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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 325

From जैनकोष



रयणाण महारयणं-सव्वं-जोयाण उत्तमं जोयं ।

रिद्धीण मह-रिद्धी सम्मत्तं सव्व-सिद्धियरं ।।325।।

सम्यक्त्व की महारत्नस्वरूपता―अब इस गाथा में सम्यक्त्व का माहात्म्य बता रहे हैं । यह सम्यक्त्व रत्नों में, महारत्न है । जितने रत्न लोग समझते हैं कि बड़े कीमती हैं, जैसा कि दो-दो रत्ती का भी मूल्य लोग लाख रुपया समझते हैं, ऐसे अमूल्य रत्न ये कुछ भी मूल्य नहीं रखते हैं, उनसे भी अति अमूल्य महारत्न यह सम्यक्त्व है । मोटे रूप से भी देखिये―जैसे लोग कहते हैं कि रत्न, स्वर्ण बहुत अधिक भी जोड़ लिया तो उससे क्या ? कहीं वह खाने के काम तो न आयेगा ? खाने के काम तो अन्न ही आयेगा । यह एक लौकिक ऊपरी बात कह रहे हैं और भीतरी बात निरखें तो तीनों लोक का वैभव ढेर भी सामने हो जाय तो भी उससे इस आत्मा को लाभ कुछ नहीं मिलता । इसे शांति मिले, इसको ज्ञानप्रकाश जगे यह बात तो उससे नहीं बनती, तो वह रत्न क्या रत्न है ? महारत्न तो यह सम्यक्त्व है । जिसको चित्त में सच्ची बात की श्रद्धा हो जाने पर विशेष आदर है कि सबसे बड़ा धन है तो यही धन है कि मैं सर्व पदार्थों का तत्त्व रहस्य स्वरूप यथावत् समझ लूँ, इसमें जिसका आदर है वह पुरुष निकट भव्य है और संसार के सर्वसंकटों से निकट काल में ही वह मुक्त हो सकता है । तो रत्नों में महारत है यह सम्यक्त्व, क्योंकि सम्यक्त्व के प्रभाव से इंद्र और अहमिंद्र आदिक बड़े-बड़े पद प्राप्त होते हैं और इसलिए भी महत्त्व नहीं, किंतु यह निर्वाण पद का देने वाला है, इसी कारण सम्यग्दर्शन सब रत्नों में एक महान रत्न है । रत्न कहते हैं सार चीज को । पत्थरों का नाम रत्न नहीं है पर लोगों ने पत्थरों को ही सार चीज समझा इसलिए उसका नाम रत्न पड़ गया । रत्न में जो शब्द का अर्थ है वह तो यही है कि जो जिस जाति में उत्कृष्ट है वह उस जाति में रत्न है । यों मनुष्यरत्न, स्त्रीरत्न, पुरुषरत्न, आदि सभी के साथ रत्न शब्द जोड़ा जाता है, तो वास्तव में रत्न-रत्न है, सारभूत चीज है तो वह है सम्यक्त्व । उस सम्यक्त्व महारत्न का आदर करना चाहिए और सम्यक्त्व लाभ के लिए अगर अपना तन, मन, धन, वचन सर्वस्व भी अर्पित करना पड़े तो सहर्ष न्योछावर करके एक इस सम्यक्त्व को प्राप्त कर लेना चाहिये । सम्यक्त्व का लाभ इतना महान लाभ है कि जिसके प्राप्त कर लेने पर निकट काल में ही संसार के समस्त संकट छूट जाते हैं ।

सम्यक्त्व की महायोगरूपता―पदार्थ का अपने आपमें अपने आप ही के कारण स्वयं जैसा स्वभाव है, स्वरूप है उसका दर्शन होना, निर्णयात्मक परिचय होना सो सम्यग्दर्शन है । यह सम्यग्दर्शन रत्नों में महारत्न है और यही सम्यग्दर्शन सर्व योगों में उत्तम योग है । जितने भी ध्यान किए जाते हैं उन सब ध्यानों की सफलता इस सम्यग्दर्शन के कारण है । सम्यक्त्व न हो तो अन्य ध्यानों का फिर कोई महत्त्व नहीं है । एक योगी था । उसको प्राणायाम का बड़ा अभ्यास था, 24 घंटे तक किसी भी जगह जमीन के गड्ढे में बैठ जाए व ऊपर मिट्टी भर दिया जाय तो भी वह 24 घंटे तक बिना श्वास लिए रह सकता था । तो उस योगी से राजा ने कहा कि तुम हमें 24 घंटे की समाधि करके दिखाओ फिर तुम जो चाहोगे सो इनाम देंगे । उस राजा की घुड़साल में एक बहुत बढ़िया काला घोड़ा था, उसे उस योगी ने पसंद कर लिया और सोच लिया कि यही घोड़ा हम इनाम में लेंगे । सो वह योगी जमीन में बने गड्ढे में बैठ गया, ऊपर से मिट्टी से वह गड्ढा बंद कर दिया । जब 24 घंटे की समाधि पूरी करके वह योगी निकला तो योगी राज से बोला―महाराज ! लाओ अपना काला घोड़ा । अब बताओ उस योगी ने 24 घंटे तक किसका ध्यान किया था ? उसी घोड़े का ही ध्यान किया था ना । तो जो लोग सांसारिक सुख की इच्छा से ध्यान करते हों, मंत्र तंत्र की साधना करते हों तो उनका वह परिश्रम बेकार का है । सम्यक्त्व साथ हो तो ध्यान भी ध्यान कहलाता है । जिस पुरुष को अपने आपके निरालेपन का, ज्ञानानंद स्वरूप का विश्वास है वह घर में रहकर भी और व्यापार कार्य काज करते हुए भी चूँकि उसे अपने आपके बारे में यह विश्वास है कि मैं इन सब झंझटों से कार्यों से निराला केवलज्ञानस्वरूप हूँ । तो उस स्वरूप से वहाँ भी यथायोग्य ध्यान कहा जा सकता है । तो योगों में उत्तम योग यह सम्यक्त्व है । जितने भी धर्मादिक ध्यान हैं उनमें उत्तमध्यान योग्य ध्यान यही सम्यक्त्व कहलाता है ।

सम्यक्त्व की ऋद्धिसिद्धिमयता―यह सम्यक्त्व समस्त ऋद्धियों में उत्तम ऋद्धि है । ऋद्धियां अनेक प्रकार की होती हैं । जैसे अपने शरीर को अणु बना ले, महान् बना ले, हल्का बना ले, वजनदार कर ले, अपना मनचाहा रूप बना ले । अनेक प्रकार के चमत्कारों को उत्पन्न करने वाली जो ऋद्धि हैं उनमें उत्तम ऋद्धि रहे वह बुद्धि की ऋद्धि हो, चाहे शरीर की ऋद्धि हो, सबमें महान ऋद्धि है यह सम्यक्त्व । सम्यक्त्व सर्व सिद्धियों का करने वाला है । चाह के न होने में सर्व वैभवों की प्राप्ति हो जाती है । वह किस प्रकार ? एक पुरुष धन की चाह में रात, दिन बसा हुआ रहता है तो उसकी यह चाह कभी पूर्ण यों नहीं हो पाती । यदि लाखों रुपये का वैभव जुड़ गया तो उससे अधिक धन की इच्छा है । तो वैभववान नहीं बन सकता । अपने आपको संतुष्ट कर लेना ही वैभववान है । जहाँ इच्छा दूर हुई, वहाँ उसके सर्व सिद्धि हो गई । ज्ञानी पुरुष जानता है कि इच्छा परिग्रह है और यह अज्ञानभाव है । इसका मेरे स्वरूप में संबंध नहीं है । मैं स्वभावत: ज्ञानानंदमय हूँ । मुझे समस्त बाह्यपदार्थों से क्या प्रयोजन ? जब किसी को किसी सांसारिक वस्तु की चाह न रहे तो समझो कि उसे सब

कुछ प्राप्त हो गया। मेरा था वह आनंद और मुझे वह प्राप्त हो गया ।

सही ज्ञान व उसका प्रभाव―ज्ञानों में सबसे बड़ा ज्ञान यही कहलाता है कि यह समझ में आये कि यह पदार्थ अपनी सत्ता अलग रखता है और इस ही की सत्ता के कारण इसकी पर्यायें इसमें उत्पन्न होती हैं, इसकी पर्याय इसी में विलीन होती है व यही चीज सदाकाल रहती है । ऐसा ही स्वरूप सब पदार्थों का है । मैं भी अपने आपमें अपनी बात बनाता हूँ, अपनी ही बात विलीन करता हूँ और यह मैं सदाकाल रहता हूँ । मैं किसी दूसरे की बात उत्पन्न नहीं कर सकता । दूसरे की अवस्था की नहीं बिगाड़ सकता और दूसरे में मैं प्रवेश नहीं कर सकता, ऐसे सारे पदार्थ हैं । जब सभी पदार्थ अपने-अपने स्वरूप में उत्पादव्ययध्रौव्य रखते हैं तो किसी का किसी दूसरे के साथ संबंध नहीं है । अज्ञान से बढ़कर और कोई विपत्ति नहीं है । ज्ञान से बढ़कर और कोई संपत्ति नहीं । जीव जब भी सुखी हो सकेगा तो ज्ञान द्वारा सुखी हो सकेगा । अज्ञान के रहते हुए वह चक्रवर्ती भी हो जाय तो भी वह शांत नहीं रह सकता । दर्शन पाठ में कहते हैं कि हे प्रभो ! जिनधर्म से रहित होकर में चक्रवर्ती भी नहीं होना चाहता । वस्तुस्वरूप के यथार्थ श्रद्धान से रहित होकर 6 खंड का वैभव भी पाले तो उसमें उसे कोई लाभ नहीं है और जिनधर्म में मेरा हृदय वासित रहे अर्थात् वस्तुस्वरूप की यथार्थ श्रद्धा में मेरा चित्त बना रहे और ऐसी स्थिति में यदि मैं किसी का दास भी बनूं तो भी मैं पसंद करता हूँ । मैं दास होता तो स्वीकार करता हूँ पर जैनधर्म से रहित होकर मैं चक्रवर्ती भी नहीं होना चाहता । सुख साम्राज्य अथवा शांति तो मेरे सम्यग्ज्ञान में ही प्राप्त हो सकती है अन्यथा नहीं । किसी पुरुष को इष्ट का वियोग हो गया । अब वह निरंतर विह्वल है―हाय ! मेरा यह इष्ट गुजर गया । अब उसके दुःख को मेटने के लिए बहुत से रिश्तेदार आते, समझाते, लेकिन उनका समझाना आग में घी डालने की तरह हो जाता है । जैसे कोई घी डालकर आग को शांत करना चाहे तो वह शांत नहीं कर सकता, उससे आग और भी बढ़ जायेगी, इसी प्रकार रिश्तेदार लोग आते हैं तो उस मरे हुए व्यक्ति के गुण गाते हैं, उसकी याद बार-बार दिलाते हैं तो उससे तो उस सुनने वाले का दुःख और भी अधिक बढ़ता है । उस दुःखी व्यक्ति के दुःख को मेटने में समर्थ है सच्चा ज्ञान । जब वह यों समझ लेगा कि मेरा आत्मा निराला है, वह आत्मा निराला था । जगत के अनंत जीवों में से कोई एक जीव गया तो वह भी दूसरा ही था, वह भी मुझसे निराला था । अब वह अपने ही समय से चला गया । तो उससे मेरा क्या संबंध था ? वह मेरा कुछ नहीं है । मेरा तो मात्र यह मैं आत्मा हूँ, यही सर्वस्व ज्ञानधन मेरा है । जब इस तरह अपने आपमें अपना निर्णय बनाता है तो वह शांत हो पाता है । तो किसने सुखी किया ? अपने ज्ञान ने ही सुखी किया । हर स्थितियों में जब हमारा ज्ञान सही होगा तो हम सुखी रहेंगे । जहाँ ज्ञान में विकार आया कि वहाँ दुःख आ जायेगा । तो सम्यक्त्व ही एक ऐसा महान वैभव है कि जिसमें सारी ऋद्धियां, सारे ध्यान हैं, यही महान रत्न है और सर्वसिद्धि को करने वाला है ।


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