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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 317

From जैनकोष



णिज्जिय दोष देवं सव्व-जिवाणं दयावरं धम्मं ।

वज्जिय गंथं च गुरुं जो मण्णदि सो हु सद्दिट्ठी ।।317।।

परमात्मदेव में क्षुधा तृषा दोष की अनुपपत्ति―जो पुरुष देव, धर्म और गुरु को जैसा उनका स्वरूप है उस ही स्वरूप को मानता है वही समीचीन दृष्टि वाला है । देव तो निर्दोष हुआ करते हैं । दोष 18 प्रकार के बताये गए हैं, जो संसारी जीवों में पाये जाते हैं वे अठारहों प्रकार के दोष जहाँ पर न हों वे भगवान कहलाते हैं । वे 18 प्रकार के दोष कौन-कौनसे हैं, उनका नाम सुनते हुए यह भी विवेचन करते जाना चाहिए कि हाँ ऐसा कौन हो सकता है ? पहिला दोष है क्षुधा । जिसके भूख लगती हो वह भगवान कैसे ? बहुत से लोग भगवान के चरित्र में अनेक घटनायें बताते हैं कि इसने अमुक के बेर खाये, इस भगवान ने अमुक का भोजन किया । भले ही पूर्व अवस्था में आहार किया है, लेकिन जबसे परमात्मपन प्रकट हो जाता है तब से उनका आहार नहीं होता । भूख उनके नहीं होती । भूख भी तो वेदना है । यदि क्षुधा लगे तो इसके मायने यह है कि प्रभु को पीड़ा हुई । जिसमें पीड़ा हो वह हम संसारियों से विलक्षण कैसे हो सकता है ? तो जिसमें क्षुधा दोष पाया जाय वह देव नहीं है । अर्थात् पूज्यनीय, आदर्श, उपासनीय देव नहीं है । दूसरा दोष है तृषा । प्यास का दोष भी पीड़ा करने वाला दोष है, क्षुधा और तृषा में इतना अंतर है कि क्षुधा तो बीच की पीड़ा है और प्यास छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी पीड़ा है । यों समझिये कि हल्की भूख । हो तो उसमें वेदना को सह सकते हैं, तेज भूख हो तो वह भी प्यास के मुकाबले में वेदना सही जा सकती है । क्षुधा के यदि दो नंबर हैं तो तृषा के चार नंबर हैं । प्यास तो मंद, मंदतर । और तीव्र, तीव्रतर होती है पर भूख के दो ही प्रकार हैं―हल्की भूख और तेज भूख । इस प्रकार भूख के तो दो दर्जे हैं और प्यास के चार दर्जे हैं । ऐसी भूख और प्यास की वेदनायें जिसमें लगी हों वह प्रभु कैसे कहा जा सकता है ?

परमात्मदेव के भय, द्वेष, राग, मोह की अनुपपत्ति―तीसरा दोष है भय । जिन देवों के चरित्र में भय की बात बतायी जाती है कि अमुक देवता डरा और डर कर दूसरे के पास पहुंचा । उसने उसकी रक्षा की । तो ऐसा भगवान जीव परमात्मा नहीं कहा जा सकता । प्रभु ज्ञानमात्र आनंदमय होते हैं । यदि वे शरीरसहित हों तो भी उनका दिव्य शरीर पर की बाधा से रहित, और शरीर रहित परमात्मा हैं सिद्ध प्रभु तो वे भी निर्वाध हैं । तो जो देव है, परमात्मा है उसके भय नहीं हो सकता । चौथा दोष है द्वेष । जिस जीव में द्वेष भाव जगता है वह परमात्मा नहीं हो सकता । विरोध हो, द्वेष हो, बैर हो, ऐसी कलुषतायें जिसके परिणाम में आयें उसे देव कहा जा सकता है क्या ? जो लोग देव की घटनायें बताते हैं कि अमुक देवता ने अमुक का संहार किया तो द्वेष भाव होने के कारण उनको प्रभु न कहा जा सकेगा । 5 वाँ दोष है राग । जिसके चरित्र में राग भरी बातें हों, भगवान हैं, भगवती हैं और दोनों पति पत्नी साथ-साथ रहते हैं, वार्तालाप होता है और यहाँ तक बता डालते हैं कि उनके बच्चे भी होते हैं तो परमात्मा के स्त्री हों और बच्चे हो यह बात संभव नहीं है । जो लोग भक्ति भी करते और देव का स्वरूप भी यों मानते वे अज्ञान अंधेरे में पड़े हैं, जो अपने ही समान रागी द्वेषी देवताओं को मानते हैं । कहते तो हैं ऐसा लोग कि भगवती फते करे लेकिन भगवती का अर्थ तो भगवान की परिणतियों से है असल में । जो भगवान की विशुद्ध परिणति है वह विजय करे, अर्थ तो यह है, लेकिन जिसने भगवान के चरित्र ही ऐसे गढ़ रखे हों―उनका विवाह होता है, स्त्री होती है, वे दोनों साथ रहते हैं..., तो ऐसा मानने वाले लोग उस तत्त्व तक कहाँ पहुंचेंगे ? वे तो सीधा किसी स्त्री को ही भगवती मानेंगे । तो जो रागद्वेष से रहित है वही पुरुष देव (प्रभु) कहा जा सकता है । छठा दोष है मोह । मोह का अर्थ है अज्ञान, बेसुधी । जैसे गृहस्थ लोग घर गृहस्थी में स्त्री में मोह रखते हैं, बेसुध रहते हैं इसी तरह कुछ लोग देवताओं का ऐसा चरित्र गढ़ देते हैं कि वे भगवान अपनी पत्नी के साथ रहते हैं मोह करते हैं... वे पुरुष अज्ञान अंधेरे में हैं, उन्होंने देव का स्वरूप ठीक समझा नहीं । देव का स्वरूप समझने के लिए खुद अपने आपमें कुछ निर्मलता जगानी होगी, क्योंकि समझने वाला जब खुद निर्मल होगा, उसका उपयोग विशुद्ध होगा तो उसमें भगवान के स्वरूप की झाँकी आवेगी । तो जो पुरुष खुद ज्ञानबल के द्वारा बाह्यपदार्थों की उपेक्षा करके अपने आपमें विश्राम लेता है उसको खुद से ही उत्तर प्राप्त होता है अनुभव के रूप में कि भगवान ऐसा ज्ञानमात्र और अनाकुल स्वरूप होता है ।

परमात्मदेव की चिंतारहितता―7 वाँ दोष है चिंता करना । चिंता तो चिता से भी बढ़कर बतायी गई है, अर्थात् जैसे कोई पुरुष मरे, चिता पर जाय तो उसके संबंध में जैसे दूसरे लोग कुछ दुःख की कल्पना कर सकते हैं―वहाँ क्या दुःख है, किंतु चिंता में निरंतर कठिन से कठिन दुःख है । भला सब जीव निराले हैं, यह आत्मा अकेला है, अकेला ही जन्मता है अकेला ही मरता है, अकेला ही पुण्य पाप करता है और अकेला ही फल भोगता है । इसका किसी दूसरे से कोई संबंध नहीं है, लेकिन मोही जीव ने किसी स्त्री को, पुत्र को मान रखा कि ये मेरे हैं, घर के दो चार व्यक्तियों में अपना उपयोग लगा देने से उसने अपना कितना महान घात किया है, अपने ज्ञान गुण पर प्रहार किया है और उससे फिर नाना चिंतायें आ जाया करती हैं । जिस पुरुष को अपने एकत्व से प्रीति है उस पर चिंतायें सवार नहीं होतीं । जो अपने को अकेला ज्ञानमात्र निरखता है उस पर चिंताओं का क्या अवकाश ? भगवान समाधि के बल पूर्ण विशुद्ध होते हैं और अपने ज्ञानस्वरूप के अनुभव में निरंतर रहते हैं इस कारण वै चिंता से सर्वथा रहित हैं ।

परमात्मदेव में जरा की अनुपपत्ति―8 वाँ दोष है बुढ़ापा । बुढ़ापा को महारोग में गिना गया है । जहाँ इंद्रियाँ शिथिल हो जातीं, शरीर शिथिल हो गया, जठराग्नि भी मंद हो जाती है, अनेक रोग उखड़ पड़ते हैं, कोई उनको पूछने वाला भी नहीं होता है बेकारसा जानकर । जहाँ बाहरी भी अनेक वेदनायें हैं । ऐसी जरा जिसके पायी जाय उसे क्या देव कह सकते हैं ? कुछ लोग किसी देवता का रूप वृद्ध के रूप में मानते हैं । उस तरह का चेहरा दिखाते हैं और कहते हैं कि यह अमुक देव है । तो जिसके बुढ़ापा हो वह देव नहीं हो सकता । यदि कोई बूढ़ा मुनि भी केवलज्ञान प्राप्त कर ले तो केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद, वह बूढ़ा न रहेगा । उसका शरीर युवक के समान पूर्ण पुष्ट और कांतिमान हो जायगा । यह केवलज्ञान का अतिशय है । किसी पुरुष के पैर आदिक में यदि किसी प्रकार का रोग हो, और समाधि के बल से वह परमात्मा हो जाय तो किसी भी तरह का रोग टेढ़े मेढ़े ये कुछ नहीं रह सकते । जो लोग अरहंत परमात्मा के दर्शन करें और उन्हें वे दिखे टेढे मेढे रोगी, तो वहाँ । उस प्रभु के प्रति भक्ति कहाँ जागी ? उनका परमौदारिक दिव्य देह होता है, जहाँ धातु उपधातु मलिनता आदिक से रहित स्फटिक मणि की तरह विशुद्ध शरीर हो जाता है । एक यह अतिशय बताया गया है अरहंत प्रभु का कि उनके शरीर की छाया नहीं पड़ती । क्यों पड़े छाया ? जब उनका शरीर स्फटिक मणि की तरह निर्मल हो गया, तो यहाँ भी देख लो―कोई शुद्ध काँच हो तो धूप में रखे जाने पर उसकी छाया जमीन में नहीं पड़ती । हाँ अगर छाया पड़ती है तो समझ लीजिए कि अभी वह काँच पूर्ण विशुद्ध नहीं है, कहीं न कहीं उसमें मल अवश्य लगा है । फिर भगवान का परमौदारिक दिव्य देह स्फटिक मणि की तरह पूर्ण स्वच्छ है, इसी कारण उनके देह की छाया नहीं पड़ती । तो जिनका देह जरा से रहित है वे प्रभु सशरीर परमात्मा हैं, और सिद्ध भगवान के शरीर ही नहीं है तो जरा आदिक का कोई अवकाश ही नहीं है ।

परमात्मदेव में रोग व मरणदोष का अभाव―9 वां दोष है रोग । शरीर में रोग करोड़ों प्रकार के बताये गए हैं । रोम-रोम में अनेक दोष पाये जाते हैं, केवलज्ञान होने से पहिले कोई शरीर ऐसा न मिलेगा मनुष्यों का जो समस्त रोगों से रहित हो, चाहे वह कितना ही पुष्ट बलवान हो । बहुत से रोग नहीं हैं इसलिए कह देते हैं कि यह मनुष्य निरोग है, लेकिन कोई भी औदारिक देह ऐसा नहीं है कि जिसमें कोई न कोई रोग न पाया जाय । जहाँ रोग हो वह देव नहीं कहा जा सकता । 10 वाँ दोष है मृत्यु । देव का मरण नहीं होता । मरण नाम है उसका जिसके बाद जन्म लेना पड़ता है । सशरीर परमात्मा देह से छूट जाता है तो आयु का क्षय तो होता है, उसका इस दृष्टि से मरण नाम भी कहा है, लेकिन वह है पंडितपंडितमरण । तो आयु का वियोग हुआ इस दृष्टि से मरण नाम रख दिया, लेकिन वास्तव में मरण उसी का ही नाम है कि जिसके बाद शरीर में जन्म लेना पड़ता है । भगवान की मृत्यु नहीं है और इसी कारण भगवान के जन्म भी नहीं है । सर्व कर्म जहाँ छूट गए, फिर अन्य शरीर में जाने की बात ही नहीं रहती । कुछ लोग मानते हैं कि भगवान का अवतार होता है । पर अवतार शब्द का अर्थ है―उतारना, गिरना, हल्की स्थिति में आना । अवतार कोई आदर्श अर्थ नहीं रखता है, लेकिन लोग अवतार को बड़ी ऊंची निगाह से देखते हैं कि यह भगवान का अवतार है । भला भगवान को क्या कष्ट था जो कि जन्म लेने आये ? जो जन्म लेने आये वह देव नहीं है । ज्ञान और आनंद ही प्रभु का स्वरूप है । इस मर्म को जो नहीं समझते हैं वे मन गढ़ंत कथायें गढ़ते हैं और अंधेरे में ही पड़े रहते हैं । ज्ञानप्रकाश उन्हें प्राप्त नहीं होता ।

परमात्मदेव में स्वेद, खेद, मद, रति, विस्मय, जन्म, निद्रा विषाद का अभाव―11 वाँ दोष है पसेव आना । शरीर में जब पसीना आता है तो कितना म्लान हृदय हो जाता है । अशुचि, मलिनता, दुर्गंध, न सुहाये, ये सब गंदगियाँ आ जाती हैं । सशरीर परमात्मा के शरीर तो होता है, पर वह दिव्य शरीर होता है वहाँ पसेव का कोई काम नहीं है । 12 वाँ दोष है खेद । प्रभु के खेद नहीं होता । किसी भी समय किसी शंका में आ जायें, वियोग हो जाय, घबड़ा जायें, यह बात प्रभु में नहीं हो सकती । जिसकी ये घटनायें बतायी जाती हों वह प्रभु नहीं माना जा सकता । 13 वाँ दोष है मद घमंड । प्रभु तो विशुद्ध ज्ञाता दृष्टा निराकुल परम आनंदमय अवस्था वाले होते हैं । उनके अभिमान नहीं होता । घमंड तो वहां आये जिसमें कभी कुछ थोड़ी सी चीज पा ली हो, किंतु जिनका विशालरूप है, विशाल संपन्नता है, परिपूर्णता है उनको मद कहाँ से आयेगा ? कषाय ही नहीं है, उस प्रकार के कर्म ही नहीं हैं, विशुद्ध ज्ञानानुभूति प्रकट है वहाँ घमंड नहीं ठहर सकता । 14 वाँ दोष है रति । रति प्रवृत्ति से संबंध रखती है । जहाँ रति की जा रही हो, प्रवृत्ति की जाती हो वहाँ देवत्व नहीं माना जाता है 15 वां दोष है विस्मय (आश्चर्य) । जहाँ सकलज्ञान उत्पन्न होता है, तीन लोक के समस्त पदार्थों को स्पष्ट जानते हैं उनको आश्चर्य किस बात पर हो ? आश्चर्य तो वहाँ होता है जो पहिले जानता नहीं है और कुछ अद्भुत बात जानने में आये, आकस्मिक बात जानने में आये । जो चीज थी नहीं और सामने उपस्थित हो वहाँ ही आश्चर्य उत्पन्न होता है, पर प्रभु के ज्ञान में तो जो पर्याय अनादिकाल से है, अनंतकाल तक है, जो कुछ भी है, तीन लोक तीन काल के पदार्थ वे सब प्रतिभात हुए हैं । उन्हें आश्चर्य का अवकाश नहीं होता । 16 वां दोष है जन्म का । भगवान को जन्म भी नहीं लेना पड़ता । 17 वां दोष बताया गया है निद्रा याने नींद का आना । कुछ लोग कहते हैं कि भगवान सौ जाते हैं । अरे जो सो जाये वह तो बेसुध हो गया । जब कमजोरी होती है, थकान होती है तभी तो सोया जाता है । सोना कोई गुण की चीज नहीं है । भगवान में यह निद्रा का दोष नहीं पाया जता । 18 वां दोष है विषाद । रंज और दुःख का अनुभव करना विषाद है । इन 18 प्रकार के दोषों से जो रहित हो वही भगवान कहा जा सकता है।

परमात्मदेव की निर्दोषता व गुणसंपन्नता―जो पुरुष देव, शास्त्र, गुरु का सत्यरूप में श्रद्धान करता है वह सम्यग्दृष्टि जीव है । देव तो होता है निर्दोष, जिसमें दोष जरा भी न हो और गुण पूरे प्रकट हो गए हों उसी का नाम देव है, उत्कृष्ट आत्मा । परमात्मा का भी अर्थ यह है कि जो परम आत्मा हो सो परमात्मा । परम के मायने उत्कृष्ट । जो आत्मा उत्कृष्ट हो गया है उसका नाम परमात्मा है । परमात्मा शब्द से ही अनेक बातें स्पष्ट हो जाती हैं । वह आत्मा उत्कृष्ट है, इसके मायने यह हैं कि वह कोई अनुत्कृष्ट सदोष अधूरे गुण वाला था । वही जीव अब निर्दोष और गुणसंपन्न हो गया । इससे यह सिद्ध होता है कि जो परमात्मा हैं वे भी कभी कर्मों से लिप्त थे और कर्मों को काट करके भगवान हुए हैं । परम आत्मा परम का अर्थ है जिसमें अपना लक्षण उत्कृष्ट प्रकट हो गया है । परा मा लक्ष्मी यत्र स परम: । जिसमें उत्कृष्ट लक्ष्मी प्रकट हुई है उसे परम कहते हैं । अर्थात् वह गुणसंपन्न है, गुणों से पूरा वही हो सकता है जिसमें दोष न रहा हो । ऐसे परमात्मा में जो दो तीन शब्द (पर मा आत्मा) लिखे हैं, वे शब्द बहुतसी बातों को ध्वनित करते हैं । जो निर्दोष हो, गुणसंपन्न हो उसे परमात्मा कहते हैं । हम सदोष हैं और गुणों में अधूरे हैं यही हम स्वभाव में परिपूर्ण हैं और पुरुषार्थ करें तो हमारे दोष भी सब समाप्त हो सकते हैं तथा गुण पूरे प्रकट हो सकते हैं ।

अंतस्तत्त्व के समाधान से मानवजीवन की सफलता―आज मनुष्यजीवन पाया तो इस जीवन में एक ही उद्देश्य बनायें कि मैं अपने आपके स्वरूप का दर्शन करता रहूं जिससे कि दोष सब खतम हो जायें और हमारे गुण यथार्थ रूप में प्रवृत्त हो जायें । इसमें ही शांति मिलेगी । यही हमारा उत्कृष्ट काम होगा । इसके अतिरिक्त अन्य काम चाहे किसी प्रकार बनें, बिगड़ें परिणमें, उसमें कुछ भी हर्ष विषाद न करें । मैं तो एक ज्ञानानंदस्वरूप आत्मा हूँ, मुझे किसी पर से मतलब क्या है । आज अनेक लोग प्रीतिपूर्वक व्यवहार करते हैं, कदाचित् वे सबके सब नाराज हो जायें तो उससे मेरा कुछ बिगाड़ नहीं है । किसी भी जीव से मेरे आत्मा में कोई गुण प्रकट नहीं होता । मैं अपने आपको अपनी दृष्टि में लिए रहूं तो मैं ही स्वयं समृद्धिशाली बन जाता हूँ । यों तो सारा जहान चाहे मेरी निंदा करे, पर उससे मेरा कुछ भी बिगाड़ नहीं होता । जो भी अनिष्ट बातें हैं उन सबका भी मैं स्वागत करता हूँ, पर मेरे में बसे हुए परमात्मा के स्वरूप का दर्शन बना रहे, यही एक सच्चा पुरुषार्थ है कि जिसके बल से हमारा कल्याण हो सकता है । तो जब कोई जीव अपने आपके स्वरूप का निश्चय करके यहाँ ही रमता है, तृप्त रहता है वह जीव कर्मों के बंधन से छूटता है और परमात्मा बन जाता है ।

आत्मा का उत्कृष्ट पद―लोग चाहते हैं कि मैं कोई ऊंचा से ऊंचा बन जाऊँ, मगर यह तो निर्णय करें कि संसार में ऊंची कौनसी चीज है ? क्या धनिक बन जाना अथवा कुछ देशों का प्रधान (राष्ट्रपति) बन जाना ये कोई सर्वोत्कृष्ट बातें हैं ? अरे जरा भीतर में इसका निर्णय तो करो । ये तो सब बाहरी बातें हैं । देव भी मरकर एकेंद्रिय बन जाता है । राजा भी मरकर कीड़ा मकौड़ा बन जाता है । यहाँ का बड़ा होना कोई बड़प्पन की चीज नहीं है । ऊंची चीज तो है अपने आपमें वह निर्दोषता प्रकट हो जाय कि जिसके बाद कभी निम्नदशा न हो । यह मोहजाल यह लोगों का परिचय, ये तो सब व्यामोह की बातें हैं । इनमें कोई बड़प्पन की बात नहीं है । इन बाहरी बातों का ख्याल छोड़कर अपने आपमें बसे हुए परमात्मस्वरूप को देखो, इस ही उपाय से निर्दोषता प्रकट हो सकती है । जो निर्दोष है, सर्वगुण संपन्न है उसे परमात्मा कहते हैं । ऐसे परमात्मा से नेह लगाना, उसके प्रति भक्ति उमड़ना यह सबसे बड़ा भारी आत्मा का शृंगार है, शोभा है । इस ही भक्ति उपासना के बल पर यह जीव आनंदमग्न होता रहता है । जिसको अपने आपके अनुभव की बात प्रकट हुई है उसको ऐसी धुन बनती है, कि सर्व वैभव को त्याग दें, सर्व परपदार्थों की उपेक्षा करके निर्ग्रंथ दिगंबर वनवासी हो जाये । ये सांसारिक सुख कोई सुख नहीं हैं । ये तो साक्षात् दुःखरूप हैं । यहाँ के जिन कार्यों में मौज माना जाता है उन कार्यों के करने में भूत, भविष्य और वर्तमान इन तीनों कालों में दु:ख भरा रहता है । सभी लोग जानते हैं कि इस सांसारिक वैभव के उपार्जन से पहिले कितना कष्ट होता है, वर्तमान में उसकी रक्षा करने में कष्ट होता है और बाद में उसका वियोग होने पर कष्ट होता है । तो फिर ऐसी विभूति में क्या लगाव रखना ?

ज्ञानी का निर्णय और साहस―ज्ञानी के तो यह निर्णय रहता कि उदयानुसार जो आता है आये, जाता है जाये । हर स्थितियों में हम अपनी व्यवस्था बना लेंगे । मुझे ऐसी लाज नहीं है कि कोई लोग ऐसा सोचने लगेंगे कि देखो यह अभी तक तो ऐसी ठाठ से रहते थे और अब ऐसी गिरी स्थिति में रह रहे हैं । ज्ञानी पुरुष के ऐसा साहस रहता है । ज्ञानीपुरुष किसी भी स्थिति में हर्ष विषाद नहीं मानता । वह तो आत्मदर्शन, आत्म आराधना के काम को सबसे अच्छा समझता है । यहाँ की चीजें तो सब उदयाधीन हैं―देखिये बड़े-बड़े साधु संतों पर बड़े-बड़े उपसर्ग आये, पापोदय वहाँ भी नहीं छूटता है । सिंह भख रहा, है, शिर पर अंगीठी जलाई जा रही है, स्यालिनी भख रही है आदि―ऐसे कठिन उपसर्ग सहन करने पर भी वे साधु आत्माराधना में ही रत रहते हैं । वे उपसर्ग उनका कुछ भी बिगाड़ कर सकने में समर्थ नहीं होते । वे उन उपसर्गों को समता से सहन करके कर्मों की निर्जरा करके केवलज्ञानी हुए । तो यहाँ बाहरी प्रसंग कैसे ही आये उनकी जरा भी चिंता मत रखो, चित्त में ऐसा निर्णय रखो कि जैसी भी स्थिति सामने आ जायेगी उसी में अपनी व्यवस्था बना लेंगे । यहाँ की स्थितियों में रंच भी दुःख न मानकर अपने अंदर में ऐसा अंत:पुरुषार्थ करना है कि जिससे संसार का आवागमन छूट जाय ।

धर्मपालन की दिशा―जो पुरुष परिपूर्ण गुणसंपन्न आत्मा को ही भगवान (परमात्मा) मानता है वह सम्यग्दृष्टि है । लोग तो धर्म के संबंध में नाना कल्पनायें बनाते हैं । धर्म करना तो सभी चाहते हैं, मगर कितनी विडंबना बन गई है कि कोई लोग तो पेड़, नदी, पर्वत आदिक को देवता मानकर पूज बैठते हैं । बहुत से लोग तो अनेक पशुओं को भी पूजते हैं । यों कैसी-कैसी विडंबनायें धर्म के नाम पर बन गयीं । और, ये हमारे देवता मांस खायेंगे, ऐसी श्रद्धा रखकर जीवों की हत्या करते हैं, और खुद मांस को देव देवी आदि का प्रसाद समझकर भक्षण करते हैं । तो यह धर्म कहाँ हुआ ? यह तो अधर्म हुआ । लोग धर्म के नाम पर रागद्वेष, विषयकषाय आदि के अनेक कार्य करते हैं । धर्म के संबंध में लोगों की यह कितनी उल्टी श्रद्धा है । यदि धर्म का संक्षेप में लक्षण जानना है तो यों जान लीजिए कि मेरा जो सहजस्वरूप है ज्ञानज्योति प्रतिभासमात्र, उस प्रतिभासस्वरूप अपने आपमें उपयोग रखना बस यही है धर्मपालन । अब जो इस आत्मा के धर्म में आये नहीं हैं, या जिनको इसका अभ्यास नहीं है, उनका काम कैसे बने? धर्म करने के उपाय लोकव्यवहार में नाना प्रकार के बताये गए हैं―पूजा करना, स्वाध्याय करना, सत्संग में रहना, तप करना, त्याग करना आदिक । कोई पुरुष इन अनेक बातों को तो करे, रहे इन्हीं विकल्पों में, पर यह पता न हो कि मुझे ये काम किसलिए करना है, इन कार्यों के किये जाने का उद्देश्य क्या है, तो समझो कि उसने धर्मपालन नहीं किया । ये सब बातें इसीलिए हैं कि मैं अपने उस निराकुल निर्धिकल्प प्रतिभास स्वरूप को जानूं और वहाँ ही ज्ञान लगाकर, दृष्टि लगाकर तृप्त रहूं, निराकुल रहूं, इतनी बात पाने के लिए हम पूजन, सत्संग, स्वाध्याय आदि करते हैं, इस प्रयोजन को हमें कभी न भूलना चाहिए ।

धर्मपालन के प्रयोजन की पूरकता में ही धर्मपालन की वास्तविकता―आत्मदर्शन के प्रयोजन को (लक्ष्य को) दृष्टि में रखते हुए व्यावहारिक धर्म कार्यों में लगें तब तो ठीक है अन्यथा वह एक विडंबना मात्र रहेगी । जैसे एक कथानक में बताते हैं कि किसी सेठ ने प्रीतिभोज किया तो उसने यह सोचकर कि लोग हमारी ही पातल में खा जाते हैं और उसी में छेद कर जाते हैं, दाँत खोदने के लिए सींक निकालकर । सो खाने के साथ-साथ एक-एक सींक भी चार-चार अंगुल की परोसवा दिया । अब सेठ तो गुजर गया । जब उस सेठ के लड़कों ने पंगत किया तो उन्होंने सोचा कि हम तो पिताजी से चौगुनी बढ़िया पंगत करेंगे, सो पिता ने तो बनवायी थीं दो प्रकार की मिठाइयाँ, लड़कों ने 8 प्रकार की मिठाइयां बनवायी, पिता ने 4 अंगुल की सींक परोसी थी तो लड़कों ने एक-एक बिलस्त की लकड़ियाँ परोसीं । जब उन लड़कों के लड़कों ने पंगत की तो उन्होंने सोचा कि हम तो अपने पिता से भी चौगुनी अच्छी पंगत करेंगे । सो अनेक प्रकार की मिठाइयाँ बनवायीं और साथ ही डेढ़-डेढ़ हाथ का एक-एक डंडा भी परोसवाया । भला देखिये―उस सींक को साथ में परोसने का प्रयोजन न जानकर डेढ़-डेढ़ हाथ का डंडा परोसने की नौबत वहाँ आ गई । तो ऐसे ही समझ लीजिए कि बिना प्रयोजन को ध्यान में रखे रूढ़िवश जो धार्मिक क्रियायें की जा रही हैं वे सब दिल बहलावा मात्र रह जाती हैं । उन धार्मिक क्रियाओं को करके जो फायदा लूटा जाना था वह नहीं लूटा जा सकता । तो जितने क्षण हम आपके उस निर्दोष परिपूर्ण गुणसंपन्न आत्मस्वभाव की ओर दृष्टि आती है उतने समय तो समझिये कर्म कट रहे हैं धर्मपालन हो रहा है और इसे छोड्कर जो बाहरी बातों में जलूस, शोभा, सजावट आदिक में लगे रहते हैं, लक्ष्य का पता नहीं है तो ऐसी स्थिति में जैसे और-और काम किए वैसे ही यह भी काम हो गया । तो यह लक्ष्य दृढ़ रहना चाहिए कि मुझे इस जीवन में करने लायक काम केवल एक ही है दूसरा कुछ नहीं । वह काम है अपने आत्मा के ज्ञानस्वरूप को जानूं, उसे ही दृष्टि में लिए रहूं और उसमें ही तृप्त रहा करूँ, इसके अतिरिक्त अन्य जो भी काम करने पड़ते हैं वे करने तो पड़ते हैं, पर उनका करना योग्य नहीं है । करने योग्य काम तो एक यह आत्म आराधना ही है ।

आत्मधर्म―जो मेरे आत्मा का स्वभाव है वही मेरा धर्म है । आत्मा का स्वभाव है केवल ज्ञाता दृष्टा रहना, रागद्वेष से रहित रहना । ऐसा बन सके तो समझिये कि हम धर्म कर रहे । उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, आदिक 10 प्रकार के जो धर्म बताये गए हैं वे धर्म हैं । यदि हमारी क्षमा आदिकरूप परिणति बनती है तो हम धर्म पालन कर रहे हैं । धर्म है सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र । आत्मा के ज्ञानानंदस्वरूप का विश्वास होना, उसी को उपयोग में लेना और उसही रूप प्रवर्तन करना । यदि यह बात मुझमें बन रही है तो धर्मपालन हो रहा है । धर्म है दया । दूसरे जीवों को दुःखी देखकर दया का भाव आता है, दया का भाव तब आता है जब कि दूसरे की तरह अपने को समझा जा रहा हो और अपने समान दूसरे को भी समझा जा रहा हो । जैसे जाड़े में ठिठुरने वाले किसी पुरुष की काँपती हुई आवाज को आप सुनते हैं तो आपको उस समय जाड़े के दुःख का अनुभव होता है, आपके अंदर जाड़े का दुःख उत्पन्न होता है तो आपको दया आती है कि इसे कोई कपड़ा दे देना चाहिए, ऐसे ही जब आप किसी भूखे पुरुष को देखते हैं तो उस समय आपको भूख की वेदना का अनुभव होता है तभी उस पर दया उत्पन्न होती है और आप उसे रोटी देते हैं । तो दूसरे जीवों पर दया करने में भी खुद का संबंध बना । और अपने आपमें दया उत्पन्न हुई कि हमको पाप न करना चाहिए, नहीं तो इसमें मेरे परमात्मस्वरूप का घात है । मुझे मिथ्यात्व में, मिथ्याज्ञान में, मिथ्या आचरण में नहीं रहना चाहिए, क्योंकि उसमें मेरे ही ब्रह्मस्वरूप का घात है । तो यों जो अपनी दया कर रहा है, पर की दया कर रहा है वह धर्मपालन कर रहा है । धर्म वही है जहां, दया बसी हो, और अपने आपके स्वरूप का श्रद्धान, ज्ञान, आचरण पड़ा हो, इसके अलावा जो अन्य प्रकार की प्रवृत्तियाँ हैं वे अधर्म हैं । बलि करना, सरागी देवों की उपासना करना आदि ये तो अधर्म की बातें हैं ।

निर्ग्रंथ गुरु में ज्ञानी की आस्था―सम्यग्दृष्टि जीव वह है जो निर्दोष और परिपूर्ण गुणसंपन्न आत्मा को देव मानता है और दयामयी धर्म को धर्म समझता है और निर्ग्रंथ जनों को अपना गुरु मानता है । ग्रंथ (परिग्रह) 24 प्रकार के होते हैं, 14 अंतरंग परिग्रह और 10 बाह्य परिग्रह । इस जीव की बरबादी परिग्रह के संग में है । यदि ज्ञानबल से परिग्रह का भीतर में लगाव त्याग दे तो उसे ज्ञानप्रकाश मिलेगा और अपना कल्याणमार्ग मिलेगा । मिथ्यात्वभाव रागद्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ, हँसना, रोना, शोक करना अथवा वियोग करना आदि ये सब अंतरंग परिग्रह हैं । इन परिग्रहों में जो लगा हुआ है जीव उसको प्रभुस्वरूप नहीं सुहाता । सिद्ध परमेष्ठी अथवा गुरु महाराज इन भीतरी परिग्रहों के लगाव से पृथक् हैं और बाह्य में धन, धान्य, क्षेत्र, वस्त्रादिक किसी भी प्रकार का परिग्रह नहीं है, केवल एक शरीरमात्र उनका परिग्रह है, सो उसे भी वे अपनाते नहीं हैं, अतएव वह भी परिग्रह नहीं है । ऐसे परिग्रहरहित निर्ग्रंथ गुरु कहलाते हैं, ऐसा जो श्रद्धान करते हैं वे सम्यग्दृष्टि कहलाते हैं । देव, शास्त्र, गुरु की यथार्थ श्रद्धा जिसे नहीं है वह धर्ममार्ग में बढ़ नहीं सकता है ।

आत्मदर्शी के आकुलता का अभाव―सबसे पहिले विश्वास निर्मल बनाना है । किसी के बहकावे में न आयें कि फलाने देव की उपासना करने से धन मिलेगा, सुख साधन मिलेंगे । अरे ज्ञानी पुरुष तो संसार की सुख सुविधाओं को चाहता ही नहीं है । सांसारिक सुख मिले चाहे न मिलें, हमारा गुजारा हर स्थितियों में चल जायेगा । जब कभी शरीर में फोड़ा फुँसी होती है और उसे कोई फोड़ता है, आपरेशन करता है तो भीतर में पहिले अपना ऐसा कड़ा दिल बनाना पड़ता है कि फोड़ने दो इन्हें, यह तो मेरे भले के लिए है, ऐसा ही साहस करके यहाँ भी हर स्थितियों में रहना है । अपने ज्ञान और दिल की वृत्ति से ही सब सारा अंतर हो जाता है । कोई पुरुष इस बात पर दृढ़ हो जाय कि यहाँ पर जो कुछ होता हो होने दो, मैं तो शरीर से निराला ज्ञानस्वरूप यह आत्मा यह सामने हूँ, यही मैं हूँ । इस अमूर्त आत्मा में कोई कुछ प्रवेश नहीं कर सकता। यों देह से निराले

ज्ञानमात्र आत्मा की ओर दृष्टि रखे कोई तो उसे बाहरी बातों से कोई आपत्ति आयेगी क्या ? जब कोई पुरुष अपने ज्ञानभाव में दृढ़ नहीं रहता है तो वह स्वयं अपनी कल्पना से विपदायें मान लेता है । हम अपने में व्यर्थ की कल्पनायें न बनायें और अजर, अमर, सरल जो मेरा ज्ञानस्वरूप है बस उसकी ही प्रीति रखें तो फिर यहाँ कोई दुःख नहीं है । ज्ञानी जीव अपने आत्मस्वरूप में और देव, शास्त्र, गुरु के निर्णय में इतना निःशंक है कि उसको कोई कितना ही बहकाये, मगर वह श्रद्धा से विचलित नहीं हो सकता । रेवती रानी को अभव्यसेन ने कितना चमत्कार दिखाया, ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदिक बन गया तिस पर भी उनकी उपासना उसने नहीं किया । यहाँ तक कि तीर्थंकर का झूठा समवशरण तक दिखाया फिर भी उस रेवतीरानी ने समझ लिया कि 24 तीर्थंकर तो हो चुके यह 25 वाँ तीर्थंकर कहां से आ गया? यह तो मायाजाल प्रतीत हो रहा है, सो उसने उसकी भी पूजा उपासना नहीं किया । तो यों श्रद्धान रहता है ज्ञानीपुरुष का कि न उसके अपने आत्मस्वरूप में गल्ती है और न देव, शास्त्र, गुरु के स्वरूप के निर्णय में गल्ती है ।


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