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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 306

From जैनकोष



राई-भोयण-बिरओ मेहुण-सारंभ-संग-चत्तों य ।

कज्जाणुमोय-बिरओ उद्दिट्ठहार विरदो य ।।306।।

श्रावक के भेदों में प्रथम प्रकार―पहिला प्रकार है सम्यग्दर्शन का शुद्ध होना । 25 दोषों से रहित शुद्ध निर्मल सम्यक्त्व का जगना यह प्रथम धर्म है । यहाँ बारह भेद बताये जा रहे हैं इस तरह कि 11 तो प्रतिमाएं हैं और एक है सम्यक्त्व । तो सम्यक्त्व को पहिले बताया और 11 प्रतिमायें इसके पश्चात् बतला रहे हैं । यों बारह भेद गृहस्थ धर्म कहे जा रहे हैं । सम्यग्दर्शन कहते हैं आत्मा के सहज स्वरूप के दर्शन होने को, अनुभव होने को । मैं वास्तव में क्या हूँ इसका परिचय हो जाना सो ही सम्यक्त्व है । खुद है और खुद वह है । जो अनादि से है, अनंतकाल तक रहेगा । पदार्थ का स्वरूप पदार्थ से कभी बिछुड़ता नहीं है । जैसे अग्नि का स्वरूप गर्मी है । तो गर्मी कभी बिछुड़ती नहीं है । सदा काल रहती है और गर्मी बदल जाय तो अग्नि भी खतम हो जाय । तो यहाँ तो अग्नि द्रव्य नहीं है किंतु पर्याय है, अतएव इस तरह कह देते हैं किंतु पदार्थों में पदार्थों का स्वरूप त्रिकाल भी न्यारा हो नहीं सकता । मेरा स्वरूप वह है जो मेरे सत्त्व के कारण मुझमें पाया जाय । वह स्वरूप है चैतन्यमात्र । उस स्वरूप पर यदि दृष्टि जाय तो जीव की आकुलतायें सब दूर हो जायें । क्या है ? जो मेरा स्वरूप है सो मुझमें रहेगा, सदा रहेगा, जो मेरा स्वरूप नहीं है वह मुझमें अब भी नहीं है, आगे भी न होगा । जितने बाह्यपदार्थ हैं वे सब मेरे स्वरूप से भिन्न हैं, इनका जो बनता हो सो बनें । इनमें जो बात होती हो सो हो । सम्यक्त्व के कारण ज्ञानी के हृदय में इतना बड़ा साहस जगता है कि वह परपरिणति को निरखकर व्याकुल नहीं होता । जो होता हो सो हो, पर की बात है, उससे मेरा क्या संबंध है, यह विश्वास सम्यग्दृष्टि के रहता है ।

सम्यक्त्व की अमीरी―अनुपम आनंद आता है सम्यक्त्व के उदय होने पर, इसको कोई व्यथा ही नहीं रहती, कभी मरण भी हो, इस देह को छोड़कर जा रहा हो, वहाँ पर भी यह बड़ा प्रसन्न रहता है । क्या है ? मोही जीव ही तो मृत्यु के समय में दुःख मानते, कि बड़े कष्ट से इतना धन कमाया, अब इसे छोड़कर जा रहे हैं लेकिन ज्ञानी तो यह जानता है फिर मैंने कुछ नहीं कमाया, मेरा यहाँ कहीं कुछ नहीं है । केवल हमने परिणाम भर किया था, उस परिस्थिति में हमने नाना तरह के भाव बनाये थे, पर उनसे, मेरा संबंध कुछ नहीं । मेरा स्वरूप तो केवल चैतन्यमात्र है । जो है मेरे साथ उसके साथ ही मैं जा रहा हूँ । जो मेरा नहीं है वह मेरे साथ अब भी नहीं है, न कभी साथ रहा और न कभी साथ रहेगा । मेरा वास्तविक स्वरूप तो मेरे साथ ही है, मेरे में पर्याय है, अतएव इस तरह कह देते हैं किंतु रहेगा । इसी निज स्वरूप को हम देख रहे हैं, वही मेरी दुनिया है, वही मेरे परभव की दुनिया है, वही मेरा सर्वस्व है यों जिनकी प्रतीति है उनको दुःख काहे का ? जिसे दुःख से दूर होना हो वह सर्व प्रयत्न करके सम्यक्त्व उत्पन्न करे । सम्यक्त्व के हुए बिना कोई पुरुष अमीर नहीं कहा जा सकता । वे सब गरीब हैं जिनको संतोष नहीं है । उनको सहज आनंद का अनुभव नहीं जग सकता जिनको निरंतर आकुलता रहती है, आगे अंधकार ही अंधकार बसा है, सत्य स्वरूप समझ में नहीं आता, वहाँ विह्वलता का क्या ठिकाना ? भले ही कोई करोड़पति हो जाय, फिर भी यदि सम्यक्त्व न हो तो फिर भी वह महा गरीब है । उसे शांति संतोष का अवसर नहीं मिल सकता । प्रभु का जो आनंद है उसकी झलक नहीं हो सकती इसलिए वह गरीब है । और कोई कितना ही गरीब हो लौकिक दृष्टि में, उसने यदि अपने आत्मा के स्वरूप का दर्शन कर लिया है तो जान लो कि उसको सारा वैभव तृणवत है । जैसे जीर्ण तृण है उससे कौन मुहब्बत करता है? बल्कि उससे तो सभी लोग उपेक्षा करते हैं । तो इसी तरह जिस ज्ञानी ने यह समझ लिया कि मेरे स्वरूप से बाहर जो कुछ है बाहर ही है, वह मेरे काम में जरा भी आने वाला नहीं है, ऐसी प्रतीति उसके चित्त में बसी है । जिसके बल पर वह अमीर कहलाता है, वास्तविक धनी है ।

श्रावक का प्रथम भेद विशुद्ध सम्यग्दृष्टि―अपने आपके सहज स्वरूप का अनुभव होना, प्रतीति होना सो सम्यग्दर्शन है । वह शुद्ध कब है, कैसे शुद्ध है, जिसमें कोई मूढ़ता नहीं । कोई लोग ऐसा सोचते हैं कि इस पर्वत से गिरकर मरे तो बैकुंठ हो जाये, इस नदी में नहावे तो बैकुंठ हो जायगा । यह मूढ़ता ही तो है । रागी द्वेषी कुगुरुवों के बाहरी चमत्कार देखकर उनमें आसक्त हो जाते हैं, ये ही सच्चे गुरु हैं, रागीद्वेषी गुरुओं को निरखकर विकल्प करके वहाँ भी भक्ति रहा करती है, तो ज्ञानी जीव मूढ़ताओं से रहित हैं, उसके किसी भी प्रकार का मद उत्पन्न नहीं हो सकता । जाति, कुल, वैभव, प्रतिष्ठा आदिक किसी भी चीज का घमंड नहीं होता । 8 प्रकार के भेद बताये गए हैं । अच्छी जाति में उत्पन्न होने का घमंड, अच्छे कुल का घमंड, ज्ञान का घमंड, पूजा प्रतिष्ठा मिलती हो उसका गर्व शरीर में बल विशेष हो उसका गर्व कुछ ऋद्धि चमत्कार हो उसका गर्व, तपश्चरण का घमंड, शरीर सुंदर हो उसका घमंड, ये 8 प्रकार के मद सम्यग्दृष्टि पुरुष में नहीं होते, और न वह कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु या उनके सेवकों में अपनी प्रीति करता है । जहाँ शंका आदिक कोई दोष नहीं । यों पच्चीस दोषों से रहित सम्यक्त्व का पालन करे, वह है श्रावक का प्रथम धर्म ।

सम्यग्दृष्टि की निःशंकता व निराकांक्षता―सम्यग्दर्शन में शंका आदिक कोई किंचित् दोष हो, तो वह सम्यग्दर्शन विशुद्ध नहीं कहलाता है । अपने आपके स्वरूप में कभी संदेह हो जाय, किसी प्रकार का भय हो जाय कि अब मेरी जिंदगी किस तरह चलेगी, मेरा परलोक कैसे होगा ? शरीरवेदना का क्या परिणाम होगा, अथवा अभी मरण तो न आयेगा आदिक किसी भी प्रकार का भय हो तो वह सम्यक्त्व का दोष है । जिस जीव को सम्यक्त्व हो गया उसको क्या भय ? जिसने सबसे निराले ज्ञानमात्र अपने स्वरूप को निर्णय में ले लिया उसको अब शंका क्यों होगी ? यह मैं स्वरक्षित हूँ क्योंकि सत् हूँ, जो सत् है वह कभी मिटता नहीं और उसमें किसी दूसरे का संबंध नहीं, ऐसा जिनकी प्रतीति में है उनको क्या शंका ? उसी तरह जिनेंद्र भगवान् के वचनों में भी कहीं शंका नहीं है । उसने खूब परीक्षा कर ली है । स्याद्वाद की कसौटी पर कसकर कि जो स्वरूप जैन शासन में बताया गया वह प्रमाण सिद्धस्वरूप है । सम्यग्दृष्टि जीव को कभी भोगों की आकांक्षा नहीं रहती। भोग भोगता है, इच्छा होती है, मगर ऐसा कुछ नहीं है कि धर्म करके इच्छा की जाती हो। जैसे जो अतिव्यामोही पुरुष हैं वे पूजा आदिक करके पुत्र चाहेंगे विवाह चाहेंगे, ऐसी वृत्ति सम्यग्दृष्टि की नहीं होती । चूंकि वह गृहस्थी में रह रहा है दुकान में जायेगा, वहाँ सोचेगा कि आप हो, इतना सोचने से सम्यक्त्व नहीं बिगड़ता, किंतु धन में ही आसक्ति हो जाय, प्रत्येक उपाय से धन की ही इच्छा बनाये तो समझो वहाँ सम्यक्त्व बिगड़ गया ।

सम्यग्दृष्टि की निर्विचिकित्सा―सम्यग्दृष्टि जीव कभी भी अपनी किसी परिस्थिति में घबड़ाहट नहीं लाता कि क्या करूँ, इस प्रकार की वेदना अनुभव में नहीं लाता, क्योंकि वह जानता है कि जो सुख दु:ख के प्रसंग आते हैं ये अहेतुक हैं । मेरा स्वरूप तो नित्यानित्यात्मक है । यह आत्मा किन तत्त्वों से बना, इसका स्वयं आकार क्या है ? तो आकार है ज्ञान और आनंद । ज्ञान और आनंदस्वरूप से रचा हुआ यह मैं आत्मा हूँ । तो मूल में भीतर में मेरे को कोई कष्ट ही नहीं है, आनंदस्वरूप मेरा है । जब मैं अपने स्वरूप से हटकर बाहर में कुछ निहारता हूँ तो मेरा स्वरूप विकृत हो जाता है । ज्ञानी को किसी क्लेश में म्लानता नहीं होती । अपने आपमें रुचि होने से वह अपने स्वरूप को निहारता है । इसके फल में बाहर में इतनी समता हो जाती कि उसे सब जीव अपने समान नजर आते हैं, और साधारणतया उन सबकी सेवा तो रहती ही है, पर धर्मात्माओं की सेवा में रहें और धर्मात्माओं को दस्त कय आदिक हो फिर भी रंच भी ग्लानि नहीं करता, क्योंकि धर्म में उसे बड़ा अनुराग है । जैसे यहाँ मातायें अपने बच्चे की टट्टी, नाक आदिक के पोंछने में ग्लानि नहीं होती, क्योंकि उस बच्चे से प्रेम रखती हैं, इसी प्रकार धर्मात्मा पुरुष किसी धर्मात्मा की सेवा करने में कोई ग्लानि नहीं करता ।

सम्यग्दृष्टि का अमूढत्व व उपगूहन―सम्यग्दृष्टि जीव को अपने आपके स्वरूप के बारे में पूर्ण सावधानी रहती है । मूढ़ता उसके अंदर नहीं है, क्योंकि उसने साक्षात् अनुभव कर लिया अपने स्वरूप को । जैसे जिस पुरुष ने कुछ बात आंखों से देख ली, उसके विरुद्ध वह मानता नहीं है । वह समझता है कि मैंने यह सब अपने आंखों देखा । कैसे अन्य बात मान ली जाय ? तो आंखों देखी भी बात झूठ हो सकती है, मगर अपने अनुभव में उतरी हुई बात कभी झूठ नहीं हो सकती । ऐसी भी घटनायें हैं कि आंखों देखी बात भी झूठ निकल आये, मगर अपने हृदय में, अपने अनुभव में जो बात उतर आये, वह झूठ नहीं होती । ज्ञानीपुरुष ने बाह्यपदार्थों की उपेक्षा के बल से, अपना दिल में किसी भी पर को न बसाने के उपाय से अपने आपमें ऐसा परमविश्राम पाया है कि जिससे अपने आपके सहज सत्यस्वरूप का अनुभव हो गया है । तो अब वह उसके विपरीत किसी के बहकावे में आकर अपने स्वरूप की श्रद्धा नहीं छोड़ सकता । ज्ञान जीव तो ऐसा दृढ़ रहता है, पर अज्ञानी व्यामोही जीव अपने आपके स्वरूप की बात भी क्या जाने ? कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु के कुछ थोड़े से चमत्कारों को देखकर वहाँ ही एकदम भक्ति बन जाती है । ज्ञानी पुरुष अपनी उस ज्ञाननिधि को इस तरह गुप्तरूप से निरख-निरखकर तृप्त रहता है, जैसे किसी दरिद्र पुरुष को कहीं निधि मिल जाय तो उसे एकांत में ले जाकर निरख-निरखकर खुश रहता है । सबके बीच तो रखता नहीं, क्योंकि उसे कोई लूट सकता है, तो वह एकांत में जाकर अपनी निधि निरखकर तृप्त रहता है । ज्ञानी जीव अपने उस ज्ञान को गुण को उन्नति को लोगों को यों नहीं बताते कि बता देने से फिर गुण हल्के हो जायेंगे, ओछे बन जायेंगे, क्योंकि जब अपने मुख से कह दिया तो यहाँ उन गुणों का बोझ न रह सकेगा । तो ज्ञानी पुरुष उस ज्ञाननिधि को या गुणविकास को बाहर नहीं दिखाना चाहता । वह तो अपने उपयोग को अपने आपमें रख करके वहीं तृप्त रहा करता है । जब कि मोही जीव गुण न हों तो भी अपने मुख से गुण बखानते रहते हैं और दूसरों के दोष निरखते रहते हैं । यह, वृत्ति ज्ञानी पुरुष की नहीं होती । उसे तो एक काम पड़ा हुआ है किसी भी प्रकार इन बाह्य उपद्रवों में, शरीरबंधन से, कर्मबंधन से, विकल्पबंधन से मुक्त हो जाऊँ, और अपने आपके स्वरूप में रमकर संतुष्ट हो जाऊँ । उसे बाहर की विडंबनायें नहीं सुहाती ।

सद्दृष्टि का स्थितिकरण, वात्सल्य व प्रभावन―ज्ञानी पुरुष की यही भावना रहती है कि मैं अपने धर्म में ही सदा स्थिर रहूं । चूंकि जहाँ रागद्वेष उठाने पड़ते हैं फिर भी उसका यही प्रयत्न रहता है कि मैं इनसे हटकर अपने आपकी इस ज्ञानानुभूति में ही तृप्त रहूं । और, किसी दूसरे धर्मात्मा को विचलित होते देखता है तो उसे उपदेश देकर या अन्य जिस किसी भी प्रकार हो उसको धर्म में स्थित करता है । अज्ञानी पुरुषों के धर्मात्माओं में वात्सल्य नहीं होता । अज्ञानी को वात्सल्य उनमें होता है जिनमें मोह है । घर के बच्चों पर, स्त्री आदिक पर चाहे सारा धन खर्च हो जाय, चाहे जान भी देनी पड़े तो सदा तैयार रहते हैं लेकिन धर्म पर या धर्मात्मा पर कोई विपदा आये तो उसमें साथी नहीं बन सकते हैं । उन धर्मात्माजनों पर खर्च करेंगे भी तो थोड़ासा मन बहलावा के ढंग से । ज्ञानी पुरष धर्मात्माओं के प्रति निष्कपट वात्सल्य रखते हैं । उनका वात्सल्य धर्मात्माजनों से घर के बच्चों से भी अधिक रहता है । वैसे भी आप देखें―घर के बच्चे लोग इसके हित में क्या कारण बन सकते हैं ? और धर्मात्माजन इसके हित में कारण बनते हैं ? इसीलिए धर्मात्मा पुरुषों को निरपेक्ष बंधु कहा गया है, किंतु घर के लोग तो खुदगर्ज बंधु हैं । अर्थात् जिनसे कुछ लाभ हो सकता है उनको तो यह मोही जीव गैर मानता है और जिनसे कुछ लाभ नहीं, जिनके पीछे अपनी सारी जिंदगी लगा देते हैं, जीवनभर बड़े-बड़े कष्ट सहते हैं, उनको अपना मानते हैं, परधर्म और धर्मात्माओं के प्रसंग में इसको वात्सल्य नहीं उमड़ता । ये अज्ञानियों के दोष हैं । अज्ञानी जन धर्म की प्रभावना को नहीं चाहते । न अपने में धर्म की बड़वारी चाहते हैं न दूसरों में धर्म की बड़वारी चाहते हैं । और प्रभावना करेंगे तो दोषों की । लेकिन ज्ञानी पुरुष सत्यधर्म की प्रभावना करते हैं, उपदेश से, ज्ञान से, आचरण से, सर्वप्रकार से धर्म की प्रसिद्धि करते हैं । तो सम्यग्दर्शन होना यह श्रावक का मूल धर्म है । अंत: पद्धति में ये 12 भेद बताये जा रहे हैं, उनमें प्रथम भेद सम्यग्दर्शन की शुद्धि होना बताया है ।

द्वितीय श्रावक―श्रावक का दूसरा भेद है पहिली प्रतिमा । 11 प्रतिमायें और उससे पहिले सम्यक्त्व का होना यों बारह भेद श्रावक के बताये गए हैं । उसमें पहिला प्रकार तो बताया जा चुका है । दूसरा है दर्शन प्रतिमा का धारी श्रावक । यह मद्य, मांस, मधु, आदि जो स्थूल दोष हैं उनका त्यागी होता है, 5 उदंबरफल व अन्य अभक्ष्यों का इनका परिहार किये रहता है, कंदमूल की चीजें नहीं खाता, चमड़े में रखी हुई चीजों को भी नहीं खाता । पहिली प्रतिमाधारी श्रावक भी दार्शनिक है, उसका भोजन भी व्रतियों की तरह शुद्ध होता है, व्रत ग्रहण नहीं किया इतनी ही कमी है । मगर सम्यग्दर्शन के होने पर प्रवृत्ति व्रतियों की भाँति हो जाती है । उससे भी यह परीक्षा हो जाती कि इस मनुष्य का सम्यक्त्व के साथ कितना संबंध है ? यह मनुष्य की बात कही जा रही है । तिर्यंच सम्यग्दृष्टि हो उसमें तो बाह्य आचार में कुछ कमी रह जायेगी, किंतु मनुष्य सम्यग्दृष्टि हो तो उसकी वृत्ति शुद्ध होगी, क्योंकि उसका इतना विशिष्ट मन है, इतना विशिष्ट सामर्थ्य हैं कि अपनी विशुद्धि को निभा सकता है । तो श्रावक का दूसरा भेद है पहिली प्रतिमा का धारण करना ।

तृतीय श्रावक―तीसरा प्रकार श्रावक है द्वितीय प्रतिमाधारी श्रावक । 5 अणुव्रत, 3 गुणव्रत और 4 शिक्षाव्रत, ऐसे बारह प्रकार के व्रत होते हैं । मोटी हिंसा का त्याग, याने स्थावर जीवों की हिंसा से बचत गृहस्थों को नहीं होती, उद्यमी, विरोधी हिंसायें भी गृहस्थों से होती हैं, मगर संकल्पी हिंसा का त्याग कर देता है । गृहस्थ लोग पूर्ण सत्य नहीं बोल सकते क्योंकि आरंभ परिग्रह, व्यापार आदिक के कार्यों में पूर्णतया सचाई पर टिकता नहीं है । तथा व्यापार आदिक कार्यों में सत्य बोले भी तो उसे भी परमार्थत: असत्य कहा गया है, क्योंकि वह आत्मा की बात नहीं है । और भी कई प्रसंग ऐसे होते हैं जिनमें असत्य बोलना पड़ता है, पर गृहस्थों को चाहिए कि स्थूल असत्य का त्याग हो । चोरी का त्याग हो, अणु ब्रह्मचर्य का पालन हो याने अपने स्त्री अथवा पति के सिवाय अन्यत्र संबंध न रखना । पाँचवाँ व्रत है परिग्रह का परिमाण करे, इन 5 अणुव्रतों को जो धारण करें वह तृतीय श्रावक कहलाता है। इस अणुव्रत की रक्षा के लिए 3 गुण व्रत धारण करता है। मैं जन्म पर्यंत इतनी दूर से अधिक न जाऊंगा, इतनी दूर का व्यापार न करूँगा, यों आजन्म मर्यादा का निभाना दिग्व्रत है । उसमें भी दो-दो चार-चार दिन का नियम लेकर और भी इधर उधर आना जाना कम करना देशव्रत हैं । बिना प्रयोजन किए जाने वाले कार्यों को अनर्थदंड कहते हैं, जो उनका त्यागी होता है यह व्रत प्रतिमाधारी श्रावक । जैसे तोता, कुत्ता, बिल्ली, कबूतर आदिक पालना, यह भी उसके लिए वर्जित है, कुलीन पुरुषों को ये भी चीजें न पाना चाहिए । इन तोता, मैना आदिक के पालने से फायदा कुछ नहीं मिलता । इन जीवों को व्यर्थ कष्ट देना है । अगर आजीविका में या धर्म वृद्धि के कार्यों में कुछ फायदा मिलता हो तो बताओ । कुछ फायदा नहीं मिलता । ऐसे व्यर्थ के कार्य ज्ञानी पुरुष नहीं करते । उसी के साथ-साथ और भी अनेक बातें हैं । जैसे―बिना प्रयोजन बहुतसा जल बखेरना, बिना प्रयोजन पेड़ों की टहनियाँ तोड़ना आदि । ऐसी अनर्थ की बातें ज्ञानी पुरुष नहीं किया करते । इन अणुव्रतों की और गुणव्रतों की रक्षा के अभ्यास के लिए चार शिक्षाव्रतों का पालन करना होता है । तीनों समय सामायिक करना । सामायिक में विचार क्या चलता है? वहां तो आत्मतत्त्व के चिंतन का विचार चलता है। और उसी आत्मतत्त्व का चिंतन बढ़ाने के लिए जाप करना, पाठ करना, बारह भावनायें भाना आदिक जो-जो भी कार्य सामायिक में किए जाते हैं उन सबका लक्ष्य है निर्विकल्प ज्ञानस्वभावमय अपने आत्मतत्त्व का चिंतन बनाना । प्रोषधोपवास करना, याने 7 दिन में एक दिन ऐसा अभ्यास रखना है कि जहाँ खाने तक का विकल्प न करें और धर्मध्यान में बहुतसा समय गुजारे । यह श्रावक भोगोपभोग का परिमाण करता है, खाने पीने की आराम की चीजों का नियम कर लेना, मैं इतनी ही चीज खाऊंगा, इतने ही आराम के साधन रखूँगा यों भोगोपभोगपरिमाण होता है । अतिथि सम्विभाग व्रत―मुनि, क्षुल्लक, ऐलक आदिक पात्रों को भोजन कराकर फिर भोजन करना, ऐसी मन में धारणा कर लेना कि मैं जो अतिथि को भोजन देकर खुद भोजन करूँगा यदि कदाचित अतिथि न मिले तो भी उसकी भावना कर लेना यह है श्रावक का अतिथि सम्विभाग व्रत । तृतीय प्रकार के श्रावक का यह द्वादश व्रत का नियम हो जाता है ।

चतुर्थ, पंचम, षष्ठ, सप्तम, अष्टम, नवम श्रावक―सामायिक प्रतिमा का पालक चौथा श्रावक है । निरतिचार सामायिक करने का व्रत होता है इस चतुर्थ प्रतिमाधारी श्रावक का प्रोषधोपवास अष्टमी और चतुदर्शी का उपवास करना यह है पंचम श्रावक का व्रत । छठा है 5 वीं प्रतिमाधारी श्रावक । जहाँ सचित जल, फल, धान्य आदिक का त्याग हो जाता है । उसमें दया का विशेष संचार हो जाता है । देखिये―यद्यपि परिस्थितिवश यह श्रावक जल गर्म करेगा फिर भी उसके अंदर दया की इतनी विशेषता है कि उसके अंदर पाये जाने वाले जीवों के प्रति वह दया का भाव रखता है । वह सचित्त को अचित्त इसलिए करता है कि उसकी म्याद बढ़ जाय और कामोत्तेजकता न रहे तो वह इतना दयालु हो गया है कि वह सदोष चीज को जिसमें एकेंद्रिय का भी घात है उसे भक्षण नहीं कर सकता । 7 वाँ श्रावक है छठी प्रतिमाधारी श्रावक । वह रात्रि में किसी भी प्रकार का न भोजन करता है, न कराता है, न करने की अनुमोदना करता है । और वह दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य रखता है, 8 वाँ श्रावक है सप्तम प्रतिमाधारी । इस सप्तम प्रतिमा में पूर्ण ब्रह्मचर्य का नियम रहता है । मैथुन का पूर्णरूपेण नव कोटि से त्याग होता है । 9 वाँ श्रावक है अष्टम प्रतिमाधारी । वह आरंभ का त्यागी होता है । घर में किए जाने वाले आरंभ परिग्रह व्यापार आदि के कार्यों को त्याग देता है । हाँ यदि वह सर्विस किए हुए हो तो वह पेन्सन लेता रहेगा, किंतु नई कमाई कुछ न करेगा । यदि पहले का कमाया हुआ धन न रहे, पेन्सन भी न मिले तो उसे कहीं ऐसा भाव नहीं होता है कि वह फिर कमाई का कार्य कर सके । वह तो आगे प्रतिमा में बढ़ जायेगा, क्षुल्लक अथवा ऐलक हो जायेगा है । यह है 9 वाँ श्रावक ।

दसवां, ग्यारहवां व बारहवां श्रावक―दसवां श्रावक है 9 वां प्रतिमाधारी । जहाँ पर आवश्यक वस्त्र के अलावा समस्त परिग्रहों का त्याग हो गया वह है परिग्रहत्यागप्रतिमाधारी । यह घर द्वार, धन, धान्य आदिक सब कुछ त्याग देता है । बच्चे लोग अगर कहें कि अब तो तुम्हारा यहाँ कुछ नहीं रहा । तुम यहाँ से जावो तो वह यह न कहेगा कि हम नहीं जाते यह तो मेरा घर है । वह तो उठकर वहाँ से चला जायेगा । तो परिग्रह के त्याग की बात क्यों जरूरी है किसी कल्याणार्थी को कि जितनी बाधा आ रही है आत्म उन्नति में वह परिग्रह के संग से आ रही है, और परिग्रह का प्रसंग एक तो होता है आवश्यक प्रसंग में और एक होता है अनावश्यक प्रसंग में । तो आज लोग अनावश्यक धनसंचय के प्रसंग में लग गए, और क्यों लगे ? पर्यायबुद्धि से । देह को माना कि यह मैं हूँ । ये लोग समझ जायें कि यह भी एक खास आदमी हैं । कितना अज्ञान अंधेरे में बढ़ गए । जिसके पास जितना धन है वह आवश्यकता से कई गुना अधिक मिला है लेकिन संतोष नहीं होता । और, कल्पना करलो कि आज जितना धन है उससे चौथाई ही धन होता तो क्या जीवित न रहते ? जीवित रहने के लिए कितना धन आवश्यक है सो सोच लीजिए । अधिक तो है ही, मगर तृष्णा ऐसी लगी हुई है कि जो धन है पास में उसका भी सुख नहीं ले पाते । दुःखी रहते हैं । तो यह 9 वीं प्रतिमाधारी श्रावक समस्त प्रकार के परिग्रहों का त्याग कर देता है, सिर्फ थोड़े से कपड़े पास में रहते हैं । 11 वाँ श्रावक है दसम प्रतिमाधारी । वह अनुमतित्यागी होता है । 9 वीं प्रतिमा तक तो वह अनुमति भी देता था पर 10 वीं प्रतिमा में अनुमति का भी त्याग है । समय पर जो भी बुला ले जाय, भोजन करा दे, पर वह किसी को अनुमति नहीं दे सकता । बारहवां श्रावक है 11 वीं प्रतिमाधारी । जो उद्दष्ट का त्यागी है, वह बिना दी हुई कोई चीज ग्रहण नहीं करता । हां यद्यपि कोई रोज अशुद्ध खाता हो, विधिपूर्वक न खाता हो, और एक दिन भी वह सब घर के लिए शुद्ध भोजन

बनाये तो उसमें से ये क्षुल्लक ऐलक आदि दूसरे को ग्रहण कर लेते हैं और अगर वे समझ जायें कि इसने तो यहाँ सिर्फ मेरे लिए भोजन बनाया है, बाकी सभी लोगों के लिए दूसरी जगह चूल्हा जलेगा, तो ऐसे बने हुए आहार को वें साधुजन नहीं ग्रहण करते हैं । इस तरह श्रावक के बारह भेद हैं । इन बारह प्रकार के श्रावकों का धर्म सर्वज्ञदेव ने बताया है । अब इनमें से जो प्रथम भेद है सम्यग्दर्शन का उस सम्यग्दर्शन के बारे में विशेष विवरण करेंगे । सम्यक्त्व की उत्पत्ति किस प्रकार होती है, उसका क्या साधन है ? कैसे जीव को सम्यग्दर्शन होता है ? सम्यग्दर्शन के बारे में कुछ विशेष विवरण किया जायेगा, क्योंकि सर्व धर्मों का मूल सम्यक्त्व है । सम्यक्त्व नहीं है तो व्रत, तपश्चरण, संयम आदि बाहर में कल्पना कर ली जाय, किंतु अंत: जिस प्रकार से धर्म का लाभ होना चाहिए, कर्मक्षय होना चाहिए वह कुछ भी नहीं वन सकता । अत: अब सम्यग्दर्शन का वर्णन करेंगे ।


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