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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:इष्टोपदेश - श्लोक 51

From जैनकोष



इष्टोपदेशमिति सम्यगधीत्य विद्वान्, मानापमानसमतां स्वमताद्वितन्य।

मुक्ताग्रहो विनिवसन्स्वजनेऽजने व मुक्तिश्रियं निरुपमामुपयाति भव्यः।।51।।

इष्टोपदेश के अध्ययन का फल―यह इष्टोपदेश ग्रंथ का अंतिम छंद है। इस छंद मे इस ग्रंथ के अध्ययन का फल बताया है। ग्रंथ का नाम है इष्टोपदेश। जो आत्मा को इष्ट है अर्थात् आत्महित करने वाला है ऐसे तत्त्व का उपदेश, तत्त्व की दृष्टि और तत्त्व के ग्रहण का उपाय जिसमें बताया है इस ग्रंथ की समाप्ति पर यह अंतिम छंद कहा जा रहा है। किसी भी विषय को, ग्रंथ को, उपदेश को, जानने का साक्षात् फल अज्ञाननिवृत्ति है। ज्ञान के फल चार बताए गये है―अज्ञान निवृत्ति, हेय का त्याग करना, उपादेय का ग्रहण करना व उपेक्षा हो जाना। ज्ञान के फल चार होते हैं जिसमें अज्ञाननिवृत्ति तो सब में रहता है। चाहे हेय का त्याग रूप फल पाये, चाहे उपादेय का ग्रहणरूप फल पाये और चाहे उपेक्षा पाये, अज्ञाननिवृत्ति सब में फल मिलेगा। जिस तत्त्व का परिज्ञान कर रहे हैं,जब तक हमारा अज्ञान दूर न हो जाय तब तक हेय को छोड़ेगा कैसे कोई, अथवा विषयों को त्यागेगा कैसे या उदासीनता भी कैसे बनेगी? जगत के जीव अज्ञान अंधकार में पड़े है। अज्ञान अंधकार यही है कि वस्तु है और भांति व जानता है और भांति, यही अज्ञान अंधकार है।

कल्पित चतुराई―यों तो भैया ! अपनी कल्पना में अपनी बड़ी चतुराई जंच रही है। दस आदमियों में हम अच्छा बोलते हैं,हम अनेक कलाये जानते हे और अनेकों से बहुत-बहुत चतुराई के काम कर डालते हैं,इतनी बड़ी संपदा बना ली है, ऐसा मिल और फैक्टरी खोल ली है। हम तो चतुर है और बड़े ज्ञानवान है। सबको अपने आप में अपनी चतुराई नजर आती है, और यों अलंकार में कह लो कि मान लों दुनिया में कुल डेढ़ अक्ल हो तो प्रत्येक मनुष्य एक अक्ल तो अपने में सोचता है और आधी अक्ल दुनिया के सब लोगो में मानता है। अपनी चतुराई सभी मानतें है। भिखारी भी भीख मांग लेने में अपनी चतुराई समझते हैं। वाह मैने कैसी चतुराई खेली कि इसने मुझे इतना कुछ दे दिया। लेकिन यह सब अज्ञान अधंकार है।

निष्पक्ष वृत्ति में आत्महित―आत्मा का हित आत्मा का मर्म निष्पक्ष हो सके बिना नही मिल सकता है। केवल अपने आप में आत्मत्व का नाता रखकर सब कुछ जाने, करे, बोले, नाता केवल आत्मीयता का हो, किसी अन्य संबंधों का न हो। एक वस्तु का दूसरे वस्तु के साथ कोई तात्त्विक संबंध नही है, क्योंकि वस्तु का सत्त्व इस बात को सिद्ध करता है कि इस वस्तु का द्रव्य गुण पर्याय कुछ भी इस वस्तु से बाहर नही रहता है और ऐसे ही समस्त पदार्थ है। जब समस्त वस्तुवों में स्वतंत्रता है क्योकि अपने स्वरूप की स्वतंत्रता आये बिना उसकी सत्ता ही नही रह सकती है, तब किस पदार्थ का किससे संबंध है?

प्रकाश दृष्टांत पर वस्तुस्वातंत्र्य का दिग्दर्शन―वस्तुस्वातंत्र्य के संबंध में कुछ दो चार चर्चाये कोई छेड़ दे तो प्रथम तो कोई थोड़ी बहुत आलोचना करेगा, लेकिन कुछ सुनने के बाद, मनन के बाद समझ में आ जायगा कि ओह! वस्तु की इतनी पूर्ण स्वतंत्रता है। यहाँ जो प्रकाश दिख रहा है, इसी के बारे में पूछे कि बतावो यह प्रकाश किसका है, सब लोग प्रायः यह कहेगें कि यह प्रकाश लट्टू का है, बल्ब का है। कितना ? जितना इस कमरे में फैला है। लेकिन यह तो बतावों कि लट्टू किसको कहते हैं और वह कितना है? इसके स्वरूप का पहिले निर्णय करे। कहने में आयगा कि वह तो एक तीन-चार इंच घेर का है और उसमें भी जितने पतले-पतले तार है उतना मात्र है। तो यह नियम सर्वत्र लगेगा कि जो वस्तु जितने परिणाम की है उस वस्तु का द्रव्य गुण पर्याय, (पर्याय मीन्स मोडीफिकेशन) वह उतनेमे ही होगा, उससे बाहर नही। इस नियम से कही भी विघात नही होता है। यह प्रकाश जो इस माइकपर है यह लट्टू का प्रकाश नही है, यह माइक का प्रकाश है। चौकी पुस्तक कपड़े आदि पर जो प्रकाश है वह लट्टू का प्रकाश नही, वह कपड़ा चौकी आदि का प्रकाश है। इसमें कुछ युक्तियां देखो। लट्टू भी एक पौद्गलिक चीज है, भौतिक चीज है। जैसे उस भौतिक चीज में इतना तेज स्वरूप होने की योग्यता है तो इस पदार्थ में भी अपनी-अपनी योग्यता के माफिक तेज स्वरूप होने का स्वभाव है। दूसरी बात यह है कि लट्टू का ही प्रकाश हो तो यह सर्व चीजों पर एक समान होता, यह भेद क्यों पड़ गया कि कांच ज्यादा चमकीला बन गया, पालिशदार चीज उससे कम चमकीली है और यह फर्श अत्यंत कम चमकीला है। यह अंतर कहाँ से आया? ये पदार्थ स्वंय अपनी योग्यता के अनुसार प्रकाशमान हो गए है।

छाया दृष्टांत पर वस्तुस्वातंत्र्य का दिग्दर्शन―वस्तुस्वातंत्र्य के बारे में दूसरी बात देखो―इस हाथ की छाया चौकी पर पड़ रही है, सब लोग देख रहे होंगे। अच्छा बताइए कि यह किसका परिणमन है? लोग तो यही कहेंगे कि यह तो हाथ की छाया है। लेकिन हाथ कितना है, कहाँ है? जितना हाथ है, जितने में है, हाथ का सब कुछ प्रभाव परिणमन गुण सब कुछ हाथ में ही गर्भित हो गया, हाथ से बाहर नही हुआ, लेकिन आप यह शंका कर सकेगें कि हाथ न हो तो वह छाया कैसे हो जायगी? बस यही है निमित्त के सद्भाव को बताने का समाधान। यही निमित्त है, निमित्त की उपस्थिति बिना इस उपादेय में इस रूप कार्य न हो सके यह बात युक्त है, पर निमित्तभूत पदार्थ का द्रव्य, गुण, पर्याय, प्रभाव कुछ भी परवस्तु में उपादान में नही आता।

परके अकर्तृत्वपर एक जज का दृष्टांत―एक जज साहब थे, वे कोर्ट जा रहे थे, ठीक टाइम से जा रहे थे। रास्ते में एक गधा कीचड़ में फंसा हुआ दिखा। जज साहब से न रहा गया, सो मोटर से उतरकर उसे कीचड़ से निकालने लगे। साथ के सिपाही लोगों ने मना किया कि हम लोग निकाले देते हैं आप न निकालो, पर वे नही माने। उस गधे के निकालने में जज साहब कीचड़ से भर गए और उसी हालत में कोर्ट चले गए। वहाँ लोगों ने देखा कि आज जज साहब की बड़ी बुरी हालत है, कोट पैंट आदि में मिट्टी लगी हुई है। साथ के सिपाही लोगों ने उनसे बताया कि आज जज साहब ने एक गधे की कीचड़ में फंसा हुआ देखकर उसके ऊपर दया करके उसे कीचड़ से निकाला है। तो जज साहब बोले कि मैंने गधे पर दया नही की, गधे की वेदना को देखकर मेरे हृदय में एक वेदना उत्पन्न हुई, सो उस अपनी ही वेदना को मैंने मिटाया।

स्वातंत्र्यसिद्धि में दृष्टांतों का उपसंहार―ऐसे ही जज की घटना में निमित्तनैमित्तिक संबंध था कि वह गधा बच गया। इसी को कहते हैं निमित्तनैमित्तिक संबंध। ऐसे ही सभी पदार्थों में निमित्तनैमित्तिक संबंध छाया रूप परिणमी। यह छाया निश्चय से चौकी की है, व्यवहार से हाथ की है। यह समस्त प्रकाश निश्चय से इन वस्तुओं का है व्यवहार से लट्टू का है। हम बोल रहे हैं,आप सब सुन रहे हैं। लोगो को दिखता है कि महाराज हमको समझाया करते हैं,लेकिन मैं कुछ भी नही समझा पाता हूं, न मुझमें सामर्थ्य हैं कि मैं आपको समझा सकूँ, या आप मेंकोई परिणमन कर दूँ,। जैसे अपने भावो के अनुसार अपना हित जानकर अपनी चेष्टा करते हैं।सुनने आते हैं,उपयोग देते हैं और उन वचनों का निमित्त पाकर अपने ज्ञान में कुछ विलास और विकास पैदा करते हैं,ऐसे ही मै ही अपने ही मन मे, अपने ही विकल्प में विकल्प करता हुआ बैठ जाता हूं, बोलने लगता हूं, और अपनी चेष्टा करता हूं। मै जैसे आप में कुछ नही करता हूं, आप मुझमें कुछ नही करते किंतु यह प्रतिपादक और प्रतिपाद्यपने का संबंध तो लोग देख ही रहे हैं,यह निमित्तनैमित्तिक संबंध की बात है।

अंतःस्वरूप के परिचय से स्वातंत्र्य का परिज्ञान―भैया ! अंत:स्वरूप में प्रवेश पाने के बाद वस्तु की स्वंतत्रता विदित होती है। ऐसी स्वतंत्रता विदित होने पर मोह रह नही सकता। कैसे रहेगा मोह? मोह कहते हैं उसको कि किसी वस्तु को किसी दूसरे की वस्तु मानना। जहाँ स्वतंत्र वस्तु नजर आ रहे हैं वहाँ संबंध कैसे माना जा सकता है, मोह ठहर नही सकता है। किसी भी उपदेश के अध्ययन का फल साक्षात् अज्ञाननिवृति है। यह जीव पहिले अपनाए हुए परवस्तु का त्याग करता है यह भी ज्ञान का फल है। जो चीज ग्रहण के अयोग्य है उसे ग्रहण नही करना है,किंतु मात्र ज्ञाताद्रष्टा रहना है, उदासीन रहना है। उसके फल से उत्कृष्ट फल है उदासीनता का। यो इस ग्रंथ का भली प्रकार अध्ययन करे। भली प्रकार का अर्थ है अपेक्षा लगाकर।

स्याद्वाद के बिना मंतव्यों में विरोध―देखिये विडंबना की बात, जीव सब ज्ञानमय है और एक पुरुष दूसरे की बात का खंडन करता है। यह कैसी विडंबना हो गयी है? जब ज्ञानमय दूसरे जीव है, ज्ञानमय हम भी है तो हम दूसरे के तत्त्वनिर्णय का खंडन करे, यही तो एक विडंबना की बात है। यह विडंबना क्यों बनी? इसने नयका अवलंबन छोड़ दिया। दूसरे की बात सुनने का धैर्य रक्खो और उस कहने वाले के दिमाग जैसा अपना दिमाग बनावो और उसे सुनो, दूसरे की बात मानो अथवा न मानो, इसके दोनो ही उत्तर है, मानना भी और न मानना भी, लेकिन दूसरे की बात को हम गलत न कह सके। जिस दृष्टि मे मान लिया और अन्य दृष्टि से वह बात नही मानी जा सकती है। जैसे कोई पुरुष किसी पुरुष के बारे में परिचय बताने वाली एक बात कह दें कि यह अमुकका बाप है, हाँ अमुक का बाबा है, यह दृष्टि बनने पर तो विडंबनापूर्ण वचन नही हुए, यहाँ कोई दृष्टि छोड़ दे, यह साहब तो बाप कह रहे हैं,वही विवाद हो जायगा। वह पुरुष किसी का पुत्र है, किसी का कोई है। यदि हम अपेक्षा समझतें है तो वहाँ कोई विसम्वाद उत्पन्न न होगा। अपेक्षा त्यागकर तो विडंबना बनती ही है। ऐसे ही जीव और समस्त पदार्थों के स्वरूप के बारे में जिसने जो कुछ कहा है उनके दिमाग को टटोले, सबकी बात को आप सही मान जायेगे। लेकिन वे सब परस्पर विरुद्ध तो बोल रहे हैं,इन सबको सही कैसे मान लोगे? अरे भले ही परस्पर विरुद्ध बोले लेकिन जिस दृष्टि से जो कहता है उस दृष्टि से उसकी बात जान लेना है, इसमें कोई विडंबना की बात नही है।

सम्यग्ज्ञान होने पर कर्तव्य―नयों द्वारा वस्तुत्व को जान लेने पर फिर कर्तव्य यह होता है। कि जो ध्रुव तत्त्व से संबद्ध दृष्टि है उसे ग्रहण कर लें और अध्रुव तत्त्वरूप जो निर्णीत है उसे छोड़ दे और अंत में ध्रुव और अध्रुव दोंनो की कल्पना हटाकर एक परम उदासीन अवस्था प्राप्त करे। यह है आत्महित करने की पद्धति। इस इष्टोपदेश को भली प्रकार विचारकर आत्मज्ञान के बल से सम्मान और अपमान में समतापरिणाम धारण करना, न राग करना, न द्वेष करना और ग्राम वन जंगल किसी भी जगह ठहरते हुए समस्त आग्रहो को छोड़ देना, मूल सत्य के आग्रह के सिवाय अन्य समस्त आग्रहों का परित्याग कर दे, अंत में यह सत्य सत्यरूप रह जायगा। सत्य का भी आग्रह न रह जायगा। सत्य का भी जब तक आग्रह है तब तक विकल्प है, भेद है, और जब सत्य का भी आग्रह नही रहता किंतु स्वयं सत्यरूप विकसित हो जाता है वह है आत्मा की उन्नति की एक चरम अवस्था। यह जीव फिर ऐसे ही अनंत ज्ञानानंद गुणों से संपन्न एक निरूपम अवस्था को प्राप्त कर लेता है।

इष्टोपदेश के सम्यक् अध्ययन का फल―इस ग्रंथ के अध्ययन के फल में बताया है कि अज्ञान निवृत्ति, हेय पदार्थों का त्याग, उपादेय का ग्रहण, फिर परम उदासीन अवस्था―यह क्रमशः होकर अंत में इस निरुपण निर्वाण की अवस्था प्राप्त होती है। साक्षात् फल तो अज्ञान निवृत्त हो गया यह है, साथ ही चूँकि निश्चय और व्यवहारनय से पदार्थों को समझा भी है तो उस ही के फल में बाह्य का त्याग करना, ध्रुव निज ब्रह्मस्वरूप में मग्न होकर समस्त रागद्वेष मान अपमान संकल्प विकल्प विकारों को त्याग देना है। अब इसके इस योग साधन के संबंध में शत्रु, मित्र, महल, मकान कांच, निंदा, स्तवन―ये सब समान रूप से अनुभव में आते हैं। जो पुरुष आत्मा के अनुष्ठान में जागरूक होता है, स्वाधीन, नय पद्धति से निर्णय करके उन सब नयपक्षों को छोड़कर केवल एक ज्ञानस्वरूप में जो अपना उपयोग करता है, वीतराग शुद्ध ज्ञान प्रकाश में मग्न होता हुआ सर्व विकारों से दूर होकर विशुद्ध बन जाता है, फिर यह जीव अनंत ज्ञान जिसके द्वारा समस्त विश्व का ज्ञाता बनता है, अनंत दर्शन, जिसके द्वारा समस्त अनंत ज्ञेयों को जानने वाले इस निज आत्मतत्त्व को दृष्टि में परिपूर्ण ले लेता है। अनंत आनंद, जिसके बल में कोई भी आकुलता कभी भी न होगी और अनंत सामर्थ्य, जिसके कारण यह समस्त विकास एक समान निरंतर बना रहेगा, ऐसे अनंत चतुष्टयसंपन्न स्थिति को भव्य जीव प्राप्त होता है।

इष्टोपदेश से सारभूत शिक्षण―इस उपदेश को सुनकर हमें अपने जीवन में शिक्षा लेनी है कि हम अपने को समझें और आत्मधर्म के नाते हम अपने आप में कुछ अलौकिक सत्य कार्य कर जाये, जिससे हमारा यह दुर्लभ नर-जन्म पाना सफल हो। उसके अर्थ में रागद्वेष निवारक शास्त्रों का अध्ययन करें और सत्संग, गुरुसेवा, स्वाध्याय, ज्ञानाभ्यास इत्यादि उपायों से अपने आत्मतत्त्व को रागद्वेषों की कलुषतावों से रहित बनाये। यह चर्या हम आपकी उन्नति का प्रधान कारण बनेगी।

S


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