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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 309

From जैनकोष



अणउदयादो छण्हं सजाइ-रूवेण उदयमाणाणं ।

सम्मत्त-कम्म-उदये खयउवसमियं हवे सम्मं ।।309।।

क्षायोपशमिक सम्यक्त्व की संभूति―सम्यक्त्व का घात करने वाली 7 प्रकृतियाँ घातियाकर्म की हैं और इनमें दो तरह के कर्म होते हैं―सर्वघातीस्पर्धक, देशघातीस्पर्धक । जो समस्त सम्यक्त्व को नष्ट कर दे वह सर्वघाती है और जों सम्यक्त्व को तो न नष्ट करे किंतु उनमें दोष पैदा कर दे, थोड़ा घात करे उसे देशघाती कहते हैं तो सर्वघाती स्पर्धक का यदि उदयाभावी क्षय हो अर्थात् उदय में आये इसमें ही तत्काल बदल जाय, उसका प्रभाव नहीं आ सके और आगामी जो उदय में आ सकता है, उनका उपशम हो और देशघाती का उदय हो ऐसी स्थिति में क्षायोपशमिक सम्यक्त्व उत्पन्न होता है । अनंतानुबंधी का वहाँ विसंयोजन होता है, याने अन्य-अन्य रूप से वह उदय में आता है । इस कारण सम्यक्त्व का घात नहीं होता और सम्यक्त्व प्रकृति का उदय होने से उसमें चल, मलिन, अगाढ़ दोष उत्पन्न होता है । यों क्षयोपशम की स्थिति होने पर जीव के क्षायोपशमिक सम्यक्त्व होता है, अब उपशम सम्यक्त्व रहता है अंतर्मुहूर्त । यों समझिये कि 4-5 सेकेंड रहता है और क्षायिक सम्यक्त्व सदाकाल रहता है, जब से हुआ तब से सदा रहेगा और सिद्ध हो गए वहाँ भी क्षायिक सम्यक्त्व रहेगा । लेकिन संसार अवस्था में कुछ अधिक 33 सागर पर्यंत ही वह रह सकता, उसके बाद उसका निर्वाण हो जायेगा । क्षायोपशमिक सम्यक्त्व 66 सागर काल तक रह जाता है । यों सबसे उत्कृष्ट सम्यक्त्व तो है क्षायिक सम्यक्त्व और वर्तमान निर्मलता की दृष्टि से उपशम भी है मगर उपशम सम्यक्त्व नष्ट हो जाता है, क्षायिक सम्यक्त्व कभी नष्ट नहीं होता । यों ये सम्यक्त्व इस जीव ने अनेक बार पाये और मिट गए । पर क्षायिक सम्यक्त्व होने के बाद फिर कभी मिटता नहीं है । तो अब बतलाते हैं कि ऐसी कौन-कौन सी चीजें हैं जिन्हें जीव ने अनेक बार प्राप्त की, पर क्षायिक सम्यक्त्व चारित्र पाये बिना इस जीव का संसार से उद्धार नहीं हो सका ।


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  • कार्तिकेय अनुप्रेक्षा
  • प्रवचन
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