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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:चारित्रपाहुड - गाथा 44

From जैनकोष



एवं संखेवेण य भणियं णाणेण वीयराएण ।

सम्मत्तसंजमासयदुण्हं पि उदेसियं चरणं ।।44।।

(122) चारित्रपाहुड में सम्यक्त्वाचरण व संयमाचरण के कथन की सूचना―अब इस चारित्रपाहुड ग्रंथ में जो कुछ भी वर्णन किया है उसका उपसंहाररूप में कुछ उपदेश किया जा रहा है । जैसा कि पहले कहा गया वह सब संक्षेप में उपदेश वीतराग जिनेंद्रदेव की परंपरा से आया हुआ है । क्या कहा गया? सम्यक्त्वाचरण और संयमाचरण । इन दोनों आचरणों का संक्षेप में वर्णन किया गया । अष्ट अंग गुणसहित 25 दोषरहित सम्यक्त्व को पाकर उसके अनुसार वृत्ति बनना यह तो है सम्यक्त्वाचरण और संयमाचरण हैं दो प्रकार के―सागार संयमाचरण और निरागार संयमाचरण । जो गृहस्थों का संयमासंयम है वह तो है सागार संयमाचरण और आगार रहित, घररहित, निष्परिग्रह साधु संतों का जो आचरण है वह है निरागार संयमाचरण । इन दो के सहारे से चारित्र का उपदेश किया गया । उस चारित्र से क्या लाभ होता है कि अपने में अनादि अनंत अंत: प्रकाशमान सहज ज्ञानस्वभाव में वृत्ति जगती है, मिलन होता है और उस रूप अपने आपका आचरण होता है । ज्ञाता दृष्टा रहना, केवल जाननहार रहना यह है पवित्रता, और किसी परवस्तु को यह मेरा है, इसमें मेरे को बड़ा सुख है ऐसा मानना यह है अपवित्रता । संयोग-वियोगवश इस जीव को सहना तौ सब पड़ता है, पर ज्ञानपूर्वक, विवेकपूर्वक अपने स्वरूप की आराधनापूर्वक बाह्य वस्तुओं की ममता छोड़े तो उसे नियम से मुक्ति के आनंद का लाभ मिलेगा, चाहे कुछ थोड़े भव और लगें ।

(123) स्वरूपाचरण की पूर्णता अपूर्णता के भाव में अनेक कक्षायें―समस्त आचरण दो में आ गए―(1) सम्यक्त्वाचरण ओर (2) संयमाचरण । अब जो स्वरूपाचरण की बात कहते हैं वह एक साधारण तत्त्व है । वह स्वरूपाचरण कहीं सम्यक्त्वाचरण रूप है, वह स्वरूपाचरण कहीं सागार संयमरूप है याने संयमासंयम में है, वह स्वरूपाचरण कहीं निरागार संयमाचरण रूप है याने मुनियों के संयमरूप और वही स्वरूपाचरण कहीं निर्विकल्प समाधि रूप है । उससे पहले उसके हल्के रूप में है, और उन हल्के रूपों में स्वरूपाचरण का भाग समझे तब तो सही है और उसी को पूरा स्वरूपाचरण मानकर कहे तो वह बात गलत है । तो ऐसा यह स्वरूपाचरण जो नाना स्थितियों में पाया जाता है वह इस जीव को मोक्षमार्ग में बढ़ाता है । समस्त आचरणों में इतना तो आवश्यक ही है कि ऐसा अपने में अनुभव करें कि मैं अपने आप अपनी सत्ता से अपनी ही शक्ति में जिस स्वभावरूप हूँ, बस मैं वही हूँ, इससे बाहर मैं नहीं । और इस अंतस्तत्त्व के सिवाय परमाणु मात्र भी मेरा नहीं है । जो केवल अपने इस निज अंतस्तत्त्व को निरखेगा, श्रद्धा करेगा कि मैं यह हूँ वह नियम से मोक्षपद प्राप्त करेगा । कुछ भव लगें यह बात अलग है, किंतु जिसने मोक्ष का तत्त्व जान लिया, मोक्ष में ही अकेले ही रहना है और यहाँ भी मेरा स्वरूप अकेला ही है तो जो इस अकेले स्वरूप में यह मैं हूँ ऐसा अनुभव करता है वह मुक्तिलाभ क्यों न प्राप्त करेगा? मुक्ति तो होनी ही पड़ेगी, क्योंकि जिस कार्य की जो विधि है उस विधि से चले तो वह कार्य बनता ही हैं । संसार की विधि है बाह्य द्रव्यों से लगाव रखना, मोक्ष की विधि है कि केवल सहज निजस्वरूप में ही अपने आत्मतत्त्व का अनुभव करना । अब जो निकट भव्य जीव है वह मोक्ष की विधि को चाहता है और जो संसारी जीव है वह संसार की विधि को ही चाहता है । तो अपने में अपने कैवल्यस्वरूप को निरखकर आराम पाना, निर्विकल्प होना, निर्विकल्प होकर ज्ञानसुधारसरूप अनुभव बनाना यह है जीव का हितकारी कदम ।


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