृष्णा का आदर न करें। बतावो क्या कष्ट है इसमें? इसमें न आजीविका का भंग होता है ओैर न आत्महित में बाधा आती है।

अन्याय व मिथ्यात्व के त्याग का अनुरोध―भैया ! अन्याय का त्याग और मिथ्या श्रद्धान का त्याग करो। पर से हित मानना, कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु में रमना, अपने आपको सर्व से विविक्त न समझ पाना―ये सब मिथ्या आशय है। ज्ञानप्रकाश करके इस मिथ्या आशय का भी त्याग करें और अभक्ष्य पदार्थ न खाये, ज्ञानार्जन में रत रहे, अपनी आजीविका बनाये रहें और इस शुद्धज्ञान के पालने में भी लगे। तुम्हें क्या कष्ट है इसमें? कौन सा नुकसान पड़ता है? व्यर्थ की गप्पों में और काल्पनिक मौजों की चर्चावों में समय खाने से कुछ भी हाथ न लगेगा।

एक ज्ञानस्वरूप की धुनि की आवश्यकता―इस ज्ञानार्जन से शांति व संतोष मिलेगा। इससे इस ज्ञानज्योति के अर्जन में, इसकी चर्चा में अपना समय लगाये। इससे ही अपना संबंध बनाएँ। जैसे कोई कामी पुरुष जिस किसी परस्त्री पर आसक्त हो गया हो या किसी पर कन्या पर जैसे कि पुराणों में भी कितने ही मोहियों की चर्चा सुनी है, तो वह पूछेगा तो वही बात, जानेगा देखेगा तो वही बात, अकेले में भी भजन बोलेगा तो वही। कैसी इस कामी पुरुष की तीव्र धुनी हो जाती है। ऐसे ही ज्ञानी पुरुष के ज्ञानस्वरूप के रुचि की तीव्रता की धुनि हो जाती है। वह पूछेगा, चाहेगा तो एक ज्ञानस्वरूप को। हम आपका भी यही कर्तव्य है कि इस ज्ञानस्वरूप का आदर करें और संसार संकटो से सदा के लिए छुटकारा पायें।


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