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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 195

From जैनकोष



पंच-महव्वय-जुत्ता धम्में सुक्के वि संठिदा णिच्चं ।

णिज्जिय-सयल-पमाया उक्किट्ठा अंतरा होंति ।।195।।

उत्कृष्ट अंतरात्मा का स्वरूप―अंतरात्मा 3 प्रकार के होते हैं―उत्कृष्ट अंतरात्मा, मध्यम अंतरात्मा और जघन्य अंतरात्मा । उत्कृष्ट अंतरात्मा वे कहलाते हैं जो अपने अंतःस्वरूप के ध्यान के दृढ़ अभ्यासी हैं । जो 5 महाव्रतों से संयुक्त हैं, धर्मध्यान और शुक्लध्यान में जो बने रहते हैं, जिन्होंने समस्त प्रमादों को जीत लिया है ऐसे पुरुष उत्कृष्ट अंतरात्मा कहलाते हैं । 5 पाप होते हैं―हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह, इन 5 पापों से विरक्त होना यह हैं पंच महाव्रत । ये पाँचों पाप स्वयं दुःखरूप हैं । जो पुरुष इन पापों का परित्याग करते हैं वे अपने आप पर ही करुणा करते हैं निश्चयत: । और व्यवहारत: पापत्याग करने पर दूसरे जीवों की भी मेरे संबंध से भलाई होती है । पंच पापों का त्यागी स्व और पर दोनों का उपकारी है ।

पापों की हेयता―एक कथानक आया है किसी कन्या का । बताते हैं कि कोई मुनिराज किसी वन में उपदेश कर रहे थे तो उस कन्या ने पाँचों प्रकार के पापों के त्याग का व्रत मुनिराज से ग्रहण कर लिया । जब वह कन्या घर आयी और उसने अपने पिता को सब हाल बताया तो पिता बड़ा क्रुद्ध हुआ, बोला कि बिना मेरी आज्ञा के तूने व्रत क्यों लिया और उन मुनिराज ने भी व्रत क्यों दिया? तो उस कन्या ने समझाया कि देखिये पिताजी हमने यह भला ही तो काम किया है, तो पिता बोला―नहीं बेटी तुम उस व्रत को छोड़ दो । तो वह कन्या बोली―पिताजी व्रत तो हम छोड़ देंगे पर उन मुनिराज के पास चलो, वहीं छोडूंगी । वे दोनों मुनिराज के पास चले । रास्ते में कई घटनायें घटी । एक जगह देखा कि कोई व्यक्ति शूली पर लटकाया जा रहा था तो कन्या ने पूछा पिताजी यह क्या हो रहा है? तो पिता ने मालूम करके बताया कि किसी व्यक्ति ने किसी की हत्या की है तो उसे फाँसी दी जा रही है । तो वह कन्या अपने पिता से कहती है―पिता जी मैंने यदि दूसरे जीवों की हत्या न करने का नियम ले लिया तो क्या बुरा किया?...अच्छा बेटी एक यह नियम रख ले―बाकी चार नियम तो छोड़ दे । कुछ और आगे बढ़े तो क्या देखा कि किसी व्यक्ति की जिह्वा छेदी जा रही थी, कन्या ने पूछा कि पिताजी यह क्या हो रहा है? तो बताया कि बेटी किसी ने झूठ बोला है, झूठी गवाही दी है इसलिए इसकी जिह्वा छेदी जा रही है, तो पिता जी यदि मैंने झूठ बोलने के पाप को त्याग दिया तो क्या बुरा किया? अच्छा बेटी इस नियम को भी रख ले, पर शेष तीन नियम तो छोड़ दे । कुछ और आगे बढ़े तो क्या देखा कि किसी पुरुष को सिपाही लोग हथकड़ियां लगाकर पकड़े हुए लिए जा रहे थे, उसे कोड़ों से पीट भी रहे थे । उस कन्या ने पूछा पिताजी! यहाँ क्या हो रहा है? तो बताया कि बेटी किसी पुरुष ने चोरी की है इसलिए वह पीटा जा रहा है । तो पिताजी यदि मैंने चोरी के पाप का त्याग कर दिया तो क्या बुरा किया? ठीक है बेटी ये तीन नियम तू रख ले, पर दो नियम तो छोड़ दे । कुछ और आगे बढ़े तो क्या देखा कि किसी व्यक्ति के हाथ काटे जा रहे थे । जब उस कन्या ने पूछा कि यह क्या हो रहा है तो बताया कि बेटी इस पुरुष ने कुशील सेवन किया है इसलिए इसके हाथ काटे जा रहे हैं?...तो मैंने कुशील के पाप का त्याग कर दिया तो क्या बुरा किया?...ठीक है बेटी तू इस नियम को भी रख ले, पर शेष एक नियम को तो छोड़ दे । कुछ और आगे बढ़े तो क्या देखा कि कोई व्यक्ति पीटा जा रहा था । वहाँ भी जब कन्या ने पूछा तो बताया कि किसी पुरुष ने लालच करके, दूसरे को धोखा देकर धन हड़प लिया है इसलिए वह पीटा जा रहा है?...तो यदि मैंने इस लालच का, परिग्रह का त्याग कर दिया तो क्या बुरा किया?...ठीक है बेटी तू ये सभी नियम रख ले, पर चल तो सही उस मुनि के पास, उसने बिना मेरी आज्ञा के तुझे क्यों व्रत दिया? जब वे मुनिराज के पास पहुंचे तो वह पुरुष मुनिराज से बोलता है कि आपने हमारी बेटी को बिना मेरे आदेश के व्रत क्यों दिया? तो मुनिराज बोले―यह बेटी मेरी है या तेरी?...वाह मेरी ही तो बेटी है, सभी लोग जानते हैं । आपकी कैसे? इस विवाद के समय वहाँ बड़ी भीड़ होई । तो मुनिराज ने उस कन्या के शिर पर हाथ करके कहा कि बेटी ! जो तुझे पूर्वभव में पढ़ाया था सो सुना, सो पिछले भव में जो संस्कृत व्याकरण आदि का अध्ययन किया था वह बोलने लगी । सभी लोग सुनकर दंग रह गए । तो लोगों ने बताया कि इसके असली पिता तो ये मुनिराज हैं, तुम तो केवल एक इस शरीर के पिता हो । जो आत्मा की रक्षा करे, जो आत्मा को शिक्षित बनाये, वह है परमार्थत: पिता ।

उत्कृष्ट अंतरात्मा की अप्रमत्तता―यहाँ पापों के त्याग की बात कह रहे थे । ये पाप परित्याग करने योग्य हैं और ऐसा जानकर सम्यग्दृष्टि पुरुष अपने ज्ञान की साधना के लिए कि जिसमें बीच में विकल्प न आयें, पाँचों पापों का परित्याग कर देते हैं तो जिसने पाँचों पापों का परित्याग किया और धर्मध्यान शुक्लध्यान में ही निरंतर चित्त लगाया, जहाँ आर्तध्यान, रौद्रध्यान आते ही नहीं हैं अगर आयेंगे तो वह उत्कृष्ट अंतरात्मा न रहेगा, वे उत्कृष्ट अंतरात्मा हैं । ऐसे आत्मा 7 वें गुणस्थान से लेकर 12 वें गुणस्थान तक माने जाते हैं । 7 वें गुणस्थान का नाम है अप्रमत्त विरत । इसके ऊपर के साधु सभी अप्रमत्त हैं । प्रमाद छठे गुणस्थान तक रहता है, और जहाँ प्रमाद है वहाँ आर्तध्यान की संभावना है । इन उत्कृष्ट आत्माओं ने समस्त प्रमादों पर विजय प्राप्त किया है । अतएव ये उत्कृष्ट अंतरात्मा होते हैं । प्रमाद के मूल में 15 भेद हैं । 4 प्रकार की विकथा, स्त्रियों की कथा करना, भोजन की कथा करना, देश की चर्चा करना, राजा राजवैभव आदिक की चर्चा करना ये चार प्रकार की विकथायें कषायवश की जाती है । कभी खोज से, कभी मान से, कभी माया से और कभी लोभ से । और ऐसा पुरुष जो इन विकथाओं में लग रहा वह पंच इंद्रियों के विषयों का रागी है और निद्रा या मोह में व्यस्त रहता है । अब इन 15 भेदों को प्रत्येक विभाग में एक-एक प्रकार का संयोग करने से याने इंद्रियविषय, कषाय, विकथा के एक-एक भेद व निद्रा मोह के परस्पर मिलाने से 80 प्रमाद भंग बन जाते हैं । तो जो 80 प्रकार के प्रमाद में रत नहीं हैं, इनसे निवृत्त हैं और चार प्रकार के धर्मध्यान अथवा शुक्लध्यान में जो निरत हैं वे उत्कृष्ट अंतरात्मा कहलाते हैं ।

उत्कृष्ट अंतरात्मा के ध्यानों का विवरण―भगवान की आज्ञा को मुख्य करके तत्त्वचिंतन में रहना आज्ञाविचय धर्मध्यान है । रागादिक भावों का कैसे विनाश हो, उसके विनाश का चिंतन करना सो अपायविचय

धर्मध्यान है । कर्मों के विपाक का चिंतन करना विपाकविचय धर्मध्यान है और तीन लोक, तीन काल की मुद्रा का चिंतन करना, कितना बड़ा लोक है, कितना बड़ा काल है, विशाल लोक व अनादि अनंत काल की विशालता पर जब उपयोग जाता है तो इसका राग से द्वेष से चित्त हट जाता है । रागद्वेष करने का क्या काम है? इस अनादि अनंतकाल के सामने यह थोड़ा सा 10 या 20 या 50 वर्ष का जीवन कुछ गिनती भी रखता है क्या? इसमें ही राग बसा लेने से जीव को कौनसा लाभ मिल जायेगा? इतने बड़े लोक में यह 10, 20 या 50 मील की जगह कौनसी कीमत रखती है? यहाँ क्या मोह करना, उसके मोह हटता है, राग द्वेष दूर होता है, तो जो चार प्रकार के ध्यानों में रत रहते हैं और पृथक्त्व वितर्कविचार, एकत्ववितर्क अविचार इन दो शुक्लध्यानों में किसी में रत रहते हैं, ये सब उत्कृष्ट अंतरात्मा कहलाते हैं । 7 वें गुणस्थान से लेकर 12 वें गुणस्थान तक के जीव उत्कृष्ट अंतरात्मा हैं । 5 वें और छठवें गुणस्थान के जीव मध्यम अंतरात्मा हैं और चतुर्थगुणस्थान के जीव जघन्य अंतरात्मा कहलाते हैं । उत्कृष्ट अंतरात्मा का वर्णन करके अब मध्यम अंतरात्मा की बात कहते हैं ।


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