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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:चारित्रपाहुड - गाथा 15

From जैनकोष



अण्णाणं मिच्छत्तं वज्जहि णाणे विसुद्धसम्मत्ते ।

अह मोहं सारंभ परिहर धम्मे अहिंसाए ।।15।।

(52) ज्ञान द्वारा अज्ञान को नष्ट करने का उपदेश―इस गाथा में अज्ञान, मिथ्यात्व और मिथ्याचारित्र इनके त्याग का उपदेश किया है । आचार्यदेव कहते हैं कि हे भव्य जीव तू ज्ञान से तो अज्ञान का त्यागकर अर्थात् ज्ञानपरिणति बनाकर तू अज्ञान को नष्ट कर और शुद्ध सम्यक्त्व बनाकर मिथ्यात्व को नष्ट कर और अहिंसारूप वृत्ति करके तू आरंभसहित मोह का त्याग कर । इस जीव को कष्ट देने वाले तीन कुभाव हैं―मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र । यह जीव अपनी शांति के लिए बहुत-बहुत प्रयत्न करता है, मगर करता है सब बाहर-बाहर में । बाहरी पदार्थों में मैं इसको यों बना दूं, उसका यों बिगाड़ दूँ, ऐसा बाहर बाहर में अनेक प्रकार के विकल्प करके अपने को प्रयत्न वाला मानता है कि मैं शांति का पुरुषार्थ करता हूँ, मगर शांति और अशांति ये दोनों कहीं बाहर नहीं हैं, किसी बाहरी पदार्थ से न शांति आती है और न अशांति आती है । जब अपना ज्ञान सही होता तो शांति हो जाती और जब अपना ज्ञान विपरीत बनता तो अशांति हो जाती । तो जिन्हें शांति चाहिए उनका यह कर्तव्य है कि अपने ज्ञान को सही बनावे । और ज्ञान सही नहीं बनता उसका कारण मिथ्यात्व तो है ही, मगर हठ आग्रह राह भी अशांति का कारण होता है ।

(53) बहिस्तत्त्व के आग्रह में शांति―अज्ञान से यह जीव बाह्य पदार्थों में आग्रह किये जा रहा । अगर आत्मतत्व में आग्रह किया जाये तो वह शांति का देने वाला है । पर बाह्य पदार्थों में जो हठ और आग्रह बनता है कि मैं तो ऐसा ही करके रहूँगा, यहाँ तो ऐसा ही होना चाहिए, इस आग्रह से अशांति होती है, और ये हठ और आग्रह पर्यायबुद्धि में हैं । देह को जाना कि यह मैं हूँ और दूसरे के देह को जाना कि ये दूसरे हैं, तब बुद्धि चूंकि विपरीत हुई, चिदानंदघन आत्मा के स्वरूप में विश्वास न रहा तो अब यह अटपट मन वाला बन गया और बाह्य पदार्थों का आग्रह करने लगा उसमें अशांति है । विवेकी पुरुष वह है कि जो बात ज्ञान की मिलें, जो शांति का मार्ग मिले उस पर निःसंकोच चलने का प्रयत्न करे । इस अज्ञानी पुरुष ने अनादि से लेकर अब तक परिग्रह में मोह किया, परिग्रह में, विषयों में खूब मौज किया और इस एक भव में उसने बहुत कुछ धन वैभव कमाया, बड़ी-बड़ी कोठियां बनायी याने पहले मानो हजार रुपये भी न थे और अब करोड़ हो गए, अब उसको कोई सुयोग मिले और ज्ञान की बात मिले और उसको यह बात झलक में आये कि बाह्य तत्त्व तो एकदम भिन्न हैं, उनसे आत्मा का कुछ सुधार नहीं और वह ज्ञान प्रकाश उसे सुहा जाये तो वह तो यह आग्रह नहीं करता कि मैंने बड़ा परिश्रम करके यह करोड़ों की जायेदाद खड़ी की इसे कैसे छोड़ा जाये? ये लोक के बाह्य पदार्थ सब असार हैं तो एकदम सबको छोड़ने में उसे हिचक नहीं होती । तो जब ज्ञानप्रकाश आता है तो अज्ञान हट ही जाता है । तो यहाँ यह उपदेश किया कि हे भव्य जीव तुम ज्ञान के प्रसंग से अज्ञान को दूर करो ।

(54) विशुद्ध सम्यक्त्व के भाव से मिथ्यात्व को दूर करने का उपदेश―विशुद्ध सम्यक्त्व भाव से मिथ्यात्व को दूर करो । जिस ज्ञानी के सही आशय बन गया मायने वस्तु जिस जिस स्वरूप से है उस ही स्वरूप से मानने की बात आ गई तो अब वहाँ मिथ्यात्व न रहेगा । मोह मिथ्यात्व और अज्ञान ये करीब पर्यायवाची शब्द हैं । मोह कहते हैं भिन्न-भिन्न वस्तुवें हैं और उनमें एक को दूसरे का मानना यह है मोह । प्रेम करने का नाम मोह है । तो बेहोशी कहा है कि पदार्थ तो हैं भिन्न-भिन्न सत् किंतु एक का स्वामी दूसरे को मानना, यह इसका है यह इसका, यह है उसका, यह आत्मा की बेहोशी है । तो जहां यह ज्ञानप्रकाश मिला कि प्रत्येक पदार्थ अपने स्वरूप से है, दूसरे के स्वरूप के नहीं है, अपने ही द्रव्य से है, दूसरे के द्रव्य से याने पिंड से नहीं, अपने ही प्रदेश से है दूसरे के प्रदेश से नहीं, अपनी ही क्रिया, अपनी ही परिणति अपनी ही पर्याय से है दूसरे के परिणमन से नहीं, अपने ही गुणों से है दूसरे के गुणों से नहीं, जहाँ यह स्पष्ट बोध हो जायेगा वहाँ यह बुद्धि जग ही नहीं सकती कि इसका यह कुछ लगता है, ज्ञानी घर में रहते हुए भी जल में कमल की भांति रहता है । किस कारण से कि उसको ज्ञान प्रकाश मिला है । सही ज्ञान होने पर फिर झूठा ज्ञान कहां से बनावे?

(55) विभ्रम दूर होने पर घबड़ाहट की असंभवता―मानो किसी कमरे में कुछ अंधेरे उजेले में कोई पड़ी हुई रस्सी में साँप का भ्रम हो गया तो यह साँप है ऐसा जानकर उसका दिल दहल गया, घबड़ा गया और चिल्लाने लगा और वही पुरुष जब हिम्मत करके थोड़ा निकट जाकर देखे तो सही कि कैसा सांप है, उसे देखने चला तो वह कुछ हिल डुल तो सकता न था क्योंकि वह रस्सी थी । जब कुछ हिम्मत करके और आगे बढ़ा तो उसे साफ दिखने लगा और कुछ समझ में आया कि यह तो रस्सी सी लगती है, फिर उसका और उत्साह बढ़ा, देखा तो वह रस्सी थी, और यहाँ तक कि उसे हाथ से उठाकर भी समझ लिया कि यह तो कोरी रस्सी है, उस रस्सी को वहीं फेंक दिया । अब वह यदि चाहे कि जैसे मैं पहले घबड़ा रहा था उसी तरह से फिर घबड़ा लूं तो उसमें ऐसी ताकत नहीं है कि वह फिर से उसी तरह की घबड़ाहट अपने में ला सके, क्योंकि उसका अज्ञान मिट गया । तो ज्ञानी पुरुष में मोह करने की शक्ति ही नहीं, सामर्थ्य ही नहीं वह तो संसारी जीवों के लिए बेकार हो गया । जैसे मोही जीवों को ज्ञानप्रकाश पाने की योग्यता नहीं है ऐसे ही ज्ञानी पुरुष को मोह करने की योग्यता नहीं है । जहां ज्ञानप्रकाश आ गया वहाँ फिर अज्ञान अंधकार कैसे आये ? हाँ कोई तीव्र पापकर्म का उदय हो, मिथ्यात्व का ही उदय हो और ज्ञान बिल्कुल सफा हो जाये, अज्ञान में आ जाये तो फिर वही खेल, फिर खेलने लगेगा, मगर ज्ञान के रहते हुए किन्हीं ओर कारणों से वह अज्ञान बन सके, मोह बन सके, यह नहीं हो सकता । जैसे शंख होता है और उसके भीतर कीड़ा रहता है । शंख बिल्कुल सफेद होता, अब कीड़ा अगर कोई काली मिट्टी खा ले तो क्या शंख भी काला हो जायेगा ? नहीं । और चाहे वह कैसी ही सफेद मिट्टी खाये मगर शंख को अगर काला होना है तो वह काला हो जायेगा । तो कहीं कीड़े के भोग उपभोग से शंख काला नहीं होता, वह उसकी योग्यता हो, उसी का योग हो तो होगा, ऐसे ही ज्ञानी पुरुष किसी भी वातावरण में रहे, अनेक झंझटों में है या कोई प्रतिकूल वातावरण है, कैसी भी स्थिति हो, मगर उन स्थितियों के कारण ज्ञानी अज्ञानमय नहीं बन सकता । ज्ञानी के आत्मा में ही कोई बदल बने और उसके निमित्तभूत कर्म का उदय हो और वह अज्ञानी बन गया, मगर दूसरे पदार्थ के कारण वह अज्ञानी नहीं बन सकता ।

(56) अहिंसाधर्म अंगीकार करके सारंभ मोह का परिहार करने का उपदेश―ज्ञानप्रकाश लावें, विशुद्ध सम्यक्त्व लावें और उस ही मिथ्यात्व का परिहार करें तो असंयम का, मिथ्याचारित्र का त्याग होगा अहिंसाभाव को अपनाने से । चारित्र क्या है ? अहिंसाभाव । अहिंसा दो प्रकार की है―(1) द्रव्य अहिंसा और (2) भाव अहिंसा । अपने भावों में विकार न आने देना यह है भाव अहिंसा और किसी प्राणी का घात न करना यह द्रव्य अहिंसा है । तो विकार जब आये नहीं तो वही तो सम्यक᳭चारित्र हुआ । तो अहिंसाभाव की वृद्धि करके झट दोष मोह का परित्याग करें । मोह में निष्कर्ष यह निकलता कि वह आरंभ में डट जायेगा तो यह आरंभ तो पहिचान है मोह की । यदि वह परिग्रह के आरंभ में लगता है तो समझिये कि उसे मोह है । सो अहिंसा धर्म का आदर करके अविकार ज्ञानस्वरूप अंतस्तत्त्व का आश्रय लेकर इस आरंभ और मोह का त्याग करें ।


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