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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 198

From जैनकोष



स-सरीरा अरहंता केवल-णाणेण मुणिय सयलत्था ।

णाण-सरीरा सिद्धा सव्बुत्तम सुक्ख-संपत्ता ।।198।।

परमात्मा का स्वरूप―अब परमात्मा का स्वरूप निरखिये । ये प्रभु दो प्रकार के होते हैं―अरहंत और सिद्ध । जो शरीरसहित परमात्मा हैं उनको अरहंत कहते हैं, जो शरीररहित परमात्मा हैं उनको सिद्ध कहते हैं । चाहे सिद्ध हों, अथवा अरहंत हों, केवलज्ञान के द्वारा समस्त विश्व का स्पष्ट ज्ञान सबके रहता है । और सर्वोत्तम जो आत्मीय आनंद है उस आनंद से संपन्न सभी रहते हैं । ज्ञान और आनंद का विकास पूर्णतया अरहंत में है और सिद्ध में है । अरहंत भी अघातिया कर्ममलों के दूर होने पर सिद्ध ही तो होने वाले हैं । तो यों परमात्मा का अर्थ है ज्ञान और आनंद का पूर्ण विकास ही तो परमात्मा है । यह जीव ज्ञानानंदभावस्वरूप है । ज्ञान और आनंद के भाव में अपने आपको निरखने से अपना दर्शन होता है और उसमें भी आनंद को नहीं किंतु ज्ञानस्वरूप को एक ही ज्ञान में लिया जाय तो आनंद स्वयं व्यक्त होता है और आत्मा का वहाँ अनुभव जगता है, तो प्रभु ज्ञानानंद के परिपूर्ण स्वामी हैं । सर्वज्ञदेव, परमात्मा, सकलपरमात्मा अभी शरीरसहित हैं लेकिन उनका शरीर परमौदारिक कहलाता है । धातु और उपधातु दोषों से रहित है । धातु कहलाते खून मांस मज्जा आदिक और उपधातु कहलाते हैं मल मूत्रादिक । इन धातु उपधातुओं से वे रहित हैं । 34 अतिशय एवं 8 प्रातिहार्यों से सहित हैं और अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतआनंद, अनंतशक्ति जिनके पूर्ण प्रकट हुई है ऐसे अरहंतदेव जिन्होंने मोहादिक सर्व दोषों का घात कर दिया है वे विशुद्ध आनंदमय हैं । हम आप प्रभु की भक्ति क्यों करते? वे कोई हम आपके रिश्तेदार नहीं हैं, वे कोई हमारे लौकिक कामों में साथ देने वाले नहीं है, वे तो अपने स्वरूप में लीन हैं । हम आप भक्ति यों करते हैं कि यह स्वरूपलीनता ही तो पूर्ण वैभव है और उस ही स्थिति में हमारी पूर्णता, हमारा उत्कृष्ट विकास है और सत्य आनंद इसी पद में है, यह बात हममें संभव हो सकती है । इस कारण हम प्रभु के अनुरक्त हुआ करते हैं और अपना तन, मन,, धन, वचन सब कुछ न्योछावर करके भी हम प्रभुभक्ति का अपना कार्यक्रम बनाया करते हैं । ये प्रभु 13वें गुणस्थानवर्ती जीव कहलाते हैं, संयोग केवली जिनके केवलज्ञान हो गया, जो शरीररहित है, और योग भी जिनके अभी विद्यमान है, जिससे उनका विहार, दिव्यध्वनि ये सब क्रियायें चलती हैं, कुछ केवली ऐसे भी होते हैं कि जिनकी दिव्यध्वनि न भी हों वे चाहे सामान्यकेवली अरहंत हों, चाहे सिद्ध भगवान हों पर ज्ञान और आनंद के विकास में कहीं भी अंतर नहीं रहता है, अन्य केवलज्ञानी जिन्होंने समस्त अर्थों को जान लिया है वे सशरीर परमात्मा अरहंत कहलाते हैं, और जब शरीर से भी वियोग हो गया, केवल धर्मादिक द्रव्यों की तरह पूर्ण विशुद्धि प्रकट हो गई है और ज्ञानानंद के परिपूर्ण विकास में तो थे ही, वे ज्ञानशरीरी सिद्ध भगवान कहलाते हैं । उनके शरीर में ज्ञान ही ज्ञान रह गया, बाह्य शरीर भी उनके साथ नहीं रहा । ऐसे सर्वोत्तम आनंद से सहित सिद्ध भगवान, वह आत्मा की विशुद्धि की उत्कृष्ट अवस्था है ।

अध्यात्मसाधना का प्रयोजन―अध्यात्मसाधना या आत्मध्यान किसलिए किया जाता है, उसका फल है कभी न कभी ऐसी कैवल्य अवस्था प्रकट हो जाय । इसके लिए ही हमारे समस्त धर्मपालन हुआ करते हैं । हम आपकी उत्कृष्ट अवस्था सिद्ध अवस्था है, जो आज प्रकट नहीं हैं, मगर योग्यता है कि हम सिद्ध हो सकेंगे । वे जीव बड़े भाग्यवान हैं जिनके चित्त में यह बात आ जाती है कि मुझे तो सिद्ध होना है और मेरा कोई प्रोग्राम नहीं है । घर में रहते हों अथवा गृह त्याग करके भी जो जीव अपने आपके इस संकल्प में बने हुए हैं, जिनकी एक ही धुन है उनका अंत: चारित्र उज्ज्वल रहता है। जितना भी जिनके चारित्र प्रकट हुआ, वे उतने साफ हैं, वे अंधेरे में नहीं हैं । उन्हें किसी गाँव से देश से कुछ प्रयोजन नहीं, शरीर तक से भी कुछ प्रयोजन नहीं, उनका प्रयोजन तो सिर्फ उनके इष्ट की सिद्धि है । तो अपने आपके स्वरूप का विशुद्ध हो जाना, केवल रह जाना, इस कैवल्य की प्राप्ति में इस जीव का सदा के लिए संकट मिट जाता है । संकट है जन्म मरण का । हम अपने जीवन में कितना राग द्वेष स्नेह बढ़ाते, हैं, लोगों को निरखकर अपने में कुछ अभिमान भी किया करते हैं । मैं क्या हूं? और नही तो इस पोजीशन का ख्याल तो सभी लोग करते हैं । मेरा पोजीशन कहीं खराब न हो जाय । चार आदमी यदि जान गए कि हमारा पोजीशन बिगड़ गया तो यह दुःखी होता है । अरे अगर दूसरे की अपेक्षा न करें, केवल आपको निरखकर ही सारे काम किया करें तो अनेक संकट तो उसके उसी समय मिट जाते हैं । अकेले की पोजीशन क्या बिगड़ती है? दूसरों की दृष्टि रखते हैं तो उसमें पोजीशन का बनना सुधरना समझा जाता है । अकेले को देखा तो उसमें ये विकल्प न रहेंगे । तो यह मैं केवल अकेला जैसा मैं हूँ सो ही होऊँ । मोह में आ करके दूसरों से संपर्क बनाकर मैं एक अपनी अंधेरी दुनिया में फिरता हुआ चक्र काटता रहा हूँ बस वह चक्कर मेरा मिट जाय और मैं केवल अपने आपमें ही रत रह सकूं, ऐसी मुझमें योग्यता बने, ऐसी अनुभूति रहे तो इसमें ही परम कल्याण है, और किसी भी जगह कल्याण नहीं है ।

कैवल्यसाधना में तत्त्वज्ञान का सहयोग―कैवल्य की साधना लिए चाहिए हमें तत्त्वज्ञान । पदार्थ का ज्ञान शुरू होता है उत्पादव्ययध्रौव्य स्वरूप समझने से । देखिये―यदि एक यह ही ज्ञान बन जाय कि प्रत्येक पदार्थ उत्पादव्ययध्रौव्य का स्वभाव रखता है, है ना कोई पदार्थ, जो है वह स्वभाव से उत्पन्न होता रहता है । विलीन होता रहता है और बना रहता है । सभी सत् पदार्थों की यही विशेषता है और इस स्वभाव के कारण यह बात प्रकट ज्ञान में आयगी कि प्रत्येक पदार्थ अपने आपके स्वरूप से बन रहे हैं, बिगड़ रहे हैं और बने हुए हैं । लो अब उस पदार्थ की किसी भी बात के लिए दूसरे की अपेक्षा क्या रही? यद्यपि विकारभाव परपदार्थ का निमित्त पाकर होते हैं, हों, निमित्त मिल गया, इतनी बात बन गई, मगर परिणमन में तो अपेक्षा नहीं रखते, क्योंकि परिणमन होना वस्तु का स्वभाव है । और प्रत्येक पदार्थ अपने स्वभाव से परिणमता रहता है, परिणमन में जो विशिष्टता आयी वह नैमित्तिक है, औपाधिक है, परभाव है, लेकिन कोई भी पदार्थ अपने परिणमन में अपेक्षा नहीं किया करता । दूसरे पदार्थ के सन्निधान में हो गया, निमित्त मिल गया, यह बन गई अपेक्षा, पर इस स्थिति में भी परिणमन उसकी परिणति से चल रहा है, परिणति के लिए कोई किसी अन्य की प्रतीक्षा नहीं करता । यहाँ हम आप समझाया करते हैं कि यह परिणयन सापेक्ष है । मतलब उसका यह है कि ये विभाव परिणमन पर उपाधिसन्निधान बिना नहीं हो सकते । यह नियम अकाट्य है, इसमें कोई दो बातें नहीं है, इतने पर भी परिणमने वाले पदार्थ अपनी ओर से स्वत: अपनी परिणति से परिणाम रहे हैं । हां सन्निधान ऐसा है कि वह इस तरह परिणम गया । प्रतीक्षा करने की बातें नहीं रही । जैसे कोई बालक चल रहा है, गिर रहा है, पड़ गया है, उठ गया है, सब कुछ कर रहा है पर उन सब स्थितियों में वह बालक ही अपने में कर रहा है । उसमें जैसी जब जमीन मिली ऊंची नीची जमीन मिली या कुछ भी कारण मिले उसके अनुसार वह गिर रहा, पड़ रहा, चल रहा, सब कुछ साधन बन रहे, तो निमित्त सन्निधान बीच-बीच में आ रहे, मगर यहाँ की धारा तो देखो वह अपने आपका अपने रूप से सब कुछ कर रहा है । तो जब वस्तु का उत्पादव्ययध्रौव्य समझ में आता है, प्रत्येक पदार्थ अपने स्वरूप से उत्पन्न होता है, विलीन होता है और वना रहता है, तब एक पदार्थ का दूसरा पदार्थ लगा क्या? देखिये वस्तु का स्वातंत्र्य इसलिए समझा जाता है कि मोह हटे । और क्या प्रयोजन है? देखिये―है वस्तु स्वातंत्र्य तभी स्वातंत्र्य समझा जाता है ।

क्लेश और आनंद का आधार मोहिता और निर्मोहता―मोह ही हम आपकी परेशानी का एक आधार है । मोह नहीं है तो कोई परेशानी नहीं है । मोह है तभी तो हम आप कितनी परेशानी में हैं? धनिकों के बड़े ऊँचे काम चल रहे हैं, देखने में तो बड़े आराम में रहते हुए दिखते हैं लेकिन भीतर में यदि मोह परिणाम है तो यहाँ सब बिगाड़ कर लिया । भीतर में जो आत्मा का विशुद्ध ज्ञान तत्त्व है वह तो बिगड़ गया । अब वहाँ शांति की कहाँ से आशा हो? और कोई पुरुष जंगल में रहता है, कपड़े भी नहीं हैं, खाने की भी कोई नीयत व्यवस्था नहीं है, जहाँ कोई साथी मनुष्य भी नजर नहीं आता, वह ज्ञानी पुरुष है तो उसे हम पूज्य शब्द से कहते हैं । ये साधु हैं, किंतु स्थिति तो बन रही है बड़ी दरिद्रता की, न कोई साथी है, न कोई व्यवस्था है, जंगल में पड़े हैं, कंटकों पर पड़े हैं, कंकरीली जमीन पर पड़े हैं, पास में कोई चीज नहीं है लेकिन चित्त में किसी भी परपदार्थ का स्नेह नहीं है, मोह नहीं है । वे केवल अपने आपमें सहज अंत: प्रकाशमान प्रभु की उपासना में लगे रहते हैं । ऐसी धुन वाले वे पुरुष बड़े सुखी हैं, बड़ा आनंद पा रहे हैं, बड़े तृप्त हैं, यह अंतर मोह होने और न होने का है । मोह न हो इसके लिए यह आवश्यक है कि हम प्रत्येक पदार्थ को स्वतंत्र जान लें । और, इसी धुन में यद्यपि विकार परिणाम निमित्त पाकर होते हैं, यह वहाँ अपेक्षा पड़ी हुई है लेकिन परिणमने वाला पदार्थ तो अकेला है, केवल है । उसका तो परिणमने का काम है । ऐसा अनुकूल निमित्त है उस रूप परिणम गया, जैसी व्यवस्था है उस रूप परिणम गया । उसे तो परिणमने का व्रत है । विशिष्टता जो विकारों की आती है वह उपाधि के सन्निधान से आती है । जब समझ लिया कि प्रत्येक पदार्थ स्वभाव से उत्पन्न होता है, विलीन होता है और शाश्वत रहा करता है, तब उसका किसी दूसरे से क्या लेनदेन, क्या संबंध? और, संबंध अगर मानते हैं तो यह सबसे बड़ा अंधेरा है, अज्ञान है ।

मोह में अवगत घटना की स्वप्नवत् असत्यता―स्वप्न में जो कुछ दिखता है क्या स्वप्न देखने वाला यह समझ रहा है कि यह झूठा है? झूठ नहीं मालूम होता, और इसी कारण अगर सुख की घटना का स्वप्न आता है तो हर्ष के मारे भीतर फूला रहता है और दु:खमयी घटना का स्वप्न आता है तो वह अंदर रोता रहता है, यह उसकी स्थिति बराबर बनी हुई है । तो स्वप्न के समय में जैसे कोई यह नहीं समझ सकता स्वप्न लेने वाला कि यह स्वप्न है, यह झूठ बात है, इसी प्रकार मोह की नींद में रहने वाले को यह प्रतीत नहीं होता कि यह तो झूठ है, व्यर्थ है । भले ही कभी झंझटों से ऊबकर ऐसा कोई कह डाले कि ये सब व्यर्थ की बातें हैं, किसका भाई, किसका लड़का, किसकी स्त्री, मगर यह द्वेषवश कहा जा रहा है । किसी अनुकूल बात को न पाकर गुस्से में कहा जा रहा है, वस्तुस्वरूप के ढंग से नहीं कहा जा रहा है । वस्तुस्वरूप की पद्धति से यदि यह समझ में आये कि मेरा कहीं कोई नहीं है, तो उसका कल्याण अवश्य होगा । लेकिन मोह की नींद में तो यह बात दिखती है कि यह सब सच है, मेरा ही तो लड़का है । मेरा ही तो भाई है, मेरा ही तो सब कुछ है । बस यही विपत्ति इस जीव पर है।

अंतःकल्याणवृत्ति का साहस―इतना साहस बना ले यदि कोई कि आखिर फैसला तो होगा, मरण के बाद मेरा कुछ न रहेगा, मैं अकेला ही यहाँ से चला जाऊँगा । अकेले ही सब कुछ भोगना होगा, तो जो बात 10-20 वर्ष बाद बीतने को हो उस जैसी बात यदि अभी से सोचने लगें तो यह थोड़े समय के लिए तो कुछ किसी प्रकार रहा, मगर वह इतना फायदा पायगा कि सदा के लिए जन्म संकट उसके मिट जायेंगे, ऐसा मार्ग पा लेगा । तो हम अपने अंत: कुछ ऐसा चिंतन बनायें कि मेरा कहीं कुछ नहीं है, देह भी मेरा नहीं है । मैं तो अकेला चैतन्यस्वरूप हूँ, ज्ञानमात्र हूँ । यही मेरा प्रयत्न हो । मैं हूँ और मेरा व्यापार पुरुषार्थ इतना ही हो रहा कि मैं स्वभाव से उत्पन्न होता रहता हूँ, विलीन होता रहता हूं और सदा बना रहता हूँ । इतना ही तो मेरा काम है, यही मेरा अस्तित्व है; यही मेरा घर है, जिन प्रदेशों में मैं रहता हूँ वही मेरा घर है, वही मेरी पूरा दुनिया है, ऐसे अपने आपके स्वरूप पर दृष्टि पहुंचे तो मोह छूटेगा । मोह छूटेगा तो कल्याण होगा । मोह छूटेगा नहीं, तो जो अब तक संकट भोगते आये बस वही संकट रहा करेंगे । मनुष्यभव व्यर्थ ही पा लिया । न पाते मनुष्यभव तो चलो एक सुविधा तो थी कि दो हजार सागर प्रमाण त्रस के भवों में मनुष्य भव पाने की गिनती तो न बढ़ती । मानो इस बीच 24 भव पाये जाते और आज मनुष्य न होते, जैसे कि अधर्म की स्थिति में रह रहे तो कम से कम यह रहता कि इतने 24 भव तक हो सकने का हमें अधिकार है और मनुष्यभव पाया और व्यर्थ गया तो एक अधिकार तो एक नरभव का छूट गया । लाभ क्या मिला? तो लाभ है ज्ञान बढ़ाया जाय, वैराग्य का विकास किया जाय । मोह न रहे और अपने आपका जैसा केवल ज्ञानस्वरूप है उस स्वरूप से हमारी दृष्टि रहे

तो इसमें हमारा कल्याण है और बाहरी बातों में, चर्चा में, विवाद में, संपर्क में, पोजीशन में, किसी भी बात में इस आत्मा का कल्याण नहीं है ।

कार्तिकेयानुप्रेक्षा प्रवचन चतुर्थ भाग

लोकानुप्रेक्षा के प्रकृत प्रकरण में आत्मपदार्थ की चर्चा―लोक में जितने पदार्थ है उनके वर्णन के प्रसंग में आत्मपदार्थ का वर्णन चल रहा है । आत्मा तीन प्रकार के होते हैं―बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा । और, चौथी बात तत्त्व की समझने की यह है कि इन तीन प्रकार की पर्यायों में रहने वाला जो एक सामान्य आत्मतत्त्व है अर्थात् जिस आत्मतत्त्व की ये तीन प्रकार की दशायें बनती हैं, वह आत्मतत्त्व स्वरूपत: शाश्वत एकस्वरूप है, इस प्रकार की चार बातें माने बिना किसी भी बुद्धिमान दार्शनिक का काम नहीं चल पाता । जिसको कुछ दार्शनिकों ने जागृत दशा, सुषुप्ति दशा, अंतःप्रज्ञ और ब्रह्म इन चार रूपों में कहा है । जागृत का अर्थ है जो जग रहा हो । व्यवहार में लौकिक कामों में दुनियावी बातों में जो जग रहा हो, वह उनका जागृत है अर्थात् बहिरात्म दशा । यद्यपि एकदम समझ में यह बात आती है कि जगने वाले की दशा अच्छी दशा कहना चाहिए, पर उनके मंतव्य में इस आत्मा का जगना, लगना, उपयोग करना ये सब निकृष्ट रूप है । तो जागृत दशा बहिरात्मा की दशा है । सुषुप्त दशा अंतरात्मा की दशा है । जैसे कोई पुरुष सो गया तो अब वह व्यवहार के कामों में नहीं लग रहा, इसी तरह जो व्यावहारिक बातों में न लग रहा हो वह सुषुप्त अर्थात् ज्ञानी है । अंतःप्रज्ञ वह है जिसका ज्ञानबल भीतर में बढ़ रहा हो । परमात्मदशा और ब्रह्म, जिसे चतुर्थपाद शब्द से भी कहा गया है वह एक ब्रह्मस्वरूप । तो इसी तरह आत्मा की ये चार स्थितियाँ बतायी गई हैं जिन में सामान्य स्थिति तो परिणति नहीं है किंतु वस्तु का शाश्वतस्वरूप है । परिणतियां तीन हैं―बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा । अपने स्वरूप से बाहर वाली बात में आत्मा को तक रहा हो, देह को आत्मा मान रहा हो वह बहिरात्मा है, मूढ़ है, मिथ्यादृष्टि है, मोही है । और जो अंत: की बात को अपने ही अंत: स्वरूप से सहज शाश्वत स्वरूप को जो स्वीकार करता हो उसे कहते हैं अंतरात्मा और जो परम आत्मा हुआ हो उसे कहते हैं परमात्मा ।

परमात्मत्वस्थिति―परमात्मा शब्द दो शब्दों के मेल से बना―परम व आत्मा । परम अर्थात् उत्कृष्ट आत्मा । परमात्मा शब्द ही इस बात को बता देता है कि यह आत्मा निकृष्ट दशा में था, उस निकृष्ट दशा से निकलकर जो उत्कृष्ट दशा में आया हो उसे परमात्मा कहते हैं । परमात्मा अरहंत और सिद्ध दो प्रकार के हैं―सशरीर और अशरीर । कोई भी सिद्ध जब अपने आत्मा में आत्मस्वरूप को निरखने का दृढ़तम अभ्यास बनाता है, अनुसंधान करता है तो उसके इस दृढ़तम प्रयोग से उपयोग की एकता हो जाती है । अब ज्ञान ज्ञान में समाया हुआ है ऐसी निर्विकल्प समाधि बनती है । यह समाधि जब उत्कृष्ट काल तक बन जाय तो वहाँ केवलज्ञान उत्पन्न होता है । केवलज्ञान होने पर साधु तो वही है ना, अभी शरीर है, भले ही केवलज्ञान होने से अतिशय हो जाता है शरीर में कि वह परमौदारिक शरीर हो गया अब धातु उपधातु की अपवित्रता नहीं रही । उनका शरीर स्फटिक मणि की तरह स्वच्छ हो जाता है । लेकिन वहाँ भी शरीर ही तो है । तो जब तक शरीरसहित अवस्था रहती है तब तक सशरीर परमात्मा कहलाते हैं । अब यह शरीर कब तक टिकेगा? कर्मबंध हो नहीं रहा । और कर्म, निर्जरा बराबर चल ही रही है तब कर्म का निकटकाल में ही अंत आवेगा ही । तो जिस क्षण शेष बचे हुए अघातियाँ कर्मों का अंत होगा उसके साथ ही शरीर समाप्त होगा । निष्कर्म दशा हो जाने से अब नये शरीर न मिलेंगे । सो अब वे अशरीर रह जाते हैं । अशरीर परमात्मा सिद्ध को कहते हैं ।

सांसारिक स्थितियों में उत्कृष्टता का अन्वेषण व आकांक्षण करने की व्यामोहमात्रता-―जीवों के मन में यह आकांक्षा रहती है कि मैं सबसे ऊँचा बनूं और जिसे परिस्थिति में जितना ऊँचा बन सकने की संभावना होती है उसको यह अपनी धुन में लेता है कि मैं ऐसा होऊँ, मेरी इतनी बाधायें समाप्त हो जायें, ऐसी बात लोगों के चित्त में रहती है । जितना जिसने अपने को संभावना में आया हुआ उत्कृष्ट समझा है वह उतना उत्कृष्ट बनना चाहता है, लेकिन सांसारिक स्थितियों में इन बाहरी लौकिक समागमों में कौनसी स्थिति कौनसा समागम ऐसा है जिसे हम उत्कृष्ट कह सकें? मान लो बहुत धनिक हो गए तो वह क्या उत्कृष्ट स्थिति है? उपयोग में अशांति है । अनेक प्रकार की बाधायें हैं, उतना ही काम बढ़ गया है, केवल ख्याल मात्र का इतना मौज है कि जब पटिलक में पहुंचे तो लोग उसका सम्मान करते हैं । मगर यह सम्मान झूठा मायारूप है, इस जीव को पतन में ले जाने वाला है । ऐसे मायामयी, असार-कल्पित मौज को मानने के लिए इस जीवन को कितना संकटों में डाल लेते हैं? तो विशेष धनिक बनने में क्या सार? परिवार वाले बन गए, बहुत नाती पोते हो गए, परिजन बहुत बढ़ गए, उसमें भी क्या सार मिला? आकुलता, वेदना अधिक बढ़ गई । लोग तो यों सोचते हैं कि यह पुरुष बहुत वृद्ध हो गया है, इसने चार पाँच पीढ़ी तक के लोगों को देख लिया है, यह बहुत ही भाग्यशाली है । और उस बूढ़े के मरने पर लोग सोने की सीढ़ी बनवाते हैं यह सोचकर कि इसको स्वर्ग में चढ़ने पर यह सीढ़ी काम देगी, पर उन्हें यह पता नहीं कि सीढ़ी तो उतरने के काम भी आती है । जिस बूढ़े ने अपने चार पाँच पीढ़ी के लोगों में इतनी ममता रखी उसका क्या होगा? वह तो नरक जाने का पात्र है । तो संभव है कि वह सोने की सीढ़ी उसे नरक में जाने में काम देगी । तो यहाँ के इन सांसारिक समागमों में क्या सार रखा है ।

संसर्ग की असारता―खूब ध्यान से सोचो―ये पड़ोस के लोग या ये जान हर लोग मुझे अच्छा कह दें, इनकी दृष्टि में मैं भला जचूं ये सब विकल्प क्या हैं? यह सब व्यामोह हैं, व्यर्थ की बातें हैं । ये लोग क्या कोई ईश्वर हैं या भाग्य के विधाता हैं? अरे ये सब तो कर्मों के प्रेरे जन्म-मरण का चक्कर लगाने वाले, स्वयं अपना बोझ न सम्हाल सकने वाले हैं । और फिर कितनी बड़ी यह दुनिया, 343 घनराजू प्रमाण इस लोक में यह परिचित क्षेत्र स्वयंभूरमण समुद्र के एक बूँद की तरह है । और, फिर कितनासा यह जीवनकाल है, उस अनंतकाल के सामने यह 100-50 वर्ष का जीवन कुछ गिनती भी रखता है क्या? तो इतने से समय के लिए क्या सोचना? यह सारा समागम यह परिचय असार है । यह सब परिचय समाप्त हो, जैसे कि मुझे किसी ने समझा ही न हो, परिचय ही कुछ न हो, हम जानते ही न हो । और वस्तुत: हम जानते नहीं, दर्शनशास्त्र की दृष्टि से, वस्तुस्वरूप की दृष्टि से हम सदा अपने आपको जान रहे हैं । जो मुझमें ज्ञेयाकार आते हैं, जितने विकल्प बनते हैं हम उनको ही जानते हैं, किसी दूसरे को जानते नहीं हैं । और, इस तरह मान लो उपचार से भी दूसरों का जानना सही, किंतु पर का जानना तो कहलाया । तो वहाँ भी हम लोग पर्यायरूप में जान रहे । जो इस वास्तविक रूप है शाश्वतस्वरूप सहजभाव, उसका पारखी है यहाँ कौन ? और, यदि कोई पारखी हो तो वह इस दुनिया के परिचय से अपरिचित हो जायगा । तो मेरा यहाँ कौन है? किसको क्या दिखाना है? मैं स्वयं की दृष्टि में यदि ठीक बन गया, अपना शुद्ध शाश्वत केवल जैसा मेरा सहज स्वरूप है चैतन्यमात्र एक उसे अगर अपने उपयोग में लिया तो उसका भला है, कल्याण है, उसका सन्मार्ग स्पष्ट है और इतनी बात यदि अपने लिए न कर पाया तब क्या है? सब नौकरी ही है दूसरों की । जिन-जिन जीवों के पुण्य का उदय है उनके पुण्य के उदय में नौकरी करनी पड़ रही है, इसके आगे और कोई सारभूत बात कुछ नहीं है ।

कैवल्यभावना, प्रभुभक्ति व प्रभुस्वरूप―जीवन में सबसे बड़ा भारी करने योग्य काम यही है कि अपना ऐसा भाव बने कि सब झंझट है, मुझे तो केवल बनना है । जो मैं हूँ वही रह जाऊं और मैं कुछ नहीं चाहता । यही प्रार्थना हो जिनेंद्र भक्ति में, यही भीतर में भावना हो तत्त्वचिंतन में कि हे प्रभो जैसे आप जो थे सो ही हो गए, केवल रह गए, यही बात मैं भी चाहता हूँ । मैं केवल रह जाऊँ, मेरा स्वरूप मेरे में है वही मात्र रहे, उसके आगे मैं और कोई संबंध नहीं चाहता, ऐसी भावना से जिसकी दृष्टि अंत: जगी है उसे कहते हैं अंतरात्मा और अंतरात्मा होने का बल है ऐसा कि इस उपाय से वह परमात्मा बनेगा । परमात्मा की स्थिति कैसी होती है? वह केवल है, शुद्ध है, उसका विकास अनर्गल है, निरवधि है, निरुपाधि है । ज्ञान है तो इतना महान है कि कोई ज्ञेय नहीं बचा ज्ञान में आने से, क्योंकि जो जिसका स्वभाव है उसका विरोधी अगर न रहे तो वह पूर्ण विकसित रहेगा । आनंद है प्रभु में तो ऐसा असीम है कि जिस आनंद में कोई सीमा नहीं है, अलौकिक आनंद है, पूर्ण निराकुलता है, उपयोग अब जरा भी विचलित नहीं है पूर्ण विशुद्ध है । केवल जानन-जानन का ही जहाँ काम हो रहा है । रागद्वेष इष्ट अनिष्ट का जहाँ रंच भी प्रसंग नहीं है । आखिर एक हो गया, वहाँ किसी से कुछ संबंध नहीं रहा, ऐसी उत्कृष्ट स्थिति है परमात्मा की ।

प्रभुमक्ति में भी कैवल्यचिंतन का प्रकाश―धन्य हैं वे पुरुष जिनमें भगवद्भक्ति और आत्मा के कैवल्यचिंतन की बात जगती रहती है । ये दो ही तो काम करने हैं । उसमें मुख्य काम तो कैवल्यचिंतन है । मैं अपने स्वरूप में केवल हूँ, अपनी सत्ता से जो हूँ सो ही हूँ, उसे में दूसरे का प्रवेश नहीं है । कोई भी सत् दो सतों से मिलकर नहीं बनता । प्रत्येक सत् स्वतंत्र है अर्थात् अपनी सत्ता से ही निष्पन्न है, किसी दूसरे की सत्ता लेकर सत् नहीं हुआ करता । यदि मैं सत् नहीं होऊँ तो बड़ी अच्छी बात । फिर संकट ही क्यों रहें? असत् पर अभाव पर संकट तो नहीं छाये जा सकते हैं । अगर मैं नहीं हूँ यह बात सही निकल आये तो यह तो बड़ी खुशी की बात होगी, पर है कहां ऐसा? और खुशी भी मनायेगा कौन? मैं नहीं हूँ, ऐसा जो ख्याल करते हैं, तो हैं वे तभी तो ख्याल करते हैं । मैं हूँ और मेरा सत्व कभी नष्ट नहीं हो सकता, मुझे अनंतकाल तक रहना ही पड़ेगा । प्रत्येक सत् अनंतकाल तक रहता ही है । तो मैं रहूँ, और ऐसी परिस्थिति में रहूँ, कभी कीड़ा मकौड़ा बनूं, पशु पक्षी बनूँ, स्थावर बनूँ, मनुष्य बनूँ, कुछ भी देही बनता ही चला जाऊँ, किसी न किसी पर्याय वाला ही रहा करूँ, यहां संसार की बातों में, तो ऐसा रहने से फायदा क्या? बल्कि बरबादी ही है । अत: हे प्रभो ! मेरी बस यह अंतरंग में आकांक्षा है कि वह काल आये, वह परिणति आये जहाँ मैं केवल रह जाऊँ । मुझे इस देह से भी प्रयोजन नहीं । देह मिलता यह तो संकटों से भरा है । भूख प्यास, सर्दी गर्मी, चिंता शोक, इष्टवियोग अनिष्टसंयोग सम्मानअपमान आदिक के संकट ये सब इस देह के बल पर होते रहते हैं । इस देह को भी मैं नहीं चाहता ।

नरदेहस्थ आत्मा को शाश्वत देहविविक्त होने का उपाय बनाने के लिये वर्तमान अपूर्व अवसर―यद्यपि आज की ऐसी स्थिति है कि कोई कहे कि यदि देह को नहीं चाहते तो मर जाओ, आत्मघात कर लो, छुटकारा हो जायगा, मगर इस तरह से छुटकारा नहीं होता । मान लो इसी समय आप आत्मघात करके मर गए तो क्या अगले भव में फिर देह न मिलेगा? अरे आगे फिर नये देह में बंधना पड़ेगा और आज तो मनुष्य हैं, विवेक मिला है, बुद्धि मिली है, कुछ सोच समझ सकते हैं, तत्त्वचिंतन कर सकते हैं, कहीं मरण करके कीड़ा मकौड़ा के भवों में पहुंच गए तो-क्या हाल होगा? तो यह मनुष्यभव कितना पवित्र भव है कि जहाँ हम इतना विवेक बना सकते कि सारे संकट मेट सकते हैं । हमारे ज्ञान में वह बल है, हमारी दृष्टि में वह सामर्थ्य है कि एक क्षण में ही समस्त संकट मिट सकते हैं । अब लिए हुए हैं हम संस्कार वासना तो अब वह वासना जगती है, वह दृष्टि हमारी खतम हो जाती है, फिर वे ही संकट सामने आ जाते हैं, किंतु सत्यदृष्टि में जो चमत्कार है वह सामने आ ही जाता है । सत्य दृष्टि यही है कि जैसा मे वास्तव में हूँ सही अपने आप अपने ही सत्व के कारण वैसा मेरा उपयोग रहे, ऐसा उपयोग होने पर एक भी संकट नहीं रहता । यह कला कितनी सरल है, ज्ञानसाध्य है । ज्ञान ज्ञान में ही रहे रस में कोई बाधा न आये, बाधा आये तो सत्वर दूर कर दी जायें, इसके लिए कुछ संयम की आवश्यकता है जिससे कि हमारा वह ज्ञान ज्ञान बना रहे, ऐसे काम के लिए हमें इंद्रिय और मन के विषय से विरक्त होना होगा । अनेक इच्छाओं का परिहार करके हमें अपने आपके स्वरूप की दृष्टि बनानी होगी । तो हमारी उस दृष्टि में यह बल है कि हम संकटों को तुरंत हीं दूर कर लें । कितनी सुगम कला है, जानना है ज्ञान के द्वारा सही ढंग से, ईमानदारी से, केवल गप्पों में नहीं, किंतु भीतर में रुचिपूर्वक इस ज्ञानस्वरूप को समझना है । इतना सुगम ज्ञान और इतनी सुगम कला और सारे संकट समाप्त हो जायें इतना महान फल, उस काम के करने के लिए उत्साह न जगे तो यह तो बहुत अज्ञान, मिथ्यात्व, महा आपत्ति समझ लीजिए, वास्तव में जीव पर यही है संकट।

परपरिणति को संकटरूप मानने की मिथ्या मान्यता―मोही जीव मानता है कि कुछ धन कम हो गया संकट आ गया, अरे वह संकट है ही नहीं, झूठ का ऊधम है । कोई मानता है कि मेरे परिजन का किसी का वियोग हो गया, या मेरा मित्र मेरे से पृथक् हो गया, लोग अब मेरे अनुकूल नहीं चल रहे, मेरी बात नहीं मान रहे, मेरा यश नहीं गा रहे, इसे संकट समझते हैं । अरे यह सब झूठ का ऊधम है, यह कोई संकट नहीं है । परपदार्थ हैं उनकी जो परिणति होती हो वह अपने में । कोई कुछ बोलता है, जो बोले सो बोले वह अपने में । कोई कुछ करता है करे वह अपने में । प्रत्येक पदार्थ का परिणमन उसका उसके स्वयं में हो रहा है । हो उससे मेरे में क्या है? मेरे में संकट बाह्य पदार्थों की परिणति वाला नहीं है, किंतु मेरे में संकट अज्ञान का छाया हुआ है । जो हमें अपने आपके स्वरूप को नहीं समझ रहे हैं, उससे में उपयोग नहीं दे रहे हैं, यह संकट हम पर छाया । है, बाकी बातों को संकट न मानें । अगर अन्य स्थितियों को, संयोग वियोग को हम संकट समझनें लगें तो हमारा उपयोग यही फंसा रहेगा, हम अपना कल्याण न कर पायेंगे । इससे इन बातों को संकट जरा भी न मानें । जिंदगी है, घर में रहते हैं इस वजह से कुछ इसकी ओर चित्त देना पड़ता है तो दें मगर वहाँ यह हठ न

बना दें कि इतने ही काम बनें, ऐसा ही काम बने तो हम निश्चित हो सकेंगे, अथवा हम धर्म के पात्र हो सकते हैं । अरे निश्चितता अभी ही आना चाहिये यहीं । कैसी ही स्थिति हो, अपने ज्ञानबल को संभालें, वस्तु के स्वरूप को निहारे, निश्चितता यहीं आना चाहिए । अगर यह निश्चितता नहीं आ सकती तो धर्म का पालन नहीं हो सकता । हम कैसी ही कठिन स्थितियों में हों जिन स्थितियों को दुनियावी लोग बड़ी कठिन स्थितियां कहते हैं, पर कठिन स्थिति यहाँ कुछ नहीं है । जो बात बीते उसी में यहाँ रहना पड़ता है । क्या अनेक दरिद्र लोगों का गुजारा नहीं चलता? अनेक प्रकार के अपमानित लोग क्या अपना जीवन नही रखते? सारी स्थितियां हैं, ये कोई संकट नहीं, यह कोई चिंता की बात नहीं । चिंता की बात यह बना लिया कि इस पर्याय के परिचय को सत्य मान लिया । ये सब मायामयी पर्यायें हैं । इनका तो इस ढंग का परिचय न होना ही भला था । इस परिचय से हमने नफा कुछ न पाया । तो इन बाहरी बातों से हम जरा भी संकट न मानें, अपने आपमें हमारा ज्ञान जागृत रहे, मैं अपने सत्य स्वरूप को समझता रहूं, इसके लिए उत्साह जगना चाहिए ।

वस्तुत: ज्ञानसाम्राज्य में बाह्य संयोग वियोग की अबाधकता―इस ज्ञानवार्ता को उत्पन्न होने देने में बाहरी संयोग वियोग बाधा नहीं करते। अन्यथा बतलाओ, घोर उपसर्गों में मुनियों को केवलज्ञान कैसे उत्पन्न हुआ? शेरनी प्राणघात कर रही है, स्याल खा रहे हैं, ईंधन में मुनिराज को बंद करके जला दिया गया, नदी में बहा दिया गया, शस्त्रों से छेदे जा रहे, आदि अनेक प्रकार के उपसर्ग किए जा रहे लेकिन उनका परम कल्याण हुआ । तो यहाँ का यह दु:ख हमें धर्म में लगने से रोकता है क्या? यह प्राणी खुद ही मोह में समझता है कि ऐसा संकट है, हम धर्म क्या करें ? अरे संकट तो धर्म में और सहायक बन सकते हैं । बल्कि समागम या मौज के साधन हमारे धर्ममार्ग में सहायक नहीं बन सकते । तो इतना साहस जगाना चाहिए कि कुछ भी स्थितियाँ आयें, ये सब परपदार्थ की परिणतियां है, जो कुछ भी हो रहा है उससे मेरे को कोई नुक्सान नहीं है । मैं उनके बारे में जो अज्ञान भरा विचार बनाता हूँ, बस यही हमारी करतूत हमें दुःखी कर रही है । संकट है तो मुझ पर यह है, यह संकट छूटे तो मेरा कल्याण है । बाहरी बातों में सुधार बिगाड़ होने से मेरा कुछ कल्याण नहीं है । ऐसा जिसने अपने अंत:स्वरूप का निर्णय किया है वह पुरुष इस ज्ञानबल परमात्मा होता है । परमात्मा का स्वरूप क्या है यह इस बात को “परम आत्मा” ये शब्द ही बता रहे हैं । तो इन शब्दों की व्युत्पत्ति पूछते हुए जिज्ञासु पूछ रहा है कि परम का अर्थ क्या और पर का अर्थ क्या, मा का अर्थ क्या और परमात्मा का अर्थ क्या? इसके उत्तर में कह रहे हैं ।


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