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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:चारित्रपाहुड - गाथा 22

From जैनकोष



दंसण वय सामाइय णेसह सचित्त रायभत्ते य ।

बंभारंभ परिग्गह अणुमण उद्दिट्ठ देसविरदो य ।।22।।

(71) सागार संयमाचरण के 11 प्रकार―सम्यक्त्वाचरण के बाद संयमाचरण का विवरण चल रहा है । संयमाचरण दो प्रकार के बताये गए―(1) सागार संयमाचरण और (2) निरागार संयमाचरण । गृहस्थों का जो संयमासंयम रूप आचरण हूँ उसे सागार संयमाचरण कहते हैं । तो संयमासंयम के 11 भेद हैं, जिन्हें 11 प्रतिमायें कहते है―(1) दर्शन प्रतिमा, (2) व्रतप्रतिमा, (3) सामायिक प्रतिमा, (4) प्रोषधोपवास प्रतिमा, (5) सचित्तत्याग प्रतिमा, (6) रात्रि मुक्तित्याग प्रतिमा, (7) ब्रह्मचर्य प्रतिमा, (8) आरंभत्याग प्रतिमा, (9) परिग्रहत्याग प्रतिमा, (10) अनुमतिविरति प्रतिमा, (11) उदृष्टत्याग प्रतिमा, ये 11 प्रकार के संयमासंयम हैं । ये प्रतिमायें पंचम गुणस्थान में होती हैं, जिनका नाम है देशविरत याने पापों से एकदेश विरक्त होना, अव्रतों से एकदेश निवृत्त होना । अव्रत होते हैं 12, जिनका नाम है अविरति―6 काय अविरति, 6 विषय अविरति । (1) पृथ्वीकाय, (2) जलकाय (3) अग्निकाय, (4) वायुकाय, (5) वनस्पतिकाय और (6) त्रस काय । इन 6 कार्यों हिंसा का त्याग होना सो यह 6 काय अविरति है । इस 6 काय अविरति में से त्रस का अविरति का त्याग है सागार संयमाचरण में, पर एकेंद्रिय के जो 5 काय हैं उनके घात का त्याग गृहस्थी में नहीं चल सकता । भोजन बनाना तो जल, अग्नि, वायु, वनस्पति । इनकी अविरति नहीं चल सकती । कभी मिट्टी भी लाते, जल भी खींचते । तो 5 काय अविरति का यह त्याग नहीं है, और विषय अविरति हैं―(1) स्पर्शनइंद्रिय विषय अविरति, (2) रसना इंद्रिय विषय अविरति, (3) घ्राणइंद्रिय विषय अविरति, (4) चक्षुइंद्रिय विषय अविरति (5) कर्णइंद्रिय विषय अविरति और (6) मनोविषय अविरति । 5 इंद्रिय के विषयों से विरक्त न होना, इन विषयों का त्याग न कर सकना, मन के विषयों का त्याग न होना, ये 6 विषय अविरति हैं । तो गृहस्थ के इन 6 विषय अविरति का वह त्यागी नहीं होता । तो इस प्रकार देशसंयत गुणस्थान में 11 अविरत रहते हैं । और इन 11 अविरतियों का उत्तरोत्तर त्याग चलता रहता है और अंत में अत्यंत सूक्ष्म रह जाता है यह अव्रती । तो इस प्रकार सराग संयमाचरण में 11 प्रतिमा के भेद हैं । अब इनका क्या लक्षण है सो अगली गाथा में कह रहे हैं ।


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